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औषधियां उगाकर हो सकता है पहाड़ों का आर्थिक विकास

औषधीय पादप कृषि और उत्तराखंड

उत्तराखंड भारत का नवीनतम हिमालयी राज्य होने के साथ-साथ इस वर्ष 2018 में वयस्क यानी 18 वर्ष का होने जा रहा है. यह मेरी नज़र में राज्य का दुर्भाग्य ही है कि 18 वर्ष की अल्पायु में उत्तराखंड ने 8 मुख्यमंत्री और 2 राष्ट्रपति शासन देख लिए हैं. उत्तराखंड का जन्म एक पहाड़ी राज्य के रूप में हुआ था और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र तथा ग्रामीण पहाड़ी क्षेत्र के निवासियों का विकास इसका मूल उद्देश्य था. हालांकि पहाड़ का कितना विकास हुआ इसका अनुमान हम पलायन को देखकर आसानी से लगा सकते हैं.

खैर आज के समय में समस्याओं को अधिक तूल न देकर उनके वैज्ञानिक समाधान की आवश्यकता अधिक है.

यद्यपि उत्तराखंड आर्थिक रूप में अधिक संपन्न नहीं है (कम से कम ग्रामीण क्षेत्रों में तो नही ही है) किंतु फिर भी प्रकृति ने उत्तराखंड को प्राकृतिक रूप से संपन्न बनाने में कोई कसर नही छोड़ी है. हिमालयी क्षेत्र होने तथा भौगोलिक रूप से विभिन्न क्षेत्रों में आने के कारण उत्तराखंड जैव-विविधता का एक अनुपम उदाहरण है. इस हिमालयी राज्य में विभिन्न ऊँचाई वाले क्षेत्रों पर अनेकों उच्च गुणवत्ता-युक्त औषधीय पादपों (पौंधों) का भंडार है जिनका उपयोग विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियों को बनाने में किया जाता है. यहाँ पर यह बताना महत्वपूर्ण है की अनेकों औषधि निर्माता कंपनियों द्वारा इस प्रकार की औषधियों का दोहन किया जाता रहा है. अनुचित दोहन के कारण अनेकों औषधीय पादप या तो विलुप्त हो गये हैं या फिर विलुप्ति की कगार पर हैं, किल्मोड़ा (Berberis), अतीस (Aconitum), तथा कुटकी (Picrorrhiza) इसी प्रकार की कुछ प्रमुख औषधियाँ हैं.

यदि हम चाहें तो ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार की अनेकों मूल्यवान औषधीय पादपों की कृषि करके पहाड़ी क्षेत्र की किसान ना केवल आर्थिक प्रगति कर सकते हैं बल्कि पलायन को दूर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. यहाँ पर में इस बात का विशेष उल्लेख करना चाहता हूँ कि अपने स्वयं के शोधकार्य के दौरान मैंने यह पाया कि अधिकांश क्षेत्रों में होने वेल औषधीय पौंधों में भारी धातुओं (जिनमे की लेड, आर्सेनिक, और कॅड्मियम आदि प्रमुख हैं जो कि विषाक्त होती हैं तथा जिनकी उपस्थिति आयुर्वेदिक एवम् अन्य हर्बल औषधियों के उत्पादन में अत्यंत हानिकारक सिद्ध होती हैं) की मात्रा नगण्य अथवा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पाई गयी जो की इस बात का प्रमाण है कि पहाड़ी क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले अधिकांश औषधीय पौंधे इस विषाक्तता से रहित होते हैं तथा व्यपरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं.

हाँलाकि केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा इस क्षेत्र में कार्य किया जा रहा है किंतु मेरा यह मानना है कि उत्तराखंड सरकार को स्वयं संज्ञान लेते हुए एक मिशन के रूप में औषधीय पादपों की कृषि हेतु कार्य करना चाहिए तथा ग्रामीण कृषकों के व्यावसायिक विकास के लिए प्रयत्न करना चाहिए.
देवेश तिवारी मूल रूप से अल्मोड़ा के निवासी हैं तथा विगत कई वर्षों से हल्द्वानी में निवास कर रहे हैं. देवेश हिमालयी औषधीय विज्ञान के क्षेत्र में वरिष्ठ शोधकर्ता हैं तथा वर्तमान में तृणमूल नवाचार एवं पारंपरिक औषधीय ज्ञान के क्षेत्र में गाँधीनगर गुजरात में कार्यरत हैं.

देवेश तिवारी मूल रूप से अल्मोड़ा के निवासी हैं तथा विगत कई वर्षों से हल्द्वानी में निवास कर रहे हैं. देवेश हिमालयी औषधीय विज्ञान के क्षेत्र में वरिष्ठ शोधकर्ता हैं तथा वर्तमान में तृणमूल नवाचार एवं पारंपरिक औषधीय ज्ञान के क्षेत्र में गाँधीनगर गुजरात में कार्यरत हैं.

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