फोटो: स्व. कमल जोशी
संयुक्त परिवार के दौर में उत्तराखंड के समाज में कई तरह की परम्पराएं हुआ करती थीं. आधुनिक समाज में एकल परिवारों के चलन के बढ़ने के साथ ही इस तरह की कई परम्पराएं विलुप्त हो गयी हैं या होती जा रही हैं.
ऐसी ही एक परंपरा है ज्येठांश , इसे जेठोन, जेठाली, जेठुंड आदि के नामों से भी जाना जाता था. इस परंपरा के अनुसार – जब पैतृक संपत्ति में विभाजन की स्थिति होती थी तब उससे पहले संपत्ति का एक हिस्सा ज्येष्ठतम भाई के लिए अलग निकाल लिया जाता था.
यह हिस्सा चल व अचल दोनों ही तरह की संपत्तियों में से निकाला जाता था. इसी हिस्से को ज्येठांश, इसे जेठोन, जेठाली, जेठुंड आदि के नाम से जाना जाता था. हालांकि उन दिनों पैतृक सपत्ति में विभाजन की स्थितियां कम ही पैदा हुआ करती थीं.
ज्येठांश, इसे जेठोन, जेठाली, जेठुंड भूमि, भवन, पशुधन, या अन्य मूल्यवान वस्तु के रूप में हुआ करता था. जमीन के रूप में जयेठांश पूर्व, उत्तर दिशा या दाहिनी ओर का भूखण्ड हुआ करता था. यह भूखण्ड जमीन का सबसे उपजाऊ टुकड़ा हुआ करता था.
अगर बड़ा भाई गाँव का पधान या कमीण होता तो उसे गाँव की जमीन में से भी एक टुकड़ा दिया जाता था.
उत्तराखंड के अलावा इस तरह की प्रथा हिमाचल के डोडरा-क्वार, सिरमौर, किन्नौर आदि इलाकों में भी पायी जाती थी.
पहाड़ के कुछ हिस्सों में इस पुरातन परंपरा का पालन आज भी जारी है. जबकि मैदानी इलाकों में यह परंपरा प्रायः लुप्त होती जा रही है.
पिथौरागढ़ जनपद के कत्यूरी वंशज रजबारों में हाल तक भी इससे मिलते-जुलते विधान का अनुपालन किया जाता है. उनकी सामाजिक परंपरा के अनुसार पैतृक संपत्ति का विभाजन नहीं किया जाता है. पिता की मृत्यु के बाद अविभाजित परंपरागत संपत्ति ज्येष्ठ पुत्र को मिल जाती है. शेष पुत्रों को उस संपत्ति से भरण-पोषण का अधिकार ही प्राप्त होता है.
(उत्तराखण्ड ज्ञानकोष. प्रो. डी. डी. शर्मा के आधार पर)
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