कला साहित्य

त’आरुफ़ : कोतवाल का हुक्का

ज़ाहिर सी बात है ‘कोतवाल का हुक्का’ शीर्षक कहानी-संग्रह में प्रतिनिधि कहानी तो ‘कोतवाल का हुक्का’ ही होगी. इसके अलावा संग्रह में कुछ लंबी कहानियाँ हैं तो बहुत सी लघु कथाएँ भी. कथा-संग्रह के हर सफ़हे पर पुलिसिया कार्यप्रणाली के अंदरूनी किस्से दर्ज हैं. पुलिस-तंत्र के बुलंद इक़बाल के ज़माने से लेकर हवा के बदलते रुख़, नेस्तनाबूद होते रोब-दाब, भरभराते वर्चस्व के समयकाल की- बयान इक़बालिया, जामिनान, प्रतिनिधायन, तफ़्तीश, तामील दोयम, मुंकिर, गोशवारा, हकतलफ़ी, चाराजोई, जैसी दर्जनों कहानियाँ इस संग्रह में मौजूद हैं. जहां अधिकांश लघु कथाएँ पारिभाषिक सी प्रतीत होती हैं वहीं लंबी कहानियाँ पुलिस की छवि और हैसियत को रेशा-रेशा खोलकर रख देती हैं. (Kotwal Ka Hookah)

लंबी कहानी ‘कोतवाल का हुक्का’ के कोतवाल साहब बुलंद इक़बाल वाले ज़माने के कोतवाल हैं, जो कड़क, तेज़ और लापरवाही की हद तक बेफिक्र हैं. उनके साथ जो घटता है, वो इंपीरियल पुलिस से लेकर आज़ादी के कुछ दशकों बाद तक पुलिस के घटते प्रभाव की कहानी है. संग्रह में एलजीबीटी जैसे संवेदनशील मसलों पर कहानियाँ हैं, गलतफ़हमी, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के चलते भलमनसाहत में कदम उठाए  सज़ायाफ़्ता पुलिसकर्मियों की कहानियाँ हैं. भीड़तंत्र है. गगनभेदी नारे हैं. तार-तार होता सांप्रदायिक सौहार्द है, उस पर ड्यूटी बजाता अल्पवेतनभोगी पुलिसकर्मी है.    

पुलिस को दिनभर की हाड़तोड़ ड्यूटी के बाद क्या मिलता है? उलझन भरे मामले! अंधेरा गहराते ही इमरजेंसी टेलीफोन कॉल्स! अर्जेंसी! आदेश! अपना घर-परिवार, निजी समय छोड़कर वे तफ़्तीश के लिए निकलते हैं तो पता चलता है कि एक पक्ष मामले में कानूनी कार्रवाई नहीं चाहता, तो दूसरा पक्ष उन पर संवेदनहीनता के आरोप लगाता है. इतने में भी निजात कहाँ मिलती है. अगर भलमनसाहत में कोई काम कर दिया, जज़्बात में कोई स्टेप उठा लिया तो सद्भावना में किए काम को कानून अपनी पारखी नज़र से देखता है. कोई प्रक्रियागत चूक नज़र आ गई तो फिर एक लंबा सिलसिला चल निकलता है. जाँच, इंक्वायरी और तरक्की के ऐन मौके पर लिफाफा बंद! मानवाधिकार, हिरासत में यातना जैसे मामलों को लेकर पुलिस पर अक्सर गंभीर आरोप लगते हैं लेकिन ये जानने की किसी को तकलीफ़ गवारा नहीं होती कि पुलिस-बल अपर्याप्त संख्या में है. उनसे क्षमता से अधिक काम लिया जाता है. कम वेतन, न ड्यूटी का निर्धारित वक्त और न साप्ताहिक छुट्टी.    

एक अध्ययन के मुताबिक महाराष्ट्र एक ऐसा अकेला राज्य (पर्वतीय राज्यों में कुछ हद तक उत्तराखंड भी) है जहाँ पुलिसकर्मियों को नियमित तौर पर साप्ताहिक अवकाश मिलता है. संख्या में भारी कमी की वजह से ही शायद पुलिस सेवा, विशेष तौर पर कौन्स्टेबलरी, अजब मल्टी-टास्किंग सेवा हो चुकी है. बैंक ड्यूटी, संतरी पहरा, सम्मन तामीली, गश्त, फिक्स पिकेट, अदालत-पैरवी, वीआईपी ड्यूटी, ख़िदमत-सरकार और मार-तमाम काम. परिणाम? जागती रातें. बेसमय खाना. तिस पर उलझन भरे मामले. नाजायज़ दखलअंदाजी. न मन को सुकून, न दिमाग को चैन, न शरीर को आराम.   

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आधुनिक पुलिस व्यवस्था के पितामह वौल्मर, जिन्होने अमरीका में पुलिस-सुधार पर काफी काम किया है, के अनुसार अगर कोई पुलिस अधिकारी कानून को सख्ती से लागू करता है तो सनकी करार दिया जाता है. न लागू करे तो सेवा से बर्खास्त हो जाता है. हिंदुस्तान के लिए भी तो यही बात लागू होती है न? हमारे यहाँ पुलिस-बल का गठन आयरिश औपनिवेशिक ढाँचे पर हुआ. तत्समय साम्राज्य को बरकरार रखने के लिए राजनीतिक गुप्त सूचनाएँ हासिल करना प्रमुख उद्देश्य हुआ करता था. चाहे पुलिस-बल की संरचना हो, चाहे अनुसंधान का तरीका, सब औपनिवेशिक है. यह जो पद्धति है, सुधार के बजाय हुक्मरानों के आदेश-पालन को तरजीह देती रही है. तबसे कितना पानी बह गया. प्राथमिकताएँ, उद्देश्य सब बदल गए हैं. आधुनिकीकरण-सुधार हुआ है लेकिन कॉस्मेटिक सा. वर्तमान परिदृश्य के मुक़ाबले नाकाफ़ी सा. निदान क्या है फिर इसका? यही सबसे बड़ा सवाल है जो संग्रह की हर कहानी में पसरा हुआ दिखता है.    

कथाकार अमित श्रीवास्तव के लेखन में एक ख़ास बात देखने में आती है कि कहानी को वे कविता की दृष्टि से देखते हैं. वे पिटे हुए वर्तमान को मुग्ध इतिहास की नजर से देखने के पक्षधर कभी नहीं लगे. उनके पास भौगोलिक वृत्तांत अपने स्वरूप में पूर्णता को प्राप्त होते नज़र आते हैं. चित्रण इतना सजीव कि उपमाएँ और उपमान दृश्यचित्र की तरह उभर आते हैं. उनके लेखे में ठोस यथार्थ और गतिशील समय की गूंज है. भाषा इतनी तरल कि कोई भी बहता चला जाए— `शहर भूल चुका था कि यहाँ कभी हल्दू यानि कदंब के पेड़ की वजह से इसे ये नाम मिला था. अब पेड़ किसी सड़क को ठंडी नहीं बनाते थे ये भी इसे बाहर से आने वाले किसी सिरफिरे जिलाधिकारी ने याद दिलाया था.‘       

मूल रूप से अपराध और अन्वेषण के इर्द-गिर्द बुनी हुई इन कहानियों को पढ़ते हुए तंत्र का पूरा ढांचा झक्क से दृश्यमान हो उठता है. ऐसा जैसे किसी ने अंदर से कोई तीली जला दी हो. ध्यान देने वाली बात है कि लेखक उसी व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है, जो कथा की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता का एक ज़रूरी संकेत है. फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस की बात निराली होती है.      

साहित्य में पुलिस की बर्बरता, अतिरंजित कार्रवाईयों पर कहानियों की भरमार मिलती है. कुछ सिंघम जैसी नायकोचित कहानियाँ भी आती हैं लेकिन आनुपातिक रूप से देखें तो स्याह पक्ष का पलड़ा भारी नजर आता है. इस लिहाज़ से देखें तो इन कहानियाँ में अलहदा नयापन है. व्यवस्था में अंतर्निहित इन ऑफबीट कथाओं को पाठकों द्वारा हाथों-हाथ लिया जाना तय है.  अस्तु. (Kotwal Ka Hookah)

उत्तराखण्ड सरकार की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत ललित मोहन रयाल का लेखन अपनी चुटीली भाषा और पैनी निगाह के लिए जाना जाता है. 2018 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘खड़कमाफी की स्मृतियों से’ को आलोचकों और पाठकों की खासी सराहना मिली. उनकी दूसरी पुस्तक ‘अथ श्री प्रयाग कथा’ 2019 में छप कर आई है. यह उनके इलाहाबाद के दिनों के संस्मरणों का संग्रह है. वर्ष 2021 में पिता की जीवनी ‘कारी तू कब्बि ना हारी’ और 2021 के ही आखिर-आखिर में उपन्यास ‘चाकरी चतुरङ्ग’ प्रकाशित होकर आया है.

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Sudhir Kumar

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