फोटो: रोहित उमराव
हल्द्वानी के रहने वाले श्री त्रिलोक सिंह कुंवर की यह जीवनगाथा मानवीय संवेदनाओं और संघर्षों का ऐतिहासिक बयान है. एक साधारण इंसान की यह साधारण आत्मकथा उतने ही नाटकीय घटनाक्रमों से बुनी हुई है जितने एक साधारण जीवन में संभव हैं. इसके बावजूद यह कब अपने समय को दर्ज करता एक असाधारण दस्तावेज बन जाती है, पढ़ते-पढ़ते पता ही नहीं चलता. – सम्पादक
श्री त्रिलोक सिंह कुंवर
मैं पिछले कई सालों से अपने बीते दिनों में वापस जाने की बारे में सोचता रहा हूं; ख़ासतौर पर लड़कपन से पहले के सालों में. अक्सर लोगों को कहता सुनता हूं कि बीता समय हमेशा सुखद होता है. इस पूर्वाग्रह का मूल मुझे इस बात में दिखाई देता है कि समय तो बीत ही चुका होता है चाहे वह सुखद रहा हो या कड़वा. चूंकि उसके बारे में सोचते हुए आप रोज़मर्रा की दिक्कतों और अनिश्चित भविष्य-संबंधी विचारों में नहीं फंसते, सो उस के बारे में सोचना अच्छा ही लगता है. मैं सत्रह साल का था और इन्टर फ़र्स्ट ईयर में साइंस का विद्यार्थी था, जब मेरे पिता ठाकुर दौलत सिंह ने मुझे मेरी पैतृक पृष्ठभूमि के बारे में बतलाया. (Trilok Singh Kunwar Uttarakhand Autobiography)
मेरे जन्म से पहले मेरे पिता जिन्हें मैं बाबू कहता था, अल्मोड़ा में जिलाधिकारी दफ़्तर में एक छोटे-मोटे क्लर्क थे. उन्होंने नैनीताल के हम्फ़्री स्कूल (जिसे अब सी आर एस टी कॉलेज कहा जाता है) से 1917 में हाईस्कूल पास किया था. (Trilok Singh Kunwar Uttarakhand Autobiography)
बाबू की शादी १९०५ में हो गई थी जब वे खुद नौ साल के थे. जैसा कि उन दिनों किसान परिवारों में होता था, उनकी पत्नी उन से तीन साल छोटी थीं और अनपढ़ थीं. इस तरह की शादियों के पीछे घरेलू कामकाज में अतिरिक्त सहायता पाने का उद्देश्य भर हुआ करता. चूंकि पहाड़ों में क्षत्रिय लोग जमींदार भी हुआ करते थे, ये पर्वतीय बालाएं जल्दी सुबह से लेकर देर रात के खाने तक काम के बोझ तले पिसती रहती थीं. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मैं विश्वास कर सकता हूं कि विवाहित जोड़ों को साथ रहने का बहुत कम समय मिल पाता होगा. और मेरे पिता के साथ तो यह स्थिति और भी विकट रही होगी क्योंकि दोनों के बौद्धिक स्तरों में बड़ा फ़र्क़ था. इसके अलावा कम वेतन पाने वाले कर्मचारी के लिए अपनी पत्नी को गांव-घर के कर्तव्यों के चलते अपने साथ रख पाना संभव नहीं होता था. वे आपस में तभी मिल पाते होंगे जब पति छुट्टी पर घर आता होगा.
अल्मोड़ा शहर के उत्तर में अवस्थित पाताल देवी मन्दिर में बाबू हर शाम को जाया करते थे. कुछ दिनों बाद उन्होंने कुछ ऐसा किया कि पड़ोस में रहने वाली एक युवा स्त्री भी उसी नियत समय पर मन्दिर पहुंचने लगी. ऐसा लगता है कि बाबू धीरे-धीरे उस स्त्री के मोहपाश में बंधते जा रहे थे. उन्हें यह भी पता चल चुका था कि वह प्रथम विश्वयुद्ध की एक युद्धविधवा नेपाली गोरखा थी. वक्त के साथ दोनों के बीच प्रेम पनपा और बह स्त्री अपना ससुराल छोड़कर बाबू के साथ रहने लगी.
अल्मोड़ा तब एक छोटी बसासत था. गुरखा राइफ़ल्स की एक बटालियन का सेन्टर होने की वजह से 20वीं सदी की शुरुआत से ही यहां गुरखों की अच्छी खासी आबादी रहने लगी थी. उक्त घटना शहर में चर्चा का विषय बन गई और पूरे गुरखा वंश की खा़स तौर पर उस स्त्री के ससुरालियों और उसके आर्मी अफ़सर भाई की साख़ में बट्टा लगा गई. पूरा कुनबा क्रोध में जल उठा और दोनों की जान ले लेने की योजनाएं बनाने लगा. भाग्यवश बाबू ज़िला प्रशासन में आबकारी कर्मचारी थे और अपने वरिष्ठ अधिकारियों की कृपा से अपना तबादला अल्मोड़ा से नैनीताल करवा पाने में कामयाब हो गए. वहां उनकी पोस्टिंग डी. एम कार्यालय में लाइसेंस क्लर्क के पद पर हुई.
तल्लीताल बाज़ार में एक मकान किराये पर लिया गया. दो छोटे कमरे थे और उन से लगी रसोई. घर में कोई छज्जा नहीं था न ही हवा के आने जाने का कोई प्रबन्ध. नैनीताल बाज़ार के मकान एक दूसरे से बहुत सटे हुए थे और विशेषतः गर्भवती स्त्रियों के टहलने वगैरह की जगह तक नहीं होती थी. वहीं दूसरी तरफ़ अल्मोड़ा वाला घर खुला खुला और प्रदूषणहीन था.
आख़िरकार 25 अगस्त 1925 की रात को मेरा जन्म हुआ जब बाहर मूसलाधार बारिश थी. मेरी मां द्वारा एक लड़के को जन्म दिये जाने की प्रसन्नता बहुत संक्षिप्त रही. बहुत जल्दी मेरी मां को भीषण बुख़ार चढ़ा – इसकी वजह घर की अस्वास्थ्यकर नमीभरी हवा रही होगी जिसके भीतर मानसून के दौरान सूरज बमुश्किल आया करता था. जन्म देने के उपरान्त ज़रूरी सेवा टहल के अभाव और लगातार बिस्तर गीला करने वाले नवजात शिशु भी कारण रहे होंगे. इन सब वजहों से उसका स्वास्थ्य बहुत जल्दी बहुत ज़्यादा बिगड़ गया. मुझे बाद में पता चला कि दो माह के भीतर ही उसे टीबी की सेकेन्ड स्टेज रोगी बताया गया. इन हालातों में मेरा पालन पोषण गाय के दूध से हो रहा था. अन्ततः अक्टूबर 1925 में बाबू ने हमें बागेश्वर से नौ मील उत्तर-पूर्व स्थित बुआ के गांव कांडा शिफ़्ट कर दिया. यह गांव चीड़ के पेड़ों से ढंका हुआ था. डाक्टरी सलाह के मुताबिक अभी 1970 के दशक तक यह विश्वास किया जाता था कि दवा के अलावा चीड़ के जंगल की निकटता टीबी से निबटने का अच्छा संयोजन होता था. सन पचास के दशक तक तो यह आलम था कि टीबी को जानलेवा बीमारी माना जाता था जैसा आज कैंसर है.
बुआ ने मुझे बाद में बताया कि मां की हालत लगातार और जल्दी-जल्दी बिगड़ती गई. उसकी हालत इस कदर दयनीय थी कि उसे मुझे अपनी निगाहों के आगे देखना भी बर्दाश्त न था और वह झिड़कते हुए आस पास के लोगों से मुझे दूर करने को कहा करती थी. जैसी कि आशंका थी उसकी मौत अन्ततं हो गई. तब मैं छः या सात माह का था. संक्षेप में एक प्रेमप्रसंग का यह नाटकीय अन्त था जिसने मुझे तकरीबन अनाथ बच्चा बना कर जीवन से लड़ने को अकेला छोड़ दिया था.
मैंने अक्सर लोगों को कहते सुना था कि दुर्भाग्य कभी भी अकेला नहीं आता. मेरे साथ भी यही हुआ. मुझे बाद में बताया गया कि मां की मौत के करीब एक माह बाद मुझे मेरे पैतृक गांव हड़बाड़ मेरी दादी के पास छोड़ दिया गया. मैं बहुत कमज़ोर बच्चा था और मां के दूध के अभाव और ठीकठाक परवरिश के बिना मेरी हालत बहुत दयनीय थी. मुझे लगातार पेचिश तो रहती ही थी मुझे प्रोलैप्स्ड रैक्टम की शिकायत हो गई जिसके कारण टट्टी करते हुए मेरे गुदाद्वार की भीतरी पेशियां बाहर आ जाया करती थीं. मैं दर्द से चिल्लाया करता था क्योंकि मैं उन्हें अपने आप से न तो बाहर खींच सकता था न वापस भीतर कर सकता था. यह काम बड़ी दिक्कत के साथ मेरी दादी को करना पड़ता था. यह बीमारी एक साल तक बनी रही.
इस के साथ ही मेरे सिर पर एक फोड़ा हो गया. स्थानीय स्तर पर उपलब्ध उपचार के बावजूद उसका आकार बढ़ता ही गया.
जैसा मैंने पहले भी बताया था बाबू डी एम नैनीताल के दफ़्तर में कार्यरत थे. तत्कालीन कुमाऊं – गढ़वाल के डिप्टी कमिश्नर जो एक वरिष्ठ अंग्रेज़ आई सी एस थे, मेरे पिताजी की कार्यक्षमता और कुशलता से प्रभावित हुए और आगे जा कर उन्हें पसन्द भी करने लगे.
लड़कपन में
इन्हीं दिनों डिस्ट्रिक्ट बोर्ड, नैनीताल के मुख्य अधिशासी यानी सेक्रेटरी का पद तत्कालीन सेक्रेटरी की मृत्यु के कारण रिक्त हो गया. 1950 के शुरुआती सालों तक डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ज़िले भर की शिक्षा, चिकित्सा व निर्माण सेवाओं के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार होता था. सरकार चाहती थी कि उक्त रिक्त पद को तुरन्त भरा जाए. डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्यों के मतदान द्वारा इस पद पर नियुक्ति होती थी.
डी. एम. नैनीताल की सिफ़ारिश पर बाबू को इस पद के एक प्रत्याशी के तौर पर नामित किया गया, बावजूद इस तथ्य के कि वे महज़ हाईस्कूल पास थे. स्व. पं. गोविन्द बल्लभ पंत तब बोर्ड के चेयरमैन थे. उन्होंने नैनीताल के एक वरिष्ठ अधिवक्ता पं. जी. डी. मासीवाल का नाम प्रस्तावित किया. पं. गोविन्द बल्लभ पंत बाद में संयुक्त प्रान्त के प्रथम मुख्यमंत्री, और फिर नेहरू जी की केन्द्र सरकार में गृह मन्त्री बने. मृत्योपरान्त उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया. ब्रिटिश हुकूमत के दौरान डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सद्स्यों को सरकार द्वारा प्रायोजित किये जाते थे. जो भी हो मेरे पिताजी नैनीताल डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सेक्रेटरी निर्वाचित हो गए.
1927 के शुरुआती महीनों में उन्होंने पदभार ग्रहण किया. परिणामवश उनकी तनख्वाह में अचानक डेढ़ सौ रुपए की बढ़ोत्तरी हो गई. अब वे आराम से घर पर एक नौकर रख सकते थे. दफ़्तर में उनका अपना चपरासी भी था और उन दिनों चपरासी खुशी-खुशी अपने साहब के घरेलू कामों में हिस्सा बंटा लिया करते थे. क्लर्कों की तनख्वाह 20 से 25 रुपए माहवार हुआ करती थी और दोएक रुपए में नौकर मिल जाते थे. 1947 में खुद मैंने तीन रुपए पर नौकर रखा था.
मेरे सिर के फोड़े और पिताजी की नई स्थिति के कारण मुझे हल्द्वानी भेज दिया गया, जो उन दिनों नैनीताल ज़िला प्रशासन का शीतकालीन कैम्प हुआ करता है. बाबू की पहली प्राथमिकता थी कि मेरे फोड़े का जल्द इलाज कराएं. एलोपैथी से ज़्यादा फ़ायदा नहीं हुआ और अन्ततः आपरेशन का फ़ैसला किया. बाबू का एक चपरासी था जो बाद के दिनों में मेरा बहुत अंतरंग हो गया. उसने मुझे बाद में बताया कि मैं दर्द और मवाद की वजह से लगातार रोया करता था. आपरेशन के दौरान करीब आधा बेसिन भर मवाद निकला. ऊपर से आपरेशन के वक्त पाया गया कि इन्फ़ेक्शन भीतर कपाल के ऊपरी हिस्से तक फैल गया था. हर तीसरे दिन पट्टी बदली जाती थी और कपाल के उस हिस्से को खुरच कर साफ़ किया जाता था. उस वक्त मैं दर्द से बिलबिलाया करता था और अपनी बोली में डाक्टर को गालियां दिया करता था. घाव भरने में करीब एक माह लगा और धीरे धीरे समुचित देखभाल और खानपान के कारण मेरा स्वास्थ्य धीरे धीरे सुधरने लगा.
मुझे चार साल तक की आयु की कोई याद नहीं है. अलबत्ता जब मैं अपने पांचवें साल में था, अपने पिता के साथ हड़बाड़ गांव जाते हुए मुझे चीड़ से ढंके पहाड़ों, और उनके बीच से बहती धारा की साफ़ साफ़ याद है. यह धारा आगे जाकर बागेश्वर/कपकोट – पिण्डारी ग्लेशियर के मार्ग पर सरयू नदी में मिल जाया करती थी. मुझे धारा पर बनी पनचक्की की भी याद है. तब गांव के सुदूरतम बिन्दु तक की दूरी मेरे नन्हे कदमों को बहुत लम्बी लगी थी. बाद में जब मैं बारह साल बाद वहां गया तो मुझे ज्ञात हुआ कि वह दूरी फ़कत तीन सौ मीटर थी.
मेरे साथ खेलने वाले बमुश्किल ही कोई दोस्त थे. मेरे इकलौते साथियों में एक घरेलू नौकर था और एक चपरासी जिस के बारे में मैं पहले बता चुका हूं. मैं अक्सर इन्हीं से बातें किया करता. नैनीताल में तल्लीताल के प्राइमरी स्कूल में बी स्टैन्डर्ड (आज के हिसाब से यू. के. जी.) में अपने दाखिले की मुझे अच्छे से याद है. उसके बाद ही मैं अपनी उम्र के बच्चों के सम्पर्क में आया और उनके साथ खेलना शुरू कर सका. इसके अलावा शायद शाम को पिताजी के साथ भी मेरी बातचीत हुआ करती थी. अपनी जवानी के दिनों में वे एक मस्तमौला तबीयत के इन्सान थे. उनके दोस्त अक्सर हमारे घर आया करते. लोग बताते हैं कि मैं एक प्यारा सा बच्चा था सो मातृहीन होने की वजह से लोग मुझ पर बहुत दया दिखाया करते थे. मुझे बहुत साफ़ साफ़ याद है कि घर पर और बाद में दूसरी क्लास में एक बहुत कड़ियल किस्म का अध्यापक मुझे पढ़ाया करता था. मुझे उससे बहुत डर लगता था क्योंकि ज़रा सी भी ग़लती होने पर डंडे के इस्तेमाल से उस शख़्स को कोई ग़ुरेज़ नहीं हुआ करता था.
1932 कि एक सुबह मैंने हमारे घर में एक मुटल्ली सी स्त्री को उपस्थित पाया. बाद में पिताजी ने मुझे उन्हें ईजा कह कर पुकारने की हिदायत दी. बाद में मुझे चपरासी के माध्यम से पता चला कि वह कालाढूंगी के चिकित्सा केन्द्र में मिडवाइफ़ की नौकरी किया करती थीं. अब मुझे अहसास होता है कि यह इन्सानी कमज़ोरियां थीं जिनकी वजह से पिताजी को अपने लिए एक जीवनसाथी लाने को विवश होना पड़ा था. उनकी बूढ़ी चाची भी कुछ दिनों बाद हमारे घर आ गईं. मां की बहन की तर्ज़ पर मेरी सौतेली मां को रामी मौसी भी कहा जाता था.
घर की और मेरी साफ़ सफ़ाई को लेकर रामी मौसी काफ़ी सचेत रहा करती थीं. वे कठोर अनुशासन में विश्वास रखती थीं जिसकी वजह से मुझ इकलौते बच्चे के घर और उसके आसपास मस्ती में भागते फिरते रहने पर काफ़ी हद तक रोक लग गई. मेरी शरारतों के लिए वे मुझे थप्पड़ जड़ने और पीटने मे ज़रा भी देरी नहीं किया करतीं. उनकी बूढ़ी चाची जिन्हें बुबू बुआ कहा जाता था, सुबह और शाम का खाना पकाया करती थीं; इस वजह से हमारे घर की भोजन व्यवस्था और व्यंजनों की विविधता में खासा फ़र्क़ आया. पिताजी से सम्बन्ध बनाने के पहले रामी मौसी खासी सामाजिक थीं और वे मुझे अक्सर अपने परिचितों के घर ले जाया करतीं. बमुश्किल आठवीं पास होने के कारण मुझ जैसे बढ़ते बच्चे के लिए वे आदर्श जीवननिर्देशिका तो नहीं ही थीं. पर जीवन ऐसे ही चलता गया जब तक कि मैंने दूसरी कक्षा पास कर गवर्नमेन्ट हाईस्कूल नैनीताल में तीसरी कक्षा में दाखिला पा लिया.
क्रमशः नवम्बर और अप्रैल में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के दफ़्तर के हल्द्वानी और नैनीताल स्थानान्तरित होने की आधिकारिक व्यवस्था के कारण 1933 और 1934 में पढ़ाई के लिए मुझे उन्हीं अध्यापक महोदय के घर शिफ़्ट कर दिया गया जिनका ऊपर ज़िक्र किया गया है. दिसम्बर से फ़रवरी की सर्दियों की छुट्टियों में मैं हल्द्वानी परिवार के साथ आ जाया करता. अप्रैल 1933 में बाबू ने छुट्टी ली और रामी मौसी के साथ द्वाराहाट के नज़दीक द्रोणागिरि की यात्रा की. वहां वे कैलाश गिरि बाबा नामक एक सिन्धी सन्त की संगत में आए. वहां रहते हुए उन्हें करीब एक घन्टे तक असहनीय पेट दर्द हुआ. निकटतम अस्पताल काफ़ी दूर द्वाराहाट में था. सन्त ने जलती हुई लकड़ियों की धूनी में से एक चुटकी राख उन्हें खिलाई और बाबू का दर्द आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गया. बाद में बाबा ने बाबू को देवी उपासना हेतु दीक्षित किया.
उसके बाद से नियमित रूप से हर सुबह शाम एक एक घन्टे के लिए बाबू ध्यान लगाया करते, श्लोक पढ़ा करते और बाकी तमाम अनुष्ठान किया करते. मई 1934 में जब बाबू अपनी सालाना छुट्टी से वापस लौटे तो उनके भीतर आए आशातीत बदलाव ने मुझे अचरज से भर दिया.
(जारी है)
अगली कड़ी : बाबू का घर छोड़ना और अकेले बालक का संघर्ष – त्रिलोक सिंह कुंवर की आत्मकथा का दूसरा हिस्सा
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