गीता गैरोला

सियारों को जूठन में पलने का श्राप

कथाएं लगाने और सुनने सुनाने की कोइ उम्र नहीं होती. तो लीजिये मेरी कथा लगाने की, सुनने की कड़ी में दादी, दादाजी के अलावा एक नई पात्र अचानक शामिल हो गयी. याद नहीं कितने सालों या दशकों के बाद गंगा फूफू से मिलना हुआ. अभी बस चन्द दिन ही बीते पर अहसास आखिरी सांस तक, अगर याददाश्त रही, बना रहेगा.

हुआ ये कि मेरे पिताजी चल बसे. फूफू अपने बड़े भैजी के जाने पर आई और अपनी कथाओं का खजाना थमा गयी. मुझे बच्ची बन कर कितना मजा आया ये सिर्फ महसूस कीजिये. मेरी दो जुडवां फूफू हैं बड़ी जमना और छोटी गंगा. तो ये गंगी थी जिसके सामने मैं दशकों पहले के बच्चों की तरह रोज रात को कथा लगाने की जिद करती. पहले वो थोड़ा झिझकी पर कथा लगाने की मेरी रट के सामने वो खुद वही बचपन वाली मेरी फूफू बन गयी.

सफ़ेद और खिचड़ी बालों वाली, बदन पर असंख्य सुख-दुःख की लकीरों के जालों से उलझी, शरीर से थकी दो औरतें सात दिनों तक एक ऐसे गाँव को जीती रहीं जो अब उजड़ गया है. ऐसे रिश्तों का रस पीती रहीं जो समय की गर्त में गुम हो गए. कुछ कथाएँ बाहर कही गयीं और पता नहीं कितनी, कितने रिश्तों के साथ गुंथी अंतर्मन में चलती रहीं.

कभी दोनों एक दूसरे की लकीरों को सहलाती, कभी एक दुसरे के घुटनों को मलासती. कभी एक दूसरे का मजाक उड़ाती, कभी घर के बाकी लोगों को गुदगुदाती खुद कथा बन गयी.

भुली! न ये कथा पुरानी है और न नई. ये तो बस जब तक मानव रहेगा तब तक चलती रहेगी. त सुन… किसी गाँव में एक बहुत गरीब आदमी था. खूब मेहनत करता तब जा के अपने बाल बच्चों का पेट भर पाता. एक दिन वो जंगल के रास्ते किसी दूसरे गाँव जा रहा था. तभी उसे मैं… मैं… की आवाज सुनाई दी. जिधर से मिमियाने की आवाज आ रही थी वो उधर ही चल दिया.

देखता क्या है, दो छोटे-छोटे बकरी के बच्चे झाड़ी में उलझे हैं. उसने आस-पास देखा तो कोई नहीं. हे… ये बकरी के बच्चे किसके हैं? उसने जोर से धाद दी. सुनसान जंगल से कोई आवाज नहीं आई. गरीब आदमी था पर ईमान का पक्का. जब बहुत देर तक धाद लगा कर कहीं से कोई सूतपटाक नहीं हुई तो वह धर्मसंकट में पड़ गया.

अगर बच्चे छोड़ता है तो स्याल, बाघ खा जायेंगे. अगर अपने साथ ले के जाता है तो कोई चोरी न समझ ले. बहुत सोचने के बाद उसने तय किया कि वो बच्चों को अपने साथ घर ले कर जायेगा. आस-पास के गांवों में उस आदमी ने सबसे पूछा पर किसी को बकरियों के बारे में कुछ पता नहीं था.

फिर क्या बकरी के दोनों बच्चों का नामकरण हो गया. एक नाम रखा जौली और दूसरे का मौली. उस आदमी को बच्चों के लिए दोनों बकरियां अपनी साथी मिल गयी. वो धै लगाता ‘जौली-मौली’ और दोनों एक साथ मैं-मैं करती उछलती हाजिर. दिन बीते और दोनों बच्चे बड़े हो गए. दो साल के अंदर ही जौली, मौली के दो बच्चे हो गए. अब हो गयी चार बकरियां.

होते करते चार पांच सालों में ही जौली, मौली की बदौलत उस गरीब आदमी की गोट भर गयी. फिर क्या उसकी गरीबी जौली, मौली के कारण ख़त्म हो गयी. ये देख कर जौली, मौली भी मैं-मैं करती उछलती हुई आदमी की खुशी में शामिल हो जातीं. अब लगा उसे लालच. आदमी ने सोचा अब तो मेरे पास बकरियों की पूरी गोट हो गयी. जौली, मौली भी बूढ़ी होने लगी हैं, अब इनका क्या काम. उसने गांव के लोगों को काटने के लिए मौली को बेच दिया. इस बात से जौली बहुत दुखी हुई. वह रात भर रोती रही.

सुबह रोज की तरह आदमी बकरियों को चराने जंगल की तरफ चल दिया. जौली भी दुखी मन से जंगल चल दी. उसने सोच लिया कि अब चाहे जंगल में उसे बाघ स्याल खा दें, पर इस स्वार्थी आदमी के घर वापस नहीं आएगी. जंगल जाते ही वो एक झाड़ी में छिप गयी. बकरियों की भरी पूरी गोट के बीच आदमी को पता ही नहीं चला कि जौली उनमें शामिल नहीं है.

उस रात जौली झाड़ी में ही छिपी सोचती रही कि जब तक बची हुई है तब तक रहने-खाने के कुछ तो उपाय करने ही पड़ेंगे. दूसरे दिन जौली क्या देखती है कि जिस झाड़ी के अंदर वो छिपी थी, वहीँ पर एक बारात आ के रुक गयी. बारात ने उस जगह में खा-पी कर आराम किया और बचा हुआ खाना फेंक कर चल दी.

जौली ने देखा की वहां पर स्वाली और नोंणी (मक्खन) की जूठन पड़ी हुई है. बस फिर क्या, उसने झाड़ी को बीच से साफ किया. नोंणी की दीवार थेपी, पेड़ से छाल निकाल कर दीवार के ऊपर छत बनाई और स्वाली के द्वार बना कर आराम से रहने लगी. घनी झाड़ी के बीच बकरी का घर किसी जानवर को दिखाई नहीं दिया. जौली आस-पास ही घास चरती और आराम से रहने लगी.

थोड़े दिनों बाद उसने दो बच्चों को जन्म दिया. वो बच्चों को तीलू, मिलू कह के बुलाती. अब जौली को मौली की याद बिसरने लगी. जौली दिन भर आस-पास घास चरती और अपने बच्चों के लिए भी ले आती. बच्चों की मैं-मैं और उछलकूद से जौली को ये डर लगने लगा कि अब बाकी जानवरों को उनकी आवाज सुनाई देगी और वो बच्चों को मार न दें.

जौली ने अपने बच्चों को अड़ाया, देखो बे छोरों! जब मैं घर पर नहीं रहती तुम दोनों चुप रहना. घर का द्वार बंद रखना. मैं-मैं मत मिमियाना. किसी के लिए द्वार मत खोलना,चाहे कोई कितना ही बोले जबाब मत देना. जब मैं घर आऊंगी तब दो बार बोलूंगी, ‘नोंणया भित्ती पपड़या छती स्वाली द्वार तीलू मीलू द्वार उगाड़’ (मक्खन की दीवार ,पपड़ी की छत, पूरी की दीवारें, तीलू, मीलू द्वार खोलो) तभी तुम दरवाजे खोलना. अब रोज तीलू, मीलू घर के दरवाजे बंद कर चुपके-चुपके खेलते रहते.

एक दिन क्या हुआ बल! जब जौली ध्यान से इधर-उधर देखती घास का बोझा कमर में रखे अपने घर आ रही थी मंगलू स्याल ने उसे देख लिया. जौली को देख कर उसके मुँह में पानी आ गया. अहा रै! अगर मैं इस बकरी को मार दूंगा तो कम-से-कम चार-छह दिन के खाने की छुट्टी हो जायेगी. मंगलू घात लगा कर जौली का पीछा करने लगा. उसने सोचा मौका मिलते ही बकरी पर मार करूँगा.

तभी क्या देखता है कि बकरी एक घर का द्वार थपथपा रही है. मंगलू छिप गया. द्वार दो छोटे बकरी के बच्चों ने खोला. द! कहां तो एक बकरी को मारने की जुगत भिड़ा रहा था. यहाँ तो दो बच्चे और मिल गए. मंगलू ने मन ही मन तय किया, कल जब बकरी जंगल जायेगी तब पहले एक बच्चे को मारुंगा. क्या मजा आएगा. मुलायम शिकार के बारे में सोच कर ही मंगलू के मुँह से लै टपा-टप लार निकलने लगी.

मंगलू ने जैसे तैसे लार घूंटी और उधर ही छिप कर सबेरे का इंतजार करने लगा. जौली सुबह होते ही रोज की तरह तीलू, मीलू को समझा कर जंगल चली गयी. मंगलू ने आव देखा न ताव और फ़ौरन द्वार थपथपाने लगा. घर के अंदर दोनों बच्चे चुप हो गए और अपनी माँ के बोलने का इंतजार करने लगे.

अब मंगलू को पता होता तो कुछ बोलता. वो गुस्से के मारे जोर-जोर से दरवाजे पर लात मारने लगा ‘सालों बकरी की औलादों! दरवाजा खुल गया न तो ऐसे मुंडी तोड़ूंगा कि मैं-मैं भी नहीं कर पाओगे.’ तीलू, मीलू डर के मारे थरथर कांपते रोते रहे.

शाम को जब जौली घर वापस आई तो रोज की तरह बोली ‘नोणी भित्ती पपड़या छत्ती स्वाली द्वार, तिलु मिलू द्वार उगाड़’ अपनी माँ की आवाज सुनते ही दोनों बच्चों ने रोते-रोते दरवाजा खोला और पूरे दिन का किस्सा माँ को सुना दिया. बच्चों को डरा हुआ देखकर जौली को बहुत गुस्सा आया. उसने अपने सींग उठाये और लाल आँखों से डकराती घर के चारों तरफ सींगों से और आगे के दोनों पैरों के खुरों से मिट्टी खोदती स्याल को ललकारने लगी.

अब स्याल ने द्वार खुलवाने का तरीका तो सीख लिया पर जौली के गुस्से और पैने सींगों को देख कर उसकी तो सिट्टी-पिट्टी गुम. उसे बकरी के सींगों से बड़ा डर लगा और चुपचाप वहां से खिसक लिया. जौली ने तीलू-मिलू को अपने चारों पैरों के नीचे दुबका लिया और बारी-बारी चाटने लगी. जौली को रात भर नींद नहीं आई. जब दोनों बच्चे सो गए तो घर में रखे पत्थर पर रगड़-रगड़ कर अपने सींग पैने करने लगी. दूसरे दिन जौली जंगल नहीं गयी. अपने पैने सींगों को और पैना करती घर के चारों तरफ घूमती रही.

मंगलू ने सोचा अब कुछ दिनों तक सबर करना ही ठीक रहेगा. जब बकरी निश्चिन्त हो कर जंगल जायेगी तभी अपना काम करुँगा. कुछ दिन बीत गए. जौली इतना जान गयी कि स्याल को द्वार खोलने का तरीका पता नहीं है. अगर वो जानता तो उसी दिन द्वार खुलवा कर बच्चों को मार देता. उसने दोनों को समझाया अब मैं अपनी बात चार बार बोलूंगी. चार बार सुनने के बाद ही द्वार खोलना. और वो बच्चों के लिए घास लेने थोड़ी देर के लिए जंगल चली गयी.

मंगलू स्याल तो ताक़ में बैठा ही था. धीरे से घर के बाहर आया और बकरी की आवाज में बोला ‘नोंणय भित्ती पपड़या छती स्वाला द्वार, तीलू मीलू द्वार उगाड़’ एक बार, दो बार बोलने पर भी द्वार नहीं खुला. मंगलू ने चालाकी की और बकरी की आवाज में ही बोलता रहा. बच्चों ने जब चार बार वही बोली सूनी तो अपनी माँ समझ कर दरवाजा खोल दिया. बस फिर क्या मंगलू ने तीलू, मीलू दोनों बच्चों को मार दिया. जौली का पूरा घर उजाड़ दिया. जौली जल्दी ही घास ले कर घर लौट आई.

देखती क्या है कि तीलू, मीलू दोनों बच्चे मरे पड़े हैं. पूरा घर तितर-बितर है. वो गुस्से से बिलबिलाती स्याल के पीछे भागी. अब क्या है कि मंगलू आगे-आगे और जौली पीछे-पीछे सारे जंगल में दौड़ते फिरे. आखिर में जौली ने अपने पैने सींगों से मंगलू का पेट चीर दिया. मंगलू की हुआँ-हुआँ की चीख सारे जंगल में गूंजने लगी.

शोक की मारी जौली ने जंगल के सारे भगवानों को पुकारा हे देवी! द्यवतों! मेरा और मेरे तीलू, मीलू की आत्मा स्याल जात को सराप देती है, सारी स्याल जाति को मेरी घात लगे स्यालों की खुद शिकार करने की ताक़त ख़तम हो जाये. सारे स्याल खाने के लिए दूसरों का मुँह देखेंगे. सबकी दुत्कार खाएंगे. कहते हैं तब से स्याल खुद किसी जानवर को नहीं मार पाते. दूसरों के मारे शिकार के मोहताज रहते हैं.

-गीता गैरोला

देहरादून में रहनेवाली गीता गैरोला नामचीन्ह लेखिका और सामाजिक कार्यकर्त्री हैं. उनकी पुस्तक ‘मल्यों की डार’ बहुत चर्चित रही है. महिलाओं के अधिकारों और उनसे सम्बंधित अन्य मुद्दों पर उनकी कलम बेबाकी से चलती रही है. काफल ट्री की नियमित लेखिका.

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Sudhir Kumar

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