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अच्छे लेखक को कुछ भी बरबाद नहीं कर सकता है

विलियम फॉक्नर का साक्षात्कार

अनुवाद : शिवप्रसाद जोशी

 

पेरिस रिव्यू ने विश्व साहित्यकारों के सबसे दुर्लभ साक्षात्कार किये हैं, जिनकी चर्चा 50 सालों के बाद भी जीवित हैं. इनको पढ़ते हुये लेखक की सर्वोच्चता और साहित्यिक आनंद की उपलब्धि होती है. उन साक्षात्कारों के कुछ दुर्लभ अनुवाद हिन्दी में लगभग विस्मृत कर दिये गये शालिग्राम शुक्ल ने किये थे. शालिग्राम शुक्ल ने टामस मान के ‘ब्लैक स्वान’ का एक उत्कृष्ट अनुवाद भी हिन्दी में किया था. हमारी पुरानी यादें प्रस्तुत साक्षात्कार के कारण ताज़ा हो गई है.  शानदार पत्रिका, ‘पेरिस रिव्यू’ को पहल का सैल्यूट.

‘‘अच्छे लेखक को कुछ भी बरबाद नहीं कर सकता है’’

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमेरिकी उपन्यासकार विलियम फॉक्नर (1897-1962) के एक प्रसिद्ध साक्षात्कार का अंश. प्रस्तुत इंटरव्यू मशहूर साहित्यिक पत्रिका द पेरिस रिव्यू के साक्षात्कारों के डिजिटल अभिलेखागार से साभार लिया गया है. मूल अंग्रेज़ी में ये इंटरव्यू 1956 में न्यूयार्क शहर में ज़्यां श्टाइन वान्डेन हावेल ने लिया था.

श्रीमान फॉक्नर कुछ देर पहले आप कह रहे थे कि आपको इंटरव्यू देना पसंद नहीं है.

मुझे इंटरव्यू इसलिए पसंद नहीं हैं क्योंकि निजी सवालों पर मैं हिंसक ढंग से रिएक्ट करता हूँ. सवाल अगर काम के बारे में हैं, तो मैं उनका जवाब देने की कोशिश करता हूँ. अपने बारे में पूछे गये सवालों के जवाब मैं दे भी सकता हूँ या नहीं भी दे सकता हूँ, लेकिन अगर मैं दूँ, और वही सवाल कल पूछा जायेगा तो जवाब अलग हो सकता है.

लेखक के तौर पर आप अपने बारे में बताइये.

अगर मेरा वजूद न होता तो कोई और मुझे लिखता. हेमिग्वें, दॉस्तोएवस्की, हम सब, इसका सबूत ये है कि शेक्सपियर के नाटकों के लेखक के रूप में तीन उम्मीदवार हैं. लेकिन अहमियत दरअसल इस बात की नहीं है कि ‘हैमलेट’ और ‘ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम’किसने लिखा था, बल्कि इस बात की है कि वास्तव में किसी ने लिखा ही था. कलाकार की कोई अहमियत नहीं है, जो वो रचता है,अहमियत उसकी है क्योंकि कहे लायक कुछ भी नया नहीं है. शेक्सपियर, बाल्ज़ाक, होमर ने एक ही तरह की चीज़ों के बारे में लिखा, और अगर वे एक हज़ार साल या दो हज़ार साल ज़िंदा रहते, तो प्रकाशकों को किसी और की ज़रूरत ही नहीं पड़ती.

फिर भी अगर कुछ ज़्यादा कहने को कुछ भी न लिखता होतो क्या शायद लेखक की वैयक्तिकताइंडिविजुएलिटी महत्वपूर्ण नहीं हो जाती.

बहुत महत्वपूर्ण होती है अपने लिए. बाकी सब लोग काम में बहुत व्यस्त हैं लिहाज़ा इसकी चिंता किसी को नहीं होती.

और आपके समकालीन.

हम सब परफेक्शन के अपने सपने से तालमेल बिठाने में नाकाम रहे. इसलिए मैं सबको असंभव कर गुज़रने की अद्भुत विफलता के आधार पर तौलता हूँ. मेरी राय में, अगर मैं अपनी सारी रचनाएँ दोबारा लिख पाता, मुझे यकीन है कि मैं बेहतर ही करता, जो कि किसी रचनाकार के लिए सबसे स्वस्थ शर्ते है. इसलिए वो काम करता जाता है, कोशिश करता रहता है, वो हर बार मानता है कि इस बार वो कर गुज़रेगा, कुछ निकाल ही लेगा, ज़ाहिर है वो ऐसा नहीं कर पाता, इसलिए ये शर्त स्वस्थ है. एक बार वो कर ले, एकबारगी वो छवि और स्वप्न के बरक्स अपने काम को ले आता है तो उसका गला कटना तय है गोकि वो संपूर्णता के चरमोत्कर्ष के उस पार छलाँग लगा जाता है जिसे आत्महत्या कह सकते है, मैं एक विफल कवि हूँ. हो सकता है हर उपन्यासकार पहले कविता लिखना चाहता हो, फिर पाता हो कि नहीं लिख सकता और तब एक छोटी कहानी पर हाथ आज़माता हो जो कविता के बाद सबसे चुनौतीपूर्ण विधा है. और उसमें भी नाकाम हो जाने के बाद ही वो उपन्यास लिखना शुरू करता है.

क्या एक अच्छा उपन्यासकार बनने के लिए कोई संभव फॉर्मूला है जिसे फॉलो किया जाए.

निन्यान्वे प्रतिशत प्रतिभा … निन्यान्वे प्रतिशत अनुशासन … निन्यान्वे प्रतिशत काम, जो भी हो करता है उससे उसे काभी संतुष्ट नहीं होना चाहिये, हो सकता है से ये कभी अच्छा नहीं होता है, हमेशा स्वप्न देखो और निशाना हमेशा अपनी सामथ्र्य से आगे जाकर साधो. इस बात पर न इतराया करो कि तुम अपने समकालीनों या अपने पूर्ववर्तियों से बेहतर बन गए हो. अपने से बेहतर होने की कोशिश करो. एक कलाकार वो प्राणी है जिसे दैत्य दौड़ाते हैं, वो नहीं जानता है कि उन्होंने उसे ही क्यों चुना और असल में उसे ये सब सोचने की फुरसत भी नहीं है. इस बारे में वो कतई सदाचार निरपेक्ष है कि अपना काम निकालने के लिए वो कुछ हथिया लेगा,उधार माँग लेगा, गिड़गिड़ायेगा और किसी से भी और सबसे कुछ न कुछ चुरा लेगा.

आपके कहने का मतलब ये है कि लेखक को पूरी तरह बेदर्द होना चाहिए.

लेखक की अकेली जवाबदेही अपनी रचना के प्रति है, अगर वो अच्छा रचनाकार है तो वो पूरी तरह निष्ठुर होगा. उसका एक स्वप्न है. वो उसे इतना तड़पाता है कि उससे छुटकारा पाना ज़रूरी है. उसे तब तक शांति नहीं. किताब लिखे जाने के लिए हर चीज़ तय ढंग से होती है: सम्मान, गर्व, गरिमा, सुरक्षा, प्रसन्नता, सब कुछ, अगर लेखक को अपनी मां को भी ठगना पड़े, तो वो हिचकिचाएगा नहीं.

तो क्या फिर सुरक्षाखुशीसम्मान की कमी रचनाकार की सृजनात्मकता में एक अहम फैक्टर हो सकता है.

नहीं. वे सिर्फ उसकी शांति और संतोष के लिए ही अहम हैं और कला का शांति और संतोष से कोई लेना देना नहीं है.

तब फिर लेखक के लिए सबसे अच्छा पर्यावरण क्या होगा.

कला का पर्यावरण से भी कोई संबंध नहीं है; उसे इसकी परवाह नहीं है कि वो कहाँ है. अगर आप मेरे बारे में पूछ रहे हैं तो आपको बताऊँ मुझे जो सबसे अच्छा काम मिला था वो एक कोठे में ताबेदारी का था. मेरी राय में किसी लेखक के लिए ये एक सबसे अच्छा परिवेश हो सकता है. उसे पूरी तरह आर्थिक आज़ादी हासिल होती है. भय और भूख से वो मुक्त रहता है; उसके सिर पर छत रहती है और करने के लिए यही होता है कि कुछ खाते संभालना और हर महीने एक बार जाकर लोकल पुलिस को पैसे दे आना. सुबह के वक्त वो जगह शांत होती है, दिन भर का सबसे सही वक्त वही होता है काम करने के लिए. शाम के वक्त काफी चहलपहल रहती है,अगर वो शामिल होना चाहे, बोरियत से बचने के लिए, अपने समाज में उसे एक खास जगह मिलती है, उसे कुछ नहीं करना होता है क्योंकि मैडम किताबें रखती है, मकान में सभी मनुष्य औरतें हैं और कोई उसे कुछ नहीं कहेगी और उसे सर कहेगी. अड़ोसपड़ोस के तमाम शराबी कबाबी भी उसे सर कहेंगे. और वो पुलिस के लोगों को उनके नाम से बुला सकेगा. लिहाज़ा कलाकार को सिर्फ उतना ही पर्यावरण चाहिए जिसमें कम से कम कीमत पर कितनी भी शांति, कितना भी एकांत और कितनी भी खुशी हासिल हो सके. ग़लत पर्यावरण से उसका ब्लडप्रेशर बढ़ेगा, ज़्यादा वक्त वो कुंठित और चिड़चिड़ा रहेगा. मेरा अपना अनुभव ये है कि अपने काम के लिए मुझे जो औजार चाहिए वे हैं काग़ज़, तंबाकू, खाना और थोड़ी व्हिस्की.

आपके कहने का मतलब बोरबोन है न.

नहीं मैं इतना पर्टिकुलर नहीं हूं. स्कॉच और ‘‘कुछ नहीं’’ के बीच मैं स्कॉच चुनूँगा.

आपने आर्थिक आज़ादी का ज़िक्र किया. क्या लेखक को उसकी ज़रूरत है.

नहीं. लेखक को आर्थिक आज़ादी नहीं चाहिए. उसे बस चाहिए एक कलम और कुछ काग़ज़. पैसों के उपहार पाकर मुझे कभी नहीं लगा कि लेखन में कुछ अच्छा निकल पाया हो. एक अच्छा लेखक फाउंडेशन के लिए कभी याचिका नहीं देता. वो कुछ न कुछ लिखने में इतना व्यस्त रहता है. अगर वो आला दर्जे का नहीं है तो वो ये कहकर खुद को मूर्ख बनाता रहेगा कि उसे समय नहीं मिला या उसे आर्थिक आज़ादी नहीं मिली. अच्छी कला चोर उचक्कों से भी आ सकती है. शराबियों से भी या घोड़ों की देखरेख और सफाई करने वालों से भी. लोग वाकई इस बात से डरते हैं कि वे आिखर कितनी मुश्किलें, कितनी ग़रीबी झेल सकते हैं. वे ये तलाश करने से डरते हैं कि वे कितने कडिय़ल हैं कितने पक्के हैं.

अच्छे लेखक को कुछ भी बरबाद नहीं कर सकता है. जो एक चीज़ अच्छे लेखक को बदल सकती है वो है मृत्यु. अच्छे लेखकों के पास सफलता से गदगद होने या रईस होने का वक्त नहीं है. अगर आप सफलता के सामने लोट जाएँगें, तो वह आप पर चढ़ बैठेगी. इसलिए उसे उलटे हाथ की एक लगाएं. तब हो सकता है कि वो रेंगने लगे.

फ़िल्मों के लिए काम करते हुए क्या आपके अपने लेखन पर चोट पहुँचती है.

अगर वो पहले दर्जे का लेखक है तो कोई भी चीज़ उसके लेखन को नुकसान नहीं पहुँचा सकती है. इसमें ज़्यादा कुछ नहीं किया जा सकता. समस्या तब नहीं आती अगरचे वो पहले दर्जे का नहीं है क्योंकि एक अदद स्विमिंग पूल के लिए वो अपनी आत्मा पहले ही बेच चुका होता है.

फ़िल्मों के लिए लिखते वक्त लेखक क्या लेखन से समझौता करता है.

हमेशा, क्योंकि चलचित्र अपनी प्रकृति से ही एक सहयोग है. और कोई भी सहयोग समझौता ही होता है क्योंकि उस शब्द का यही अर्थ है- लेना और देना.

आपको किन अभिनेताओं के साथ काम करना सबसे अच्छा लगता है.

हम्फ्रे बोगार्ट के साथ मैंने सबसे अच्छे ढंग से काम किया है. हम दोनों ने टू हैव एंड हैव नॉट और द बिग स्लीप में साथ काम किया है.

क्या आप दूसरी फ़िल्म बनाना चाहते हैं.

हाँ, मैं जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास 1984 पर एक फ़िल्म बनाना चाहता हूँ. मैं इस फ़िल्म में एक ऐसा अंत देना चाहता हूँ जो उस सिद्धांत को साबित कर देगा जिसका मैं पुरज़ोर समर्थन करता हूँ: आजादी की अपनी सरल सी कामना की वजह से ही मनुष्य अविनाशी है.

सिनेमा के लिए काम करते व$क्त आप सर्वोत्तम नतीजे कैसे निकाल पाते हैं.

सिनेमा में मेरा सबसे अच्छा काम तब ज़ाहिर होता है जब अभिनेता और लेखक पटकथा को किनारे $फेंक कर कैमरा रोल होने से कुछ पहले की वास्तविक रिहर्सल में दृश्य का आविष्कार कर लेते हैं. अगर मैं मोशन पिक्चर के काम को गंभीरता नहीं लेता जो मैं मानता हूं कि मैं ले सकता था तो अपने प्रति और फ़िल्मों के प्रति निहायत ईमानदारी से कहूँ तो मैं कोशिश ही नहीं करता. लेकिन मैं अब जानता हूँ कि मैं कभी भी अच्छा सिने लेखक नहीं बन सकूँगा, इसलिए इस काम की कोई अपरिहार्यता नहीं रहेगी जो मेरे अपने माध्यम में है.

आपने कहा कि सिनेमा के लिए काम करते हुए लेखक को समझौते करने होंगे. उसके लेखन का क्या होगाक्या अपने लेखक के प्रति उसकी कोई जवाबदेही है?

उसकी जवाबदेही इतनी ही है कि अपना काम जितना संभव हो अच्छे ढंग से कर दे. उसके बाद जो जवाबदेही बचे उसका इस्तेमाल जैसा चाहे वैसा करे. मेरे पास पब्लिक की परवाह करने का वक्त नहीं है. मुझे इस बारे में जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है कि मुझे कौन पढ़ रहा है. काम से संतुष्टि का मेरा अपना पैमाना है. मैं अगर ऐसा महसूस कर सकूं जैसा मैं La Tentation de Saint Antoine या ओल्ड टेस्टामेंट पढ़ते हुए महसूस करता हूं, तो वही मेरा पैमाना है. ये दोनों चीज़ें मुझे अच्छी लगती हैं. चिडिय़ा की उड़ान को देखकर मुझे अच्छा महसूस होता है. मेरा अगर पुनर्जन्म हुआ तो मैं गिद्ध बनकर आना चाहूँगा. कोई भी उससे नफरत नहीं करता या शत्रुता या ईष्र्या. कोई भी उसे चाहता नहीं है या उसकी किसी को ज़रूरत नहीं होती है. और उसे भी कोई परवाह नहीं होती, वो कभी खतरे में नहीं आता है. और वो कुछ भी खा सकता है.

आप लिखने के अपने पैमाने तय करने के लिए क्या तकनीक इस्तेमाल करते हैं?

अगर लेखक को तकनीक में दिलचस्पी है तो वे सर्जरी में चला जाए या मिस्त्री का काम करें. लेखन के लिए कोई एक यांत्रिक तरी$का नहीं है. कोई छोटा रास्ता नहीं है. मूर्ख होगा वो युवा लेखक जो किसी सिद्धांत को फॉलो कर रहा होगा. अपनी ग़ल्तियों से खुद को शिक्षित करो. लोग सिर्फ गल्तियों से ही सीखते हैं. अच्छा कलाकार मानता है कि उसे सलाह देने के लिए कोई इतना होशियार नहीं. उसके पास एक आला दर्जे का गर्व होता है. वो बुज़ुर्ग लेखक को कितना ही पसंद क्यों न करें, चाहता तो वो उसे हराना ही है.

तो क्या आप तकनीक की वैधता को खारिज कर देंगे?

नहीं बिल्कुल नहीं. कभीकभार तकनीक कमान संभालती है और लेखक के हाथ आज़माने से पहले ही उसके सपने को कमांड करने लगती है. ये टुअर डि फोर्स है. और पूरा हुआ काम साफ ढंग से एक साथ रखी गई ईंटों की तरह है क्योंकि लेखक पहला शब्द लिखने से पहले शायद अंत तक के हरेक शब्द को जानता है… लेकिन बाज़ मौके ऐसे होते हैं जब तकनीक हस्तक्षेप नहीं करती है और दूसरे अर्थ में देखें तो लिखना आसान भी हो जाता है. मेरे साथ किताब में हमेशा एक समय ऐसा आता जब किरदार खुदबखुद उठ खड़े होते हैं और कमान संभाल लेते हैं और काम खत्म कर देते हैं- मान लीजिए किताब की पेज संख्या 274 के आसपास. ज़ाहिर है मैं नहीं जानता हूं कि अगर मैं उसी पेज पर किताब पूरी कर दूं तो क्या होगा. एक कलाकार में अपने काम का मूल्यांकन करने के लिए वस्तुनिष्ठता का गुण हर हाल में होना चाहिए. उसके अलावा किसी किस्म का गुमान न पालने की ईमानदारी और साहस भी चाहिए. मुझे ‘‘साउंड एंड फ्यूरी’’ ने बेतरह दुख पहुंचाया और यातना दी. इसलिए मैं अपने हर काम को इस किताब की कसौटी पर आंकता हूं. ये ऐसा ही है – जैसे कोई मां अपने दो बच्चों में से उस बच्चे को ज़्यादा चाहती है जो चोर या हत्यारा बन जाता है बनिस्पत कि उसे, जो पादरी बनता है.

 

शिवप्रसाद जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं और जाने-माने अन्तराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों  बी.बी.सी और जर्मन रेडियो में लम्बे समय तक कार्य कर चुके हैं. वर्तमान में शिवप्रसाद देहरादून और जयपुर में रहते हैं. संपर्क: joshishiv9@gmail.com 

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