13 जून को बिनसर के जंगलों में आग की चपेट में आने की वजह से 5 वनकर्मियों की मृत्यु हो गयी. इस दुर्घटना में 3 अन्य वनकर्मी घायल हो गये जिनका ईलाज वर्तमान में दिल्ली के अस्पताल में हो रहा है. जंगल में आग लगने के मामले में दी गयी तहरीर में बिनसर से सटे गांव रिसाल का नाम भी लिखा गया. इस घटना पर दैनिक अख़बार हिन्दुस्तान ने रिसाल गांव के लोगों का दर्द बयाँ करती एक रपट छापी. यह रपट दैनिक अख़बार हिन्दुस्तान से साभार ली गयी है – सम्पादक
(Uttarakhand Forest Fire Binsar 2024)
मैं रिसाल गांव हूं, बिनसर का अभिन्न अंग. वन विभाग की तहरीर में मुझ पर संदेह जताया गया है अपने ही अंग को आग लगाने का. बिनसर में हुई पांच मौतों से पहले ही मैं बहुत आहत था. अब मारे गए वन कर्मियों की मौत की वजह भी मैं हो सकता हूं इस संदेह से छलनी हूं.
वन विभाग के पैदा होने से बहुत पहले से मेरे पुरखों ने इस जंगल को सहेजने का काम किया. इसके बाद पीढ़ी दर पीढ़ी बगैर कहे जंगल को बचाए रखने की परंपरा आगे बढ़ती गई. बाद में जंगल अभयारण्य में बदल गया तो हम इसके लिए बेगाने हो गए. हमसे ज्यादा इसका लाभ जब पर्यटकों को मिलने लगा तब भी हम कुछ नहीं बोले. क्योंकि हमें जंगल से कुछ लेने का लालच कभी था ही नहीं.
सत्ता के संरक्षण में आने के बाद इसने हमसे पूरी तरह मुंह फेर लिया लेकिन हम इसके लिए हमेशा फिक्रमंद रहे. वन विभाग तो पांच मौतों के बाद जागा लेकिन हम तो पीढ़ियों से इसके लिए जाग रहे हैं. कई बार जलती राख में आग फैलने से रोकने को दौड़े. कई बार बारिश में इस जंगल के पेड़ों की जड़ें हिलीं तो ढाल बनकर खड़े हुए.
(Uttarakhand Forest Fire Binsar 2024)
जंगल में जब नालों ने अपना रास्ता बदलकर पेड़ों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की तो मेड़ बनकर खड़े हो गए लेकिन कभी तकलीफ नहीं हुई. तकलीफ पहली बार महसूस हुई जब वन विभाग ने जंगल को मिले जख्म के लिए हमें ही जिम्मेदार बता दिया. हमारा आग्रह है पुलिस से सरकार से कि अब इस पूरे मामले की जांच हो और हर उस जिम्मेदार को सजा मिले जो जंगल जलाने का दोषी है.
मैं कैसा हूं और वन विभाग को मुझ पर शक क्यों है उसके बारे में भी आपको बताता हूं. मुझ पर शक इसलिए है क्योंकि मैं बिनसर के सबसे करीब हूं. 45 किमी के दायरे में फैले बिनसर अभयारण्य के सबसे नजदीक ग्रामसभा सुनौली का एक छोटा सा तोक हूं मैं. छह परिवार मेरा हिस्सा हैं. जंगल में जब भी आग लगती है सबसे ज्यादा खतरे में मैं होता हूं. जब जंगल बदलते मौसम के कारण गुस्से से सुलग रहे होते हैं तो मैं पूरी तरह घिर जाता हूं. बच्चे गांव से बाहर नहीं जा पाते. जो लोग गांव से बाहर होते हैं वह घर नहीं आ पाते. इसके बावजूद हमें बिनसर प्यारा है. यही वजह है कि पूर्वजों से लेकर आज तक जो छह परिवार गांव में हैं, वे हमेशा वन विभाग के लिए काम करते आ रहे हैं.
(Uttarakhand Forest Fire Binsar 2024)
बिनसर को बचाने के लिए गांव में जैव विविधता प्रबंध समिति का गठन किया है. गांव के ईश्वर जोशी को समिति का अध्यक्ष और वन विभाग के एक अधिकारी को सचिव बनाया गया है. समिति जंगल को आग से बचाने के साथ पौधरोपण और दुलर्भ प्रजाति के पौधों के संरक्षण का काम कर रही है. लोगों का कहना कि जंगल बचाने का प्रयास करने वाले गांव के लोग जंगल में आग लगाने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं.
(हिन्दुस्तान संवादाता मुकेश सक्टा को जैसा ग्रामीणों ने बताया)
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