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कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति का एक और विवादित पत्र

कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.एस. राना एक बार फिर विवाद में फंस गए हैं. इस बार भी वे विवाद में अपने एक पत्र को लेकर ही फंसे है. अब उन्होंने उत्तराखण्ड के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र लिखा है. जिसमें उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय को एक स्वायत्त संस्था बताते हुए निर्वाचन आयुक्त को कहा है कि वे कुमाऊं विश्वविद्यालय के अध्यापकों व कर्मचारियों की लोकसभा, विधानसभा, नगर निकाय व पंचायत के सामान्य निर्वाचन में चुनाव की ड्यूटी न लगायें. कुलपति राना ने ऐसा करने पीछे तर्क के साथ लिखा है कि चूँकि विश्वविद्यालय एक स्वायत्त संस्था है और यहां के अध्यापक व कर्मचारी किसी न किसी राजनैतिक दल से प्रेरित और उससे सम्बंद्ध रहते हैं. ऐसे में उनसे चुनाव की ड्यूटी लेने से चुनाव की निष्पक्षता और उसकी गोपनीयता पर असर पड़ता है. (V.C. of Kumaun university in Controversy)

कुलपति ने अपने पत्र में आगे लिखा है कि चुनाव ड्यूटी के कारण विश्वविद्यालय के शिक्षण एवं परीक्षा से सम्बंधित आवश्यक कार्यों पर भी असर पड़ता है. विश्वविद्यालय में दो सेमेस्टरों में परीक्षीएँ क्रमश: मई-जून व नवम्बर-दिसम्बर में सम्पादित होती है. शिक्षकों के चुनाव ड्यूटी पर जाने से परीक्षा प्रणाली पूरी तरह से चौपट हो जाती है तथा शिक्षा सत्र भी प्रभावित होता है. यहॉ तक तो ठीक था. यह एक सही बात है भी. पिछले कई चुनावों में इसी कारण से विश्वविद्यालय के कई अध्यापकों व कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी से इसलिए हटाना पड़ा था, क्योंकि वे किसी न किसी राजनैतिक दल के न केवल सक्रिय कार्यकर्ता थे, बल्कि कुछ तो उनमें पदाधिकारी तक थे. (V.C. of Kumaun university in Controversy)

विवाद का कारण प्रदेश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लिखे पत्र का तीसरा बिन्दु है. जिसमें कुलपति ने लिखा है कि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर सम्मानित वर्ग हैं. उन्हें चुनाव ड्यूटी के दौरान किसी गांव, गली में भेजना उनकी गरिमा के विरुद्ध है. कुलपति का यह पत्र 15 अक्टूबर 2019 को सोशल मीडिया में वाइरल होते ही कुलपति की आलोचना होने लगी और यह सवाल किया जाने लगा कि किसी विश्वविद्यालय के किसी अध्यापक का किसी भी कारण से गांव में जाना उनकी गरिमा के विरुद्ध कैसे हो गया? और ऐसा कब से होने लगा? जब अपने शोध के लिए ये लोग गांवों में जाते हैं तो तब उनकी गरिमा क्यों नहीं गिरती? और जो लोग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर हैं क्या उनमें से अधिकतर का नाता किसी न किसी तौर पर गांव से नहीं रहा है? क्या कुलपति यह चाहते हैं कि उनकी गरिमा को बचाए रखने के लिए चुनाव में ड्यूटी केवल शहरों में ही लगाई जाय? वे चुनाव में ड्यूटी लगाए जाने के खिलाफ हैं कि गांवों में ड्यूटी लगाए जाने के?

कुलपति की इस बात पर कुछ लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. अमर उजाला में 16 अक्टूबर को चौखुटिया (अल्मोड़ा) से छपी एक खबर के अनुसार, अल्मोड़ा जिले के पूर्व जिला पंचायत सदस्स व भाजपा नेता गणेश नायक, पूर्व जिला पंचायत सदस्य बालादत्त तिवारी, कॉग्रेस के चौखुटिया ब्लॉक अध्यक्ष गोपाल मासीवाल, अल्मोड़ा के पूर्व जिला पंचायत सदस्य महेश वर्मा, उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के नेता विपिन शर्मा आदि ने कुलपति के इस दलील पर घोर आपत्ति दर्ज की है और कहा कि क्या कुलपति यह समझते हैं कि प्रोफेसर गांव में पैदा हुए लोग नहीं होते हैं. राजकीय शिक्षक संघ के चौखुटिया ब्लॉक अध्यक्ष भारतेन्दु जोशी सहित कई शिक्षकों ने भी गांव को लेकर कुलपति के नजरिए को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया. इन शिक्षकों ने तो यहॉ तक कहा कि कुलपति का पूरा नजरिया गांवों के खिलाफ दिथाई देता है. शायद यही कारण है कि उसी वजह से गांवनुमा कस्बों में स्थित महाविद्यालयों में शिक्षकों का बेहद अभाव है. शिक्षकों की कमी के कारण गांव व कस्बों के बच्चे चाहते हुए भी अपने कस्बों में स्थित महाविद्यालयों में नहीं पढ़ पाते हैं.

जब किसी भी तरह के चुनाव में गांवों के मतदाताओं की भी उतनी ही भागीदारी होती है, जितनी कि शहर में रहने वाले मतदाताओं की, तो फिर गांव के लोगों के साथ यह भेदभाव करने वाला व्यवहार क्या किसी विश्वविद्यालय के कुलपति की पद की गरिमा के खिलाफ नहीं है? इसके साथ ही यह वैधानिक सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या किसी कुलपति को राज्य के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को किसी भी तरह का निर्देश देने का अधिकार प्राप्त है? यह सवाल इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि उत्तराखण्ड के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लिखे पत्र के अंत में कुलपति प्रो. राना ने यह लिखा है, ” अत: कुमाऊं विश्वविद्यालय से किसी भी शिक्षक को भविष्य में चुनाव एवं मतगणना ड्यूटी से अवमुक्त रखे जाने के आदेश जारी करें.” इस वाक्य में निर्वाचन आयुक्त से अनुरोध नहीं, बल्कि उन्हें निर्देशित कर के कहा गया है कि “निर्देश जारी करें.” कुलपति के पत्र की इस तरह की भाषा ने अगर वैधानिक विवाद पैदा किया तो कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति के लिए परेशानी पैदा हो सकती है.

अपने पत्र पर हो रही आलोचना के जवाब में कुलपति ने 15 अक्टूबर को ही कहा कि प्रोफेसर का पद “ए ग्रेड” का है. उनका कैडर डीएम से भी ऊपर है. ऐसे में सी ग्रेड के कर्मचारियों के साथ-साथ गांव-गली में उनकी ड्यूटी लगाना सम्मानजनक नहीं है. कुलपति की इस तरह की प्रतिक्रिया से साफ पता चलता है कि उन्हें चुनाव प्रक्रिया की कोई जानकारी नहीं है. चुनाव में ग्रेड के अनुसार ही जिम्मेदारी दी जाती है. “ए ग्रेड” पाने वाले किसी भी तरह के कर्मचारी की चुनाव में आमतौर पर ड्यूटी गांव-गली में नहीं लगती है. उनकी ड्यूटी सेक्टर मैजिस्ट्रेट के तौर पर लगती है और इन लोगों को चुनाव की ड्यूटी तक एक मजिस्ट्रेट के पूरे अधिकार होते हैं. ऐसे में जब एक प्रोफेसर को मजिस्ट्रेट बनाया गया तो उनकी गरिमा कहॉ गिरी? और क्या सेक्टर मजिस्ट्रेट बनाया जाना प्रोफेसरों के पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है? और यह भी कि डीएम का पद क्या “ए ग्रेड” का नहीं होता है?

दूसरा यह कि कुलपति जैसे संवैधानिक पद पर रहने के बाद भी प्रो. राना के अन्दर अपने से कम ग्रेड वाले कर्मचारियों के प्रति किस तरह की दुर्भावना भी व्याप्त है. वे उन्हें कम ग्रेड के कारण ” इज्जत ” देने लायक ही नहीं मानते हैं. ऐसे में यह समझा जा सकता है कि अपनी इस मानसिकता के कारण वे विश्वविद्यालय के कम ग्रेड वाले कर्मचारियों के साथ किस तरह का व्यवहार करते होंगे? सबसे बड़ा सवाल है कि क्या कम ग्रेड वाले कर्मचारियों के बिना कोई संस्था या विभाग का अस्तित्व बन सकता है? विश्वविद्यालय में अगर शिक्षणेत्तर कर्मचारी नहीं होंगे तो कुलपति के पद की गरिमा बनी रह सकती है? उनके बिना कुलपति क्या करेंगे? अपने से कम ग्रेड वालों के साथ काम करने में क्या कुलपति को हीनभावना आती है? अगर ऐसा है तो वे विश्वविद्यालय के हर तरह के शिक्षणेत्तर कर्मचारियों को अपने ही बराबर ग्रेड देने की मॉग क्यों नहीं करते? क्या वे ऐसा करेंगे? ये किस तरह की मानसिकता से ग्रसित हैं कुलपति राना?

कुलपति के लिखे पत्र पर इससे पहले भी पिछले महीने बहुत विवाद हो चुका है. जिसके लिए बाद में उन्हें ” खेद ” तक व्यक्त करना पड़ा था. उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. केएस राना के एक पत्र के बाद तब विवाद उत्पन्न हो गया था जब उन्होंने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को गत 6 सितम्बर 2019 को लिखे एक पत्र में उत्तराखण्ड के तथाकथित विकास के लिए उत्तर प्रदेश के तीन जनपदों पीलीभीत, बिजनौर व सहारनपुर को शामिल करने की सुझाव रूपी मॉग की थी. अपने पत्र में कुलपति राना ने लिखा कि उत्तर प्रदेश के इन जनपदों को उत्तराखण्ड में शामिल करने से राज्य न केवल उत्पादकता में आगे बढ़ेगा, बल्कि आत्मनिर्भर भी बनेगा.

अपने पत्र में कुलपति राना ने कहा कि वर्ष 2,000 में उत्तराखण्ड अलग राज्य बना था, लेकिन बीस साल बाद भी यह राज्य अपने आप में अपूर्ण है. यहॉ रोजगार और कृषि के संकट के कारण पलायन लगातार बढ़ रहा है. राना ने इसके समाधान के लिए प्रधानमन्त्री मोदी को लिखे पत्र में सुझाव दिया कि यदि उत्तर प्रदेश से अलग कर के पीलीभीत, बिजनौर व सहारनपुर जनपदों को उत्तराखण्ड में शामिल कर दिया जाय तो इससे उत्तराखण्ड में न केवल उत्पादकता बढ़ेगी, बल्कि वह एक आत्मनिर्भर राज्य भी बन सकेगा. अपने पत्र में राना ने दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने के लिए उसके पुनर्गठन का भी सुझाव दिया था. उन्होंने अपने पत्र में कहा कि दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की मॉग भी बहुत पुरानी है. उसके लिए दिल्ली को केन्द्र शासित राज्य बनाते हुए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शामिल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिस्से को दिल्ली में शामिल कर दिया जाय. इसके साथ ही उत्तर प्रदेश का भी विभाजन कर के बुंदेलखण्ड और पूर्वांचल नाम से दो राज्य बनाए जाने चाहिए. बुंदेलखण्ड में मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले सहित कुछ और हिस्सों को शामिल करते हुए ग्वालियर को राजधानी बनाया जाय. उत्तर प्रदेश के शेष हिस्से को पूर्वांचल नाम देकर उसकी राजधानी वाराणसी बनाई जानी चाहिए.

कुलपति के इस पत्र में सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली और मध्य प्रदेश के पुनर्गठन का सुझाव एक तरह से दिया गया था. भले ही कुलपति राना ने अपने पत्र में इन राज्यों के पुनर्गठन किए जाने सम्बंधी कोई बात न लिखी हो, पर बिना राज्यों के संवैधानिक पुनर्गठन के ऐसा कैसे होगा? साथ ही सबसे बड़ा सवाल यह था कि एक विश्वविद्यालय के कुलपति को ऐसा पत्र लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी? वे कुमाऊं विश्वविद्यालय में शैक्षिक पाठ्यक्रमों को अत्याधुनिक बनाने के बारे में कोई सुझाव देने या फिर विश्वविद्यालय में कुछ ऐसे नए पाठ्यक्रम शुरु करने की बात कहने की बजाय बैठे – ठाले राज्यों के पुनर्गठन जैसा बेहूदा सुझाव प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिख कर देने लगे.

प्रधानमन्त्री मोदी को लिखे गए पत्र के अखबारों में प्रकाशित होने के बाद राजनैतिक बवाल होना तय था और वह हुआ भी. प्रधानमन्त्री को पत्र लिखने के बाद राजनैतिक दलों व आन्दोलनकारी संगठनों के निशाने पर आए कुलपति प्रो. केएस राना ने 9 सितम्बर 2019 को न्यूज पोर्टल ” हिलवार्ता ” से बात करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य उत्तराखण्ड की जनभावना को आहत करना नहीं था और न हीं वे अब इस बात को आगे बढ़ाना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि अगर उनके द्वारा प्रधानमन्त्री को लिखे गए पत्र से राज्य के लोगों को ठेस पहुँची है तो वे इसके लिए खेद व्यक्त करते हैं. उन्होंने पत्र क्यों लिखा और इसके पीछे उनकी मंशा क्या थी? यह सवाल पूछे जाने पर कुलपति ने कहा कि तीन साल पहले एक बैठक में यह मुद्दा उठा था और उस बैठक में इस पर चर्चा हुई थी. इधर, विश्वविद्यालय की एक बैठक में राज्य की बेहतरी के लिए क्या किया जाना चाहिए? यह सवाल उठा था. बस उसी को लेकर मैंने एक औपचारिक पत्र प्रधानमन्त्री को लिख दिया. जिस पर प्रतिक्रियाओं का सिलसिला चल पड़ा है. पत्र लिखने के पीछे मेरी किसी तरह की कोई गलत मंशा नहीं थी.

विवाद उत्पन्न होने पर अपने बचाव में कुलपति राना ने यह भी कहा कि वे तो राजस्थान के मूल निवासी हैं. उत्तर प्रदेश के जिन जिलों को उत्तराखण्ड में मिलाने की बात उन्होंने कही, उसके पीछे उनका कोई राजनैतिक या दूसरा स्वार्थ नहीं है. न इसके पीछे किसी तरह का राजनैतिक दबाव ही था. यह केवल उनका व्यक्तिगत विचार था. तब कुलपति ने यह भी कहा कि वह जानते हैं कि राज्य पलायन और अन्य समस्याओं से जूझ रहा है, इसीलिए उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय में बीए में एग्रीकल्चर विषय की पैरवी की और कक्षाएँ भी शुरु करवा दी हैं. आगे भी विश्वविद्यालय स्तर पर व्यवसायिक पाठ्यक्रम लाये जा रहे हैं. जिससे क्षेत्र के युवाओं को राज्य में ही बेहतर रोजगार मिल सके.

विवाद में फँसने पर कुलपति ने तब अपने लिखे पत्र पर खेद व्यक्त कर दिया था. पर इस बार अगर बात उनके वैधानिक अधिकार तक पहुँची तो कुलपति राना के लिए परेशानी पैदा हो सकती है. उनके पत्र पर यह विवाद तब सामने आया है, जब विश्वविद्यालय के पूर्णकालिक कुलपति के चयन का कार्य इन दिनों अंतिम चरण में है और प्रो. राना कुलपति की दौड़ में मजबूत दावेदार हैं. उल्लेखनीय राना इन दिनों कुमाऊं विश्वविद्यालय के अस्थाई कुलपति के तौर पर कार्यरत हैं. कुलपति ने अपने पत्र की प्रतिलिपि राज्यपाल के सचिव, कुलाधिपति सचिवालय (राजभवन, देहरादून), मुख्यमन्त्री के सचिव और उच्च शिक्षा के प्रमुख सचिव को भी प्रेषित की है.

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इसे भी पढ़ें : कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति का तुगलकी फरमान

काफल ट्री के नियमित सहयोगी जगमोहन रौतेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और हल्द्वानी में रहते हैं. अपने धारदार लेखन और पैनी सामाजिक-राजनैतिक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं.

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Girish Lohani

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