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गोपाल सिंह रमोला और उनके भट के डुबके

कुमाऊँ के की उर्वर सोमेश्वर घाटी में सोमेश्वर और बग्वालीपोखर के बीच एक जगह पड़ती है – लोद. इस छोटी और बेनाम सी बसासत को पिछले दस-बारह सालों में एक छोटी सी ढाबेनुमा दुकान ने खासा नाम दिलाया है. गोपाल सिंह रमोला जी के पुरखे तीन-चार पीढ़ी पहले गढ़वाल से यहाँ आकर बस गए. कोई आठ-दस साल पूर्व उन्हें इस दुकान को खोलने का विचार आया. उन्हें लगा कि बागेश्वर-कौसानी-पिथौरागढ़ जाने और पर्याप्त व्यस्त रहने वाले इस रूट पर चलने वाले ट्रक-जीप और इन पर आने-जाने वाली सवारियों से ठीकठाक आमदनी की जा सकती है.

खाना मुहैया कराने वाले होटल-ढाबे सोमेश्वर में पहले से ही थे और अच्छी संख्या में थे. बग्वालीपोखर का भी कमोबेश यही हाल था. अपनी दुकान को अद्वितीय बनाने की गरज से दाल-सब्जी-कढ़ी जैसे घिसे-पिटे व्यंजनों के स्थान पर उन्होंने केवल ठेठ पारम्परिक भोजन बनाने का फैसला लिया – और सिर्फ़ एक डिश के साथ. भात के साथ खाए जाने वाले भट के डुबके ज़्यादातर कुमाऊनी लोगों के सर्वप्रिय भोजन में शुमार होते हैं. सो रमोला जी ने सिर्फ़ भट के डुबके और भात बनाने का प्रयोग किया. थाली में इन दो चीज़ों के अलावा टपकिये के नाम पर थोड़ा सा चटनी-डला कटा प्याज और आलू के गुटकों के एकाध टुकड़े भी परोसे जाने लगे.

बगैर नाम-साइनबोर्ड वाली यह दुकान न सिर्फ़ चल निकली बल्कि इसका पिछले चार-पांच सालों में इतना नाम हुआ है कि हल्द्वानी-अल्मोड़ा जैसी जगहों से बागेश्वर-कौसानी-पिथौरागढ़ जाने वाले अच्छे भोजन के शौक़ीन लोग न सिर्फ़ गोपाल सिंह रमोला जी के ढाबे पर ठहरने को अपनी योजना में सम्मिलित कर के चलते हैं बल्कि अपने मित्र-हितैषियों को भी ऐसा करने की सलाह दिया करते हैं. यही लोग इस ढाबे का सबसे बड़ा विज्ञापन हैं. इन विज्ञापनों के चलते वे अपने इलाके के सबसे सफल उद्यमियों में गिने जाने लगे हैं. उनकी सफलता का सबूत उनके ढाबे की बगल में बन रहा वह विशाल निर्माणाधीन भवन है जिसे वे बाकायदा एक रेस्तरां की सूरत देने की मंशा रखते हैं. इंशाअल्लाह!

गोपाल सिंह जी हर सुबह पिछली रात भिगोई गयी भट की दाल को सिल-बट्टे पर पीसते हैं और जम्बू-गंदरायणी जैसे एक्ज़ोटिक मसालों के बघार और सिल-बट्टे पर ही पीस कर तैयार किये गए खड़े मसालों के दैवीय संयोजन और अपनी असाधारण पाक-प्रतिभा की मदद से इस सुस्वादु व्यंजन को लोहे की कढ़ाई में पकाते हैं. अमूमन ग्यारह बजे के आसपास खाना तैयार हो जाता है और दो-ढाई बजे तक निबट जाता है. एक बार इस सौ फीसदी ऑर्गनिक भोजन का आनंद ले लेने के बाद साधारण मनुष्यों को इसकी भयंकर लत लग जाती है – ऐसी किंवदंती धीरे-धीरे स्थापित हो रही है. ऊपर से साठ रूपये में जितना चाहें उतना खाएं का अविश्वसनीय ऑफर.

गोपाल सिंह रमोला जी सौ बरस जियें!

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