फोटो : अशोक पांडे
पहाड़ में जिन घरों में बड़े बुजुर्ग न हुये उनके लिये भी आफत ही हुई. पति कमाने के लिये रहने वाले हुये दूर देश. घर का पूरा करोबार हुआ औरत के जिम्मे. सब कुछ तो देखना हुआ अकेली औरत ने. सुबह गोठ-खाल और धिनाली के सारे काम निपटा के कभी खेतों में जाना हुआ तो कभी झाड़-पात या लकड़ी के लिये बन. कमर में बाँधी रस्सी उसी में खोंचा दाथुला और लगी रास्ते.
(Ija Childhood Memoir)
बहुत छोटे बच्चे हुये तो डल्ले के झूले में रख छोड़ने हुये उससे थोड़े बड़े बच्चे बिचारे घर के अंदर बंद करने हुये. जब तक रास्ते में ईजा दिखती बच्चे गला-गला फाड़कर रोते. बच्चों के गाल पर हिसालू के तोप्पे जैसे मोटे-मोटे आंसू देख कोई भी बाहर से देखने वाला कहेगा- कैसी जो मां होगी, अपनी औलाद के लिये भी माया नहीं हुई. पर अकेले घर का सारा कारोबार संभालने वाली पहाड़ की औरत के सिवा कोई नहीं जानता कि उसके बच्चे के आंसू उसके दिल के कितने हिस्से को दुःख में डुबो देते है. घर से पहले मोड़ से हिकुरी भरते अपने बच्चे के खेल में लगने की एक झलक ही तो बन के रास्ते की चढ़ाई और दूरी कम करती है.
बच्चे तो बच्चे ही हुये थोड़ी देर में सब भूल जाने वाले हुये पहले खिलौने भी नहीं हुये. रोटी के टुकड़े, गुड़ या मिश्री के टुकड़े जैसी चीजें ही बच्चों को भुल्याने के लिये पास में छोड़ी जाती बच्चों के लिये वही खिलौने हुये वही खाना भी. थक गये तो वहीं घोपटी भी गये.
(Ija Childhood Memoir)
ईजा की माया अलग होने वाली हुई. बन में बच्चे को लेकर झस्स-झस्स भी होने वाली हुई पर बेचारी क्या करे. शरीर बन में है मन घर में है. प्रकृति भी ईजा की माया समझती है इसलिए तो जंगल में किल्मोड़ा, दया या दै, करोंदा, घिंघारू, हिसाउ, काउ- हिसाउ, काफल, जामुन, बेर होने वाले हुये.
पीठ में होगी ये बड़ी-बड़ी गाज्यो की भारी या होगा लकड़ियों का गठ्ठर. झुकी हुई कमर लेकर चलती-चलती जब बाखली में आयेगी तो या बच्चा सोया होगा या दुनिया की सबसे कीमती मुस्कान देता मां को देखेगा. फिर क्या पीठ के वजन अब दुनिया की सबसे हल्की चीज होगा कमर सीधी कर ईजा अपने आँचल के घेरे से निकालेगी जंगल के उपहार कभी हिसालू तो कभी काफल तो किल्मोड़ा. दुनिया में इससे स्वादिष्ट और कौन सा फल होगा.
(Ija Childhood Memoir)
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