इतिहास

खटीमा गोलीकांड के 28 बरस

1994 के साल सितम्बर महीने की पहली सुबह थी. आज खटीमा में सरकार की गुंडागर्दी के विरोध में एक प्रदर्शन होना था. खटीमा में करीब दस हजार लोग एक जुलूस में शामिल थे. पूर्व सैनिक, छात्र, महिलायें और बच्चे सभी एक स्वर में नारेबाजी करते हुए शांतिपूर्ण ढंग से जुलूस निकाल रहे थे. एक बार थाने के सामने से जुलूस निकालने के बाद दूसरी बार जुलूस थाने के सामने से निकल रहा था.
(Khatima Goli Kand 1994)

समय 11 बजकर 17 या 18 मिनट हो चुका था. सूरज आसमान चढ़ने की कोशिश में था. पूरे जोश में नारेबाजी करते जुलूस का अगला हिस्सा तहसील तक ओर पिछला हिस्सा थाने से गुजर रहा था. अचानक जुलूस पर थाने की ओर से पत्थर बरसने लगे. अचानक हुए इस पथराव से जुलूस में शामिल लोग बिखरने लगे. इससे पहले की लोग कुछ समझ पाते गोलियों की आवाज आने लगी. सुबह 11 बजकर 20 मिनट पर शुरु हुई गोलियों की भयावह आवाज 12 बजकर 48 मिनट तक आती रही. पुलिस बगैर किसी चेतावनी के रुक-रूककर गोली चलाती गयी.      

जुलूस में शामिल सीधे-सादे पहाड़ियों को उपद्रवी बताने के लिये पुलिस ने तहसील में लगे वकीलों के टेबल आग के हवाले कर दिये. खटीमा गोलीकांड में 8 लोग शहीद हुए और सैकड़ो घायल. पुलिस ने तहसील में खड़े ऐसे निर्दोषों पर भी गोली चला दी जो अपने काम से तहसील में आये थे. घटना के कई दिन बाद तक खटीमा हल्द्वानी में कर्फ्यू लगा रहा और पुलिस जिसे मर्जी घरों से उठाती रही.
(Khatima Goli Kand 1994)

खटीमा गोलीकांड में पुलिस अपनी कारवाई को सही ठहराने के लिये अजब-ग़जब तर्क देती है. मसलन वह इस जुलूस को सशस्त्र विद्रोह बताती हुई वह पूरी घटना को जवाबी कारवाही करार देती है. अपनी रिपोर्ट में पुलिस कहती है कि महिलाओं के पास धारदार हथियार थे और पुरुषों के पास रायफल. असल बात यह है कि जुलूस में शामिल पहाड़ की महिलाओं ने अपने कमर में घास काटने वाली दंराती रखी थी और पूर्व सैनिकों ने अपने पास लाइसेंसी बंदूक. उत्तराखंड की महिलाओं की सांस्कृतिक पहचान दरांती और पूर्व सैनिकों की लाइसेंसी बंदूक उनके खिलाफ सबूत बन गयी और प्रशासन ने इस घटना को जवाबी कारवाही भी मान लिया.
(Khatima Goli Kand 1994)

घटना के 6 बरस बार हमें अपना उत्तराखंड मिला. आज जब राज्य को बने पूरे दो दशक बीत चुके हैं उस समय जैसी राज्य की स्थिति है उसकी कल्पना शायद ही किसी आन्दोलनकारी ने की हो. उत्तराखंड के इतिहास में आन्दोलन के दमन की यह घटना है. इस घटना में शहीद आन्दोलनकारियों के नाम हैं :

प्रताप सिंह
सलीम अहमद
भगवान सिंह
धर्मानन्द भट्ट
गोपीचंद
परमजीत सिंह
रामपाल
भुवन सिंह

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री फाउंडेशन

Support Kafal Tree

.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन

पिछली कड़ी : उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी…

3 days ago

कर्ज पर युधिष्ठिर का जवाब : लोककथा

बड़ी पुरानी बात है. पांडु राजा के पाँच पुत्र थे, पांडव और धृतराष्ट्र के सौ…

2 weeks ago

दिव्य आम का स्वाद जीभ पर नहीं पेट के सबसे चोर हिस्से पर कब्ज़ा जमाता है

हमारे इलाक़े में लंगड़ा आम अमूमन इन्हीं दिनों यानी जून के तीसरे-चौथे हफ़्ते में सलीके…

2 weeks ago

उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी

पिछली कड़ी : एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता हिमालय को जानने समझने व…

1 month ago

एक ‘युवा’ एथलीट जिनकी उम्र 92 वर्ष है!

आम तौर पर एक उम्र के बाद व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से अशक्त, बेबस…

1 month ago

रिंगाल: पहाड़ की बुनावट में छिपा रोजगार और जीवन

पहाड़ों में जीवन हमेशा प्रकृति के साथ जुड़कर चला है. यहाँ जंगल सिर्फ पेड़ों का…

1 month ago