फोटो: thenational.ae.com से साभार
4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – चौथी क़िस्त
पिछली क़िस्त का लिंक: पिता द्वारा टट्टी में सनी नेपियां साफ करने से मेरी ममता में कमी तो नहीं आ जाएगी!
ये सवाल तुम पहले भी कई बार पूछ चुकी हो मुझसे, कि मैंने कैसे मान लिया कि तुम लड़की हो? क्या ये वैसा ही नहीं हैं जैसे लोग पहले से ही गर्भ में बेटा मानकर चलते हैं? क्या मैं लड़कों के प्रति वैसा भेद-भाव नहीं कर रही जैसा लोग लड़की के लिए करते हैं? नहीं मेरी बच्ची ऐसा नहीं है… दरअसल मैंने हमेशा से चाहा है कि मुझे बच्चा हो तो लड़की हो. हालांकि मैं हमेशा ही कहती हूं कि एक लड़की और एक लड़का ही सबसे अच्छा है. लेकिन दो बच्चों को अच्छे से पालना बड़ा ही महंगा है आज के समय में. हर एक चीज में बेतहाशा मंहगाई है मेरी जान. कितनी बार तो हमें ही अपनी कई इच्छाओं को मारना होता है, …ऊपर से ये जुल्मी बाजार!
ये वो बाजार नहीं है मेरी चन्दा! जहां सिर्फ जरूरत की चीजें मिलती हैं. दरअसल आज के बाजार ने हम सबको बच्चा बना दिया है. हम ऐसे ‘बिगडैल बच्चे’ बन गए हैं, जिसके दोनों हाथ जरूरतमंद और पसंदीदा चीजों से भरे हैं, पर जो फिर भी उन चीजों की ज़िद किये जा रहा है; जो उसे किसी दूसरे बच्चें के हाथ में दिख रही हैं या फिर किसी दुकान में चमकती हुई लुभा रही हैं. ये हालत तो हम बड़ों की हो चुकी है! पहले खाली जेबें ही हमें सब्र करना सिखाती थी, …हम कर लेते हैं सब्र, चूंकि उधार से डर लगता था. लेकिन ये जो क्रेडिट कार्ड आए हैं इन्होंने हमें उधार लेने वाली फीलिंग से बचा लिया. और जेब खाली होते ही अब हम क्रेडिट कार्ड से उधारी पर सामान लेने से जरा भी नहीं चूकते! कुल मिलाकर जेब भरी हो या खाली लोगों का बाजार के चंगुल से बचना और बेमतलब की, गैरजरूरी चीजें खरीदने से बचना बड़ा ही भारी काम है.
ऐसे में बच्चों को लेकर बाजार जाना तो खतरों से खेलने जैसा है! मैं देख चुकी हूं बच्चे कैसे मां-बाप को बाजार में न सिर्फ शर्मिंदा करते हैं, बल्कि बाजार में भीड़ की निगाहें अपने ऊपर खींच लाने का हुनर भी उन्हें बहुत अच्छे से आता है. कुछ पल को ऐसा लग सकता है कि भीड़ की नजरों का केन्द्र सिर्फ रोता हुआ बच्चा ही है. पर असल में उन कातिल नजरों के केन्द्र में बच्चा नहीं, बल्कि बच्चे की उंगली थामें हुए मां-बाप होते हैं. अपनी मनचाही चीज की जिद के लिए, तुम बच्चे ऐसे पैर जमा लेते हो उस वक्त कि कोई तुम्हें टस से मस नहीं कर सकता. अपनी मनचाही चीज पाने के लिए अंगद की तरह पैर धरती में गाड़ लेते हो तुम लोग! मानो धरती ने पकड़ लिया हो तुम्हें! चारों तरफ लोगों की मां-बाप को कोसती, गलियाती निगाहें – ‘कैसे मां-बाप हैं एक चीज नहीं दिला सकते बच्चों को’ …और मां-बाप की मजबूरी ये कि दिलाये हुए सामान से जो घर भरा है उसकी की नुमाईश वहां कैसे करें? ऐसे में मन में बस इतना ही आता है, ‘बोलो भाई बोलो… आज सुनने की बारी हमारी ही है!’ बेचारे मां-बाप उस वक्त दुनिया की नजर में तुम्हारे मां-बाप नहीं, बल्कि विलन होते हैं!
अपनी एक दोस्त की बेटी के साथ मैं जब भी बाजार गई हूं उसने यही नाटक किये हैं बीच बाजार. मैं उसके ऐसे किसी चीज के लिए अंगद बन जाने पर गुस्सा हो जाती थी और उसकी मां बेचारी… वो न गुस्सा हो सकती थी न ही डांट सकती थी. गुस्सा होती तो और सबकी लानतें मिलती ‘कैसी मां है, बच्ची रो रही है… फिर भी डांट रही है’. इसीलिए सब्र की लॉलीपॉप चूसते हुए वो अपनी बेटी को सिर्फ प्यार से चुप कराती या कभी हंस देती या कभी अपना बजट बिगाड़ते हुए दांत पीसते हुए मनचाही चीज दिलवा देती. एक बार उसी ने कहा था मुझे, ‘जो बीच सड़क पर मां-बाप की बेइज्जती न कराए वो बच्चा ही कैसा!’…और फिर हंस दी थी. पर क्या वो सच में हंसी थी? नहीं मेरी बच्ची.
टीवी में आने वाले विज्ञापन, सीरियल, फिल्में और उनमें आते अपने जैसे बच्चे. इस्टाइलिश और फैशनेबल कपड़े पहने, सुंदर जूते, मनचाही चीजें खाते बच्चे, मनचाही चीजों से खेलते बच्चे और भी पता नहीं क्या-क्या. हर वक्त ये सब देखकर भला कैसे तुम खुद को रोक पाओगी जिद करने से।…हम बजट के हिसाब से तुम्हारी ऐसी जिद और जरूरतें हर बार पूरी नहीं कर पाएंगे. तो तुम्हारे लिए सब कुछ करके भी हम अक्सर गिल्ट में ही रहेंगे, कि तुम्हारी इच्छाएं पूरी नहीं कर पा रहे हैं. मनचाहा सामान न मिलने पर तुम्हारी आंसूं से भरी आंखें भी हमें घोर गिल्ट में डालने में पूरी मदद करेंगी! असल में विज्ञापनों ने हम सबकी नीयत बिगाड़ दी है. विज्ञापन देख-देखकर हमारे अंदर गैरजरूरी चीजों की अंतहीन हवस जग गई है मेरी जान! तुम्हारे मां-बाप कितना ज्यादा सोचते हैं, तब कहीं जाकर खुद को अभी तक बाजार के चंगुल से काफी हद तक बचाए हुए हैं।
देखो गलती तुम्हारी नहीं होगी कि तुम हर बार कोई न कोई नई मांग करती जाओगी. गलती हमारी भी नहीं होगी कि हमारे पास अंतहीन संसाधन नहीं. लेकिन बात सारी ये है कि भुगतना तो सिर्फ हमें ही पड़ेगा न! बच्चों को तो भूलने में एक मिनट लगता है. पर हम कैसे भुला पाएंगे कि हमने तुम्हारी फलां-फलां मांग पूरी नहीं की… या कि अपनी कमी और गलती के लिए तुम्हारे ऊपर झुंझलाए, तुम्हें डांटा या जिद कंट्रोल करने के लिए एक-आध थप्पड़ रसीद कर दिया. अपने बच्चे के साथ की गई ऐसी ज्यादती भूल कहां पाते हैं मां-बाप.
ऐसा भी संभव नहीं है की हम घर में टीवी ही न रखे, जिससे तुम विज्ञापनों की मायावी दुनिया से दूर रहो. टीवी न दिखाने भर से किसी को बाजार और विज्ञापन की जकड़ से बचाया जा सकता है भला? काश की ऐसा हो ही पाता! पर टीवी भी तो उन जरूरी चीजों में से हो गया है जिसे टाला नहीं जा सकता. घर में टीवी न भी रखें तो क्या पड़ोस के घर के टीवी से तुम्हें दूर रखा जा सकता है? कतई नहीं. बात तो यह है कि टीवी से ही तुम्हें कितनी दिनों तक दूर रखा जा सकता है. जब तुम्हारे दोस्त, क्लासमेट्स टीवी पर देखी गए कार्टूनों, क्रिकेट मैचों या किसी दूसरी चीज का जिक्र करेंगे, तो तुम चुपचाप बगलें तो नहीं ही झांकते रहोगे ज्यादा दिनों तक.
सच तो ये है कि तुम्हारे दादा-दादी और नाना-नानी की तरह इस बाजार को भी तुम्हारा बेसब्री से इंतजार है मेरी जान! जब बाजार जैसी बड़ी ताकतें भी तुम्हारी आमद का इंतजार कर रही हैं, तो तुम्हारा आना तय ही है… तुम खुश हो सकती हो मेरी बच्ची!
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उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.
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