Featured

उत्तराखंड ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा ‘दाल-भात’

दाल-भात का उत्तराखंड ग्रामीण संस्कृति में पहला स्थान है. नामकरण, जनेव, शादी, बरसी सभी में दाल-भात मुख्य भोजन होता था. बात उस समय की है जब न कार्ड था न चिठ्ठी.

कार्ड से निमंत्रण देने की परम्परा अभी एक दशक पहले ही उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में शुरु हुई है. इससे पहले लोगों के घरों में जाकर निमंत्रण दिया जाता था. लेकिन पुराने समय में निमंत्रण देने के लिये एक व्यक्ति गांव के सबसे ऊंचे हिस्से पर जाता और वहाँ से आवाज लगाता कि अमुक दिन फलाने के लड़के या लड़की की शादी है या अन्य कोई कार्यक्रम है.

आवाज लगाने वाले व्यक्ति को अगर गांव में सभी लोगों को सपरिवार निमंत्रण देना होता तो वह कहता कि सभी को ‘चूल्हा न्युत’ है वहीं अगर इसे परिवार के एक ही सदस्य के लिये निमंत्रण देना होता तो कहता ‘मौ आदिम’ को भात खाने का निमंत्रण है.

My Love My Uttrakhand फेसबुक पेज से साभार

दाल-भात के आयोजन में लकड़ी, भांड़े-बर्तन पानी इत्यादि का प्रबंध पूरा गांव मिलकर करता था. खाना पकाने से लेकर खाना खाने तक के नियम कायदे हुआ करते.

इन अलिखित नियमों का कठोरता से पालन किया जाता है. दाल-भात केवल विशेष पण्डित ही बना सकते हैं. कुछ हिस्सों में इसे सरोल पण्डित कहते हैं. चूल्हे के पास जाने का अधिकार केवल सरोल पण्डित को होता है.

चूल्हा पत्थर का बनता है. चूल्हा बनाने से पहले पूजा की जाती है. साथ में लगे ये चूल्हे दो या तीन पत्थरों के बने होते हैं. पत्थरों के बीच की दूरी बर्तन के आकार के अनुसार होती है. भात बनाने के लिये लगने वाली लकडियों का आकार दाल वाले से छोटा होता है.

Pahadi_Paradise फेसबुक पेज से साभार

भात बड़ी-बड़ी कढ़ाई या डेगों में पकाया जाता है. इन डेगों की क्षमता 50 किग्रा से भी ज्यादा होती है. इन्हें ढकने का कोई ढक्कन नहीं होता है. भाप से भात बनाने के लिये इसे पत्तों से ढका जाता है.

दाल पकाने के बर्तन या तो तीन धातुओं से बना एक गोल बर्तन होता है या पीतल की मोटी चादर का बना होता है. इनका आकार ढाई सौ लीटर तक होता है. सामान्य रूप से दालों में साबूत दालों का ही प्रयोग किया जाता है.

दाल को पकाने, गलाने या जलने से बचाने के लिये पकाते समय उसमें थोड़ा हल्दी, नमक और सरसों का तेल जरुर डाला जाता. दाल पकने के बाद बड़े बर्तन में घी में पहले लाल मिर्च तली जाती है. उसे निकालकर दाल धनिया और जीरे का छौंका लगाया जाता.

पिछले कुछ दशकों से टमाटर प्याज का उपयोग भी दाल छोंकने में देखने को मिलता है. इसके बाद दाल में एक से दो किलो तक का घी डाला जाता है.

दाल-भात के सिवा कोई एक सूखी सब्जी, ककड़ी का रायता और खीर बाद के समय में जोड़े गये. खीर या हलवा और पूड़ी पहले से भी गांव के अमीर लोगों के निमंत्रण में बना करती थी.

प्रकाश बिष्ट की फेसबुक वाल से साभार

खाना खाने के लिये सभी को जूते चप्पल उतार कर जमीन में एक पंक्ति बैठना होता है. पहले खाने के लिये पत्तलों का प्रयोग किया जाता था. इन पत्तलों की बाद में खाद बन जाती थी. अब थालियों का प्रयोग किया जाने लगा है.

पंक्ति के बीच में भोजन बाटने वाले के अलावा कोई और नहीं चल सकता है. जब तक सभी लोग खाना न खा लें तब तक कोई भी पंक्ति से नहीं उठ सकता. यह पंक्ति पंगत कहलाती है.

हिमाचली रिश्ता डॉट कॉम फेसबुक पेज से साभार

पंगत में पहले पुरुष और महिला दोनों साथ में बैठते थे. बाद के समय में महिलाओं और पुरुषों के लिये अलग-अलग पंगत बनाई जाने लगी.

खाना बनाने, बांटने से लेकर बर्तन धोने तक का सभी काम पुरुषों द्वारा ही किया जाता था. महिलाओं द्वारा बर्तन धोने की शुरुआत भी सत्तर के दशकों से कुछ गाँवों में शुरु हो चुकी थी.

सामूहिक भोज मजबूत ग्रामीण समाज की नींव रखता है. इसकी सबसे बड़ी कमी इसमें किया जाने वाला जातीय भेदभाव है. पंगत में भोजन का चलन अब उत्तराखंड के ग्रामीण समाज में कम हो गया हो लेकिन जातीय भेदभाव जस का तस है.

सभी फोटो फेसबुक से साभार

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

हरेला: प्रकृति, परंपरा और विज्ञान का अद्भुत संगम

हर साल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लाखों पौधे लगाए जाते हैं. तस्वीरें खिंचती हैं, अभियान…

2 days ago

हरेले के रंग में पहाड़ : फोटो निबन्ध

आज उत्तराखंड का लोक पर्व हरेला है जो हरियाली और प्रकृति से जुड़ा है. हरेले…

2 days ago

अब हल्द्वानी में पहाड़ी उत्पादों के सबसे विश्वसनीय ब्रांड ‘मुनस्यारी हाउस’ की शुरुआत

आपको मुनस्यारी की दुर्लभ राजमा कि तलाश है या फिर कुमाऊं-गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों…

5 days ago

खड़कमाफी के जीवन में एक दशक से विचरते एकदंत गजराज

खड़कमाफी के जंगलों और आबादी के बीच पिछले लगभग एक दशक से एक परिचित छाया…

5 days ago

क्या उत्तराखंड, पारिस्थितिक वहन क्षमता को लागू कर सकता है?

हाल ही में मेरी उत्तराखंड यात्रा, हरिद्वार, मसूरी, देहरादून और टिहरी, ने मुझे यह गहरा एहसास कराया कि…

3 weeks ago

कानिया के प्रेम में दीवानी सुबनी : लोककथा

रात ढलते ही जब सुबनी और लाली दोनों बहनें पानी भरने के लिए गाँव के…

1 month ago