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वह कैसे मीटू कैम्पैन में कैसे हिस्सा ले?

और मेरे सामने पहाड़ की एक युवा पत्रकार चली गई

-इस्लाम हुसैन

महिला उत्पीड़न के प्रति मुखर होकर मीटू कैम्पैन चलाने वाली महिलाओं की आपबीती पर अलग अलग प्रतिक्रियाएं हैं. महिलाओं द्वारा इज्जत दांव पर लगाकर की गई स्वीकृति को पुरुष मानसिकता कैसे दबा रही है यह देखना भी कम पीड़ादायक नही है. इस समाज में हमारे आसपास ऐसी घटनाएं होती ही रहती हैं, जरा पलट के देखें और उसमें अपने व्यवहार और भूमिका की समीक्षा करें. सिहरन होती है. अपने पत्रकारिता के जीवन में बहुत सी कहानियां देखीं. बड़े नाम वालों का आगा पीछा देखा तब पत्रकारिता का धर्म भी नहीं निभाया जा सका. पर एक प्रकरण जब भी याद आता है तो निराशा जैसी होती है. एक जीती जागती जान हाथ से रेत की तरह फिसल गई. उस लोक से वह कैसे मीटू कैम्पैन में कैसे हिस्सा ले…?

25-26 साल पहले की घटना को याद रखना भी बड़ा तकलीफ देह है.

दिल्ली जाना होता था तो अखबारों के दफ्तरों में चक्कर लगाना ज़रूरी होता था. ऐसे ही दिनों में एक बार मैं दिल्ली में विकास मार्ग स्थित चौथी दुनिया के आरम्भिक समय के कार्यालय में बैठा हुआ उपसम्पादक से बात कर रहा था. यह बात चौथी दुनिया के शुरुआती दौर में दो दशक से ज्यादा पुरानी है उस समय तक मेरी कई रिपोर्ट नवभारत टाइम्स के साथ साथ चौथी दुनिया में चर्चित हो चुकी थीं. सत्ता पक्ष और अफसरशाही की नाराजगी झेल रहा था.

दिल्ली आया तो सोचा अखबारों के दफ्तर हो लिया जाए कुछ बिल क्लियर हो जाए तो बेहतर.

तभी एक दरमियाने कद की गौर वर्ण की युवती कमरे में दाखिल हुई. एक नजर में मैं उसको देखकर जान गया कि यह पहाड़ की है. लोगों को बोलचाल, भाषा और चालढाल से जानना मेरा प्रिय शगल रहा है. यह गुण मुझे अम्माजी से मिला है. कुछ देर बाद बाद एक सज्जन आए और उस युवती से बात करने लगे जैसे ही उन्होने मेरा नाम जाना तो चहककर बोले मैं तो आपको अमर उजाला के समय से जानता हूं और उन्होंने तुरन्त मेरा परिचय उस युवती से कराते हुए कहा ये भी उधर की ही हैं. तो कन्फर्म हो गया युवती के बारे में कि कहां की हैं. उनसे बात करते ही मैं समझ गया, वह तेज तर्रार नए ख्वाब लिए नई-नई पढ़ी लिखी पत्रकार हैं. जिले के कस्बाई पत्रकारों और पत्रकारिता की उसकी समझ किताबी है और एक खास दूरी है.

मैने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. शुरु में सब ऐसा ही होता है, फिर बाद में सबको पत्रकारिता हालचाल पता चल जाता है. परिचित उपसम्पादक महोदय ने मुझसे युवती के साथ इशूबेस काम करने के लिए कहा, मैंने व्यस्तता कहकर बात टाल दी. अब तक मैं कई अखबारों के रिपोर्टरों को भुगत चुका था, कि कैसे वह फील्ड में काम कराकर अपना काम निकालते हैं. खैर उस युवती से वह छोटा सा परिचय याद भी नहीं रहता अगर यह कहानी आगे नहीं बढ़ती.

चौथी दुनिया से निपटकर मैं बहादुर शाह जफर मार्ग में नवभारत टाइम्स के आफिस आ गया. उस समय कुमाऊं से चार-पांच लोग नवभारत टाइम्स में लिखते थे, एक अल्मोड़ा से दो हल्द्वानी से और एक मैं जो न हल्द्वानी जैसे ‘बड़े’ शहर से था न नैनीताल हैडक्वार्टर से. दोनोंसे मेरा परिचय था एक सीनियर के साथ ज्यादा नजदीकी थी पर मेरे नवभारत टाइम्स में लिखने को उन्होंने भी सहज ढंग से नहीं लिया था, हालांकि मेरे आपसी और पारिवारिक रिश्ते बने रहे. दूसरे साहब पहाड़ के ज्यादा हितैषी थे मेरे साथ न जाने क्यों वह बेगाना सा व्यवहार करते रहे, मेरे नवभारत टाइम्स में लिखने को ऐसा समझते थे कि जैसे मैं उनके आगे की थाली छीन रहा हूं.

मैं नवभारतटाइम्स में डेढ़ दो साल बाद आया था. देखा निज़ाम बदल गया, पहाड़ की डेस्क इंचार्ज यूपी के घाट-घाट का पानी पी चुके ऐसे साहब थे जिनके इलाकाई पत्रकारिता के अपने पूर्वाग्रह थे. पर सबसे चौकाने वाली बात वो मुझसे रिपोर्ट और लेख की जगह किसी लड़की के बारे में करने लगे थे. उसके चरित्र को लेकर तरह तरह की बातें और इससे ज्यादा भयानक कि वह किसी भी तरह उस लड़की को, जिसको मैं कतई नहीं जानता था, सबक सिखाना चाहते थे. लग तो ऐसा रहा था जैसे कोई उच्च वर्ग का लड़की का बाप लड़की के निचले वर्ग के प्रेमी को हर तरह से हटाने के लिए आमादा हो. बिल्कुल आवेश में आकर बात करने लगे. उनके इस रवैये से मैं इतना घबराया कि लिखने विखने की बात भूल गया. वैसे भी उनकी रुचि लड़की को ठिकाने लगाने और इसमें मेरा सहयोग लेने की लग रही थी. तो मैं उस दिन नवभारत टाइम्स को नमस्कार करके बाहर निकल आया.

मेरे से एक वरिष्ठ पत्रकार नवभारत टाइम्स में लिखते रहते थे. फिर अचानक उनका लिखना बंद हो गया, इसके सापेक्ष पहाड़ के घोषित हितैषी पत्रकार जी ज्यादा छपने लगे. मैंने अपने वरिष्ठ से उनके न लिखने/न छपने का कारण पूछा, तो पहले उन्होंने हीला-हवाला करके नहीं बताया, मुझे थोड़ा अजीब लगा. मैने फिर पूछा.

मेरे फिर पूछने पर उन्होने बताया कि डेस्क इंचार्ज साहब के साले साहब का यहां की किसी लोकल लड़की के साथ हेलमेल है जो उनके परिवार को कतई स्वीकार नहीं है. वह किसी तरह से लड़की से पिंड छुड़वाना चाह रहे हैं. उन पर इस काम में सहयोग देने के लिए लिए दबाव डाला उन्होंने मना कर दिया. तो इसीलिए उनका लिखना बंद हो गया जबकि वह पहले से आखबार में लिख रहे थे.

पता चला ये उसी लड़की का मामला था जो मुझे चौथी दुनिया में मिली थी. यह भी याद आया कि कैसे डेस्क इंचार्ज साहब गुस्से और आवेश से लड़की को ठिकाने लगाने की बात कर रहे थे. मुझे सुनकर बुरा लगा. मैं कर भी क्या सकता था. दो युवाओं की नैसर्गिक लगाव में तीसरे और चौथे पक्ष का दखल देना, इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती थी. पर यह विडम्बना त्रासदी में बदल जाएगी, ऐसी मैने कल्पना नहीं की थी.

कुछ दिन बाद एक दिन शाम को पत्नी ने स्कूल से लौटकर बताया कि उनकी एक पुरानी अध्यापिका की बेटी ने आत्महत्या करली है. उन्होंने लड़की का बड़ा प्यारा सा घरेलू नाम बताया. जब उन्होंने यह बताया कि वह दिल्ली के अखबार में काम करती थी, उसको किन्हीं प्रभावशाली लोगों ने बहुत प्रताड़ित और परेशान किया था, परिवार सदमें में आ गया और कुछ बोलने को तैयार नहीं था, तो मैंने आशंकित होकर उसका असली नाम पूछा जानकार मैं स्तब्ध रह गया. मेरे सामने उसका चेहरा और पिछली घटनाएं आ गईं. कुछ देर तक तो मैं पत्रकारिता वाली इस गैरत की कीचड़ धंसा चला गया. ओह तो एक सीधे-सादे आपसी रिश्ते का अंजाम हत्या तक पहुंच गया. मेरी प्रतिक्रिया देखकर पत्नी हैरत कर रही थी. धीरे-धीरे मैने चौथी दुनिया से शुरू हुई पूरी कहानी बता दी. वह भी कुछ देर के लिए जड़ हो गईं. हम दोनों के सामने कहानी के अलग-अलग हिस्से थे. हम कुछ कह भी नही सकते थे, बता भी नहीं सकते थे. दुख यह भी था कि यह जातिगत दुराग्रह या कुछ और क्या था? लड़का और लड़की दोनों एक ही जाति के थे. बस पहाड़ और देस का फर्क था.

मैं तब कुछ नहीं कर सका यह अपराधबोध वर्षों तक सालता रहा, पर मेरे आसपास कोई असर नहीं पड़ा कोई चर्च नहीं मुझे नहीं सुनाई दी. गौला नदी में पहाड़ से आया बहुत पानी नहरों के जरिए शहर से होकर बह गया… और उसमें सारी शर्म सब पाप बह गए.

 

रानीखेत में जन्मे इस्लाम हुसैन फिलहाल काठगोदाम में रहते हैं. 1977 से ही लेखन और पत्रकारिता से जुड़े इस्लाम की कहानियां, कविताएँ, लेख और रपट विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. कुछ वर्षों तक एक सार्वजनिक उपक्रम में प्रशासनिक/परियोजना अधिकारी के रूप में काम कर चुके इस्लाम हुसैन ने एक साप्ताहिक पत्र तथा पत्रिका का संपादन भी किया है. कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं. अपने ब्लॉग ‘नारीमैन चौराहा” में संस्मरण लेखन व ट्यूटर में “इस्लाम शेरी” नाम से कविता शायरी भी करते हैं.

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Sudhir Kumar

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