Featured

समाज में पर्यावरण के प्रति महिलाओं का दृष्टिकोण

भारतीय समाज के निर्माण में महिलाओं की महत्ती भूमिका रही है. यहां की महिलाओं ने घर, परिवार, समाज एवं राजकीय कार्यों में भी अपनी एक विशेष पहचान दर्ज करवाई है, वहीं सबसे ज्यादा योगदान इनका कला व संस्कृति के क्षेत्र में रहा है. कला एवं संस्कृति के इन कार्यों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जल तथा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है.
(Women & Environment)

दिन की शुरुआत नए सवेरे के साथ और 21वीं सदी की महिला के दिन की शुरुआत फेसबुक व वाट्सअप पर स्टेटस अपडेट करने से होती है. इस इन्टरनेट के जाल ने न केवल महिलाओं को अपितु बच्चे से लेकर वृद्ध तक को अपने व्यूहचक्र में फंसा लिया है. हम बात कर रहे है समाज के उस वर्ग की जिनकी भूमिका से ही समाज उन्नति के पथ पर अग्रसर हुआ है, यह वर्ग है, महिलाओं का वर्ग. महिला अपने आचार-व्यवहार से न केवल अपने परिवार को प्रभावित करती है बल्कि देश और काल को भी प्रभावित करती रही है. जिस सोच-समझ का महिला चिंतन करती है उसी के अनुरूप समाज की सोच हो जाती है.

आज के इस भौतिकवादी युग में पर्यावरण एवं जल संरक्षण के लिए किसी के लिए सोचने-समझने के लिए समय कहाँ है? अब स्मरण करते है आज से सात-आठ दशक पहले की महिला की, जिनके बारे में हम अपनी दादी-नानी से भी सुनते हैं. उस समय की महिला के दिन की शुरुआत ही पर्यावरण एवं जल संरक्षण से होती थी. हाँ, ये जरूर था कि वो इस आधुनिक शब्द – पर्यावरण एवं जल संरक्षण का अर्थ आज के संदर्भ की तरह नहीं समझती थी. फिर भी उनके धर्म-कर्म में पर्यावरण एवं जल संरक्षण के कार्य प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से समाहित थे.

जल को देवतुल्य समझकर अमृत की तरह काम में लिया जाता था. घर-गृहस्थी की सार-सम्भाल के साथ साथ महिलाओं द्वारा अपनाये गए विभिन्न आयाम थे जिससे मरुस्थल के क्षेत्र में जल की कमी के बावजूद जल प्रबंधन शत-प्रतिशत था. महिलाओं द्वारा सभी शुभ-अशुभ अवसरों पर किये जाने वाले अनुष्ठान में जल की आवश्यकता और महत्ता को ध्यान में रखते हुए इसके संरक्षण हेतु भरसक प्रयत्न्न किये जाते थे. प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक महिलाओं के बारे में विभिन्न जानकारी हमें अभिलेखों, शिलालेखों, पाण्डुलिपियों एवं साहित्य से मिलती है. इन्ही स्रोतों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजगृह में रहने वाली महिलाओं के अतिरिक्त जनसामान्य वर्ग की महिलाओं ने भी जल एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक उद्योग किये थे. इनकी झलक यहां महिलाओं द्वारा किये जाने वाले प्रत्येक कार्यों में मिलती है, जिनमें विभिन्न निर्माण कार्यों, चित्रकला, मेहँदी, मांडना, कढ़ाई-बुनाई, लोकगीत-संगीत प्रमुख थे.

राजस्थान के संदर्भ में देखे तो यहां के सैंकड़ों जलाशय इस वर्ग द्वारा निर्मित किये हुए है और जलाशयों के साथ-साथ यहां बाग-बगीचे एवं बाड़ियाँ भी निर्मित की गई थी, जिनमें इतिहास के क्रम से देखे तो यहां का प्राचीनतम जलाशय लाहिनी बाव है, जिसका निर्माण 11वीं शताब्दी में परमार पूर्णपाल की छोटी बहन व विग्रहराज की पत्नी लाहिनी ने करवाया था. इसके अतिरिक्त घोसुण्डी की बावड़ी, विरुपरी बावड़ी, नौलखा बावड़ी, रानीसर तालाब, गुलाब सागर, रावटी का तालाब, कोडमदेसर, बांदीकुई, एवं सेठानी का जोहड़ा इत्यादि महिलाओं द्वारा निर्मित जल-स्त्रोत है. इसी क्रम में यहां की नारी का प्रकृति से घनिष्ठ संबन्ध रहा है. इस प्रकृति प्रेम को विभिन्न बाग-बगीचों के रूप में देख सकते हैं, जो आज भी विश्व प्रसिद्ध हैं, जिनमें सिसोदिया रानी का बाग, केसर बडारण का रामबाग, रूपा बडारण का बाग, मांजी का बाग एवं राई का बाग मुख्य है.

महिलाओं के द्वारा किये गए इन कार्यों से न केवल समाज को जल समस्या से निजात मिलती थी अपितु उनके समाज की भावी भावी पीढ़ी भी इस पारम्परिक रीति-रिवाजों का अनुसरण करती थी. वहीं आज के इस मल्टी-मीडिया के युग में नारी इन धार्मिक-सामाजिक कार्यों को भूल सी गई है. उनके पास समय ही नहीं होता कि वो इस ताम-झाम की दुनियाँ से बाहर निकलकर अपने समाज-संस्कृति के लिए कुछ कर सके, और इसी नक्शेकदम पर बच्चे आगे बढ़ रहे है.
(Women & Environment)

सरकार करोड़ों-अरबों रुपए इस संदेश को फैलाने में खर्च करती है कि ‘पानी बचाओ, प्रकृति बचाओ’. इन सबके लिए रामबाण तो हमारे समाज की महिलाऐं हैं क्योंकि औरत बच्चे की प्रथम गुरु होती है और यदि यही गुरु बच्चों में पर्यावरण एवं जल संरक्षण को उनके संस्कारों में शामिल करे तो न केवल आज की इस समस्या-जलाभाव से निपटा जा सकता है बल्कि वहीं हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य का निर्माण भी कर सकते है. इसलिए 21वीं सदी की महिला को इस आधुनिकीकरण के साथ-साथ उन पारम्परिक आदर्शों को अपनाना चाहिए जो वर्तमान के साथ भविष्य की भी जरूरत है.
(Women & Environment)

डॉ. मीना कुमारी

डॉ. मीना कुमारी का जन्म राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की भादरा तहसील के डाबड़ी गाँव में हुआ. डॉ. मीना वर्तमान में दीनदयाल शोध संस्थान, दिल्ली के साथ रिसॉर्स पर्सन के तौर पर संलग्न हैं. राजस्थान के बीकानेर क्षेत्र के ‘परंपरागत जल प्रबंधन एवं तकनीक’ विषय पर डॉ. मीना कुमारी का विशेष कार्य है.

इसे भी पढ़ें: उत्तराखंड का परंपरागत जल स्त्रोत नौला

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

Support Kafal Tree

.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

2 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

2 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

2 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

2 weeks ago