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राज्य स्थापना दिवस विशेष – 2

मैंने कभी स्कूल का भात नहीं खाया. हमारे टाईम पर मिलता भी नहीं था. मैं जब सातवीं में पहुंची तब से स्कूल में दिन के समय भात मिलना शुरू हुआ. मेरे बाद की मेरी दोनों बहनों ने जरुर भात खाया. मैं पढ़ने में अच्छी थी इसलिये मास्टरनी दी के कहने पर बाबू ने मुझे आठवीं से आगे लगाया.

मास्टरनी दी घर आकर बाबू से कह गयी कि तुमार चेली पढ़न में भौते बढ़ीं छ येक स्कूल जन छुटाया ( आपकी बेटी पढ़ने में अच्छी है उसका स्कूल मत छुटाना.) आठवीं तक हमारे स्कूल में दो मास्टर एक मास्टरनी दी थे. आधे साल बाद ही सही लेकिन आठवीं तक स्कूल से ही किताब मिल जाती थी. बाद बाद में स्कूल से ही ड्रेस भी मिला जाती थी. मेरी दोनों बहनों को मिली.

नौवीं में जाकर पहली समस्या किताब की हुई. ये मोटी मोटी किताब. बाबू की हैसियत नहीं हुई उतनी महंगी किताब खरीद लाने की. एक बार के लिये लगा अब आगे नहीं पढ़ पाउंगी. लेकिन फिर मास्टरनी दी ने कहीं शहर से पिछले साल की पुरानी किताबें दिला दी. स्कूल में हमको पढ़ाने वाले मास्टरों में कुल चार तीन हुआ करते थे.

दुर्गी मास्टर इंटर में संस्कृत के मास्टर हुये. हमारी गणित और विज्ञान की जिम्मेदारी उनके जिम्मे थी. एक देशी मास्टर हुआ करते थे शर्मा सर. हुये तो वो इन्टर में अर्थशास्त्र के अध्यापक लेकिन हमारे अंग्रेजी के मास्टर थे. उनसे सर कहना अनिवार्य था बाकि से मासप कहकर भी चल जाता था. पूरे स्कूल में हिंदी का जिम्मा अवस्थी गुरूजी ने लिया था. कक्षा पांच के बाद सभी कक्षाओं में हिंदी और संस्कृत का जिम्मा उन्हीं के कंधों पर था. बांकि इतिहास भूगोल खुद से पढ़ना होता था जो आठवीं के बाद संस्कृत और कला में से कला लेते थे उनकी छुट्टी जल्दी हो जाती थी इस लिहाज से मैंने भी नवीं में कला ही ली.

मैंने हाईस्कूल भी सैकिंड डिवीजन से पास किया. अपने स्कूल से कुल पास तीन लोगों में मैं केवल एक लड़की थी. मुझे गणित और विज्ञान पढ़ने का बड़ा मन था लेकिन उससे पहले हमारे स्कूल में विज्ञान साइड वाला कभी कोई पास ही नहीं हुआ था. होता भी कैसे एक भी टीचर नहीं हुआ विज्ञान वाली शाखा का. मैंने भी आर्ट साइड ले ली. अब स्कूल जाने का मौका कम ही होता था. घर के काम ज्यादा से ज्यादा ईजा का हाथ बटाना ही स्कूल लगे रहने की पहली शर्त थी.

मेरे इंटर के पेपर होने में दो महिने थे बाबू ने मेरा रिश्ता पक्का कर दिया. मैं खूब रोई इसके बाद भी बाबू नहीं माने. जैसे – तैसे इस बात पर राजी हुये कि सबसे लास्ट वाले लगन में ब्या करायेंगे. ब्या के एक हफ्ते पहले ही मेरे पेपर ख़त्म हुये. दो नंबर से मेरी फर्स्ट डिविजन रुकी थी उस साल.

जब मेरी बहनें आठवीं नवीं में पहुंची तो जमाना बदल गया था सबको साइंस साईट वाली लड़की चाहिये थी. हमारे स्कूल में साइंस साईट के मास्टर अब भी नहीं थे. एक जीव विज्ञान वाले मास्टर थे. वही जिस दिन जो मन आई वो पढ़ा देते थे. मेरी एक बहन तो कभी इंटर कर ही नहीं पाई दो बार इंटर में फेल होने के बाद बाबू ने शादी कर दी उसकी. दूसरी वाली दूसरी बार में थर्ड डिवीजन से पास हुई. साइंस साईट से पास होने वाली हमारे गांव की पहली लड़की थी वह.

ये सारी बातें 2000 के बाद की हैं. पता नहीं क्या क्या सपने देखे होंगे इस राज्य को बनाने वालों ने लेकिन ख़ास कुछ बदला नहीं कम से कम हम गांव की लड़कियों की जिंदगी में.

यह लेख हमें बागेश्वर की हेमा द्वारा काफल ट्री के फेसबुक पेज पर प्राप्त हुआ है. राज्य स्थापना दिवस पर हम कुछ और लेख प्रकाशित करते रहेंगे.

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Girish Lohani

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