सिनेमा

अलविदा दिलीप कुमार

हमारे बचपने में अमिताच्चन ने अपनी एंग्री यंग मैन वाली गर्वीली गर्माहट से खासा बवाल काट रक्खा था. उसकी भारी आवाज़, एक हाथ को कमर पर टिका दूसरा टेढ़हुंस करके हांय–बांय बोलना यहां तक कि उसकी हर फिल्म में उड़ेसी गई कॉमेडी हमारी फिल्मी नस को भरपूर गुदगुदा रही थी. ये उन दिनों की बात है जब आमिर–सलमान अपने दोनों हाथों से दिल के कोमलतम हिस्सों पर मुलायम चॉकलेट मलने की शुरुआत करने ही वाले थे, यानी अस्सी का दशक. धुर बचपने की बात.
(Tribute to Dilip Kumar)

रविवार शाम 05:45 पर पुरानी फिल्में टीवी पर देखने का शुरुआती कौतूहल और तद्जन्य मासूमियत निपट चुकी थी. हम एक्टर्स को उनके नाम के आगे दुमछल्ला ‘वा’ लगाकर पुकारने लगे थे. मिथुनवा गजब गाया है ‘कि तुमसे मिल्के ना ज्जाने क्यूं…’

हम एक एक्टर को दूसरे से भिड़ाने में उस्ताद हो चुके थे. राज कपूर के चिंतातुर चेहरे को देव आनंद के चुहलबाज चेहरे से.  सुनील दत्त के सुदर्शन ललाट को चिर बुजुर्ग भारत भूषण के चेहरे के मुच्छ प्रदेश से. हेमंत बिरजे की कटकटी जवानी को धरमेंदर उर्फ बूढ़े बुलडोजर के कपड़ों से बाहर कूद रहे शरीर से. मनोज कुमार के चेहरे की कब्जियत को रजेंदर कुमार की मनहूसियत से. जिकेंदर की लचकौव्वा कमर को हेला मालिन की… जाने किस अंदरूनी अहमकपने से हम राजेश खन्ना के हिलते सिर को खुशबू सर की बैठक में रक्खे स्प्रिंग वाले गुड्डे से ( जो बाद में एयर इंडिया का मैस्कट ‘महाराजा’ निकला) भिड़ाते थे. एक बात जो तय थी किसी का किसी से भी ‘बैटल’ हो जीतता अमिताच्चन ही था.

दिलीप कुमार के बारे में ज़रा नेक खयालात थे. उनकी ठहरी हुई सी ठसक के मुकाबिल हम कभी बलराज साहनी की सौम्य मुस्कुराहट रखते, कभी गुरुदत्त की उठी हुई भौहें तो कभी रात–बिरात वाले सीन में भी सद्यनातः प्रतीत होते रहमान के सजीले मुखड़े को पर भिड़ंत किसी ख़ास निष्कर्ष पर न पहुंचती. मतलब इस बैटल के अंत में अमिताच्चन होठों के किनारों पर बीड़ी सरकाने की हरकत न ले पाता. जाने क्यों?
(Tribute to Dilip Kumar)

जिस साल इस देश की तकदीर फ्राइंग पैन पर मद्धम आंच पर सिंक रहे ऑमलेट की तरह पलटी जा रही थी, यानी 1991 एक फिल्म आई ‘सौदागर’. उसमें अपना ही ओवर डोज लेकर अपने ही साइड इफेक्ट के प्रभाव में एक्टिंग करने वाले राज कुमार के साथ खूब पलकें झपकाते, कभी शून्य में तो कभी सामने वाले की आंखों के अंदरूनी परदे फाड़कर अंदर झांक लेने वाली नजरों से सामने देखते दिलीप कुमार भिड़े हुए थे. हिंदी सिनेमा के हिट फॉर्मूले में किसी एक्टर को उसके पिछली शोहरत के मुताबिक टाइप्ड तरीके से और और गाढ़े मसाले के साथ छौंक देना भी रहा है. बड़े शरीफाना और सेफ प्रतीत होने वाले इस प्रयोग की वजह से ही किसी एक्टर की, अगर उसके झोले में बहुत से करामात न हों, मौत हो जाती है या फिर उसे झोला उठाकर…  खैर!

उस फिल्म में राजकुमार को और और राजकुमार लगना था दिलीप कुमार को और और दिलीप कुमार. लगे भी. ‘एक इमली का बूटा था एक बेरी का पेड़!’ हम निष्कर्ष के पकौड़े तल ही रहे थे कि विनोद खन्ना के आश्रमप्रस्थ से आहत और इस वजह को अमिताच्चन की जीत से जोड़ने वाले सनीमची गोर्चा ने जानकारी दी –‘ये तो कुछ भी नहीं… एक फिलिम है ‘शक्ति’ उसमें तुम्हारे अमिताभ को भी धो दिया है दिलीप कुमार ने. भारत माता की जै’

हमारी कमज़ोरी देखिए कि हमें मालूम चलने के बाद भी सालों ‘शक्ति’ देख न पाए. जवानी की दहलीज़ पर कदम, और उसके ऊपर कमर और फिर धड़ रखने के बाद, यानी बहुत बाद में इस फिल्म को देखा! जिस–जिस सीन में दिलीप और अमिताभ साथ आए उसे रिपीट मोड में देखा. (टीवी पर रिपीट की कोई सहूलियत नहीं थी सो हम आपसी बातचीत में सीन दर सीन, सीक्वेंस शुदा तरीके से रिपीट कर लिया करते थे.) हर बार हर सीन को दोहराने में हमारे दिल के टुकड़े हज़ार हुए कोई इधर गिरा कोई उधर. हमारा हीरो बुरी तरह से पिट गया था. पिटते वक्त एंथोनी की तरह कॉमेडी भी नहीं कर पाया.  उसका बड़प्पन यही है कि ये बात उसे भी पता थी. उस वक्त निर्माता–निर्देशक भी इस बात को जानते थे कि अमिताभ को हारना नहीं है किसी भी कीमत पर. दर्शक का दिल टूटेगा और वो थियेटर से रूठ जाएगा. क्योंकि वो दिलीप का नहीं अमिताभ का एरा था. उन्होंने हीरो के साथ बॉलिवुडियन सहानुभूति का ट्रंप कार्ड खेला. आखिरी सीन में एक लंबे उरूज़ पर क्लाइमेक्स को ले जाकर हीरो को गोली मारने का सीन धर दिया.

पर…पर…पर तब तक हमारे लिए इतिहास लिखा जा चुका था. हमारी पसंदगी के रजतवर्णी आकाश में वो एक सितारे का अवसान था. हमारे सितारे  का इतिहास मिटाया जा चुका था, अब वहां थोड़ा पुराना, बहुत ठहरा हुआ सा ‘बरखुरदार’ किसम का एक बहुत चमकता हुआ दूसरा सितारा हमेशा–हमेशा के लिए टंक चुका था!
(Tribute to Dilip Kumar)

डिस्क्लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं.

अमित श्रीवास्तव

जौनपुर में जन्मे अमित श्रीवास्तव उत्तराखण्ड कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता), पहला दख़ल (संस्मरण) और गहन है यह अन्धकारा (उपन्यास).

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