दांतू गाँव में बीस साल पहले जसुली लला की भव्य मूर्ति
सामने पंचाचूली बांहें फैलाए दिखी. उसका ग्लेशियर किसी खौलते हुए लावे की तरह डरावना प्रतीत हो रहा था. कुछ पलों तक उसे निहारने के बाद तन्द्रा टूटी तो दांई ओर जसुली दत्ताल की एक खूबसूरत मूर्ति दिखाई दी, जिसके हाथों से अशर्फियां बरस रही थीं. (Sin La Pass Trek 19)
दातूं गांव की जसुली दताल बहुत दानी थी. लोग उसे जसुली शौक्याणी या जसुली बुढ़ी के नाम से भी बुलाते थे. उस जमाने में बुढ़ा और बुढ़ी एक पदवी होती थी. गांव के सयाने व समझदार लोगों को इस पदवी से नवाजा जाता था और सभी उनका सम्मान किया करते थे.
कहा जाता है कि दारमा घाटी के दातू गांव की निसंतान जसुली काफी अमीर थी. एकलौते बेटे की बचपन में ही मृत्यु हो जाने से वह जीवन के अंतिम दिनों में इस कदर निराश हो गई की उसने अपना सारा पैंसा, जेवर-जवाहरात, धौलीगंगा में बहा देने का फैसला किया. उस जमाने में दारमा की यात्रा पर निकले अंग्रेज कमीश्नर रैमजे ने घोड़े-खच्चरों में लदाये सामान देखा तो वो चौंके.
घोड़े-खच्चरों के साथ चल रहे ग्रामीणों ने उन्हें पूरी कहानी बताई तो वह तत्काल जसुली शौक्याणी के पास पहुंचे और उसे समझाया की नदी में सारा धन बहा देने के बजाय उसे किसी अच्छे काम में लगाए. कहते हैं कि जसुली ने अपना सारा धन कमिश्नर रैमजे को ही सौंप दिया.
पहाड़ में तब सड़कें नहीं थीं और तीर्थ व व्यापार के लिए यात्राएं पैदल ही की जाती थीं. रैमजे ने जसुली शौक्याणी के धन से कुमाऊं व नेपाल के कुछ हिस्सों में प्रमुख मार्गों पर यात्रियों के रात्रि विश्राम के लिए दो सौ ज्यादा धर्मशालाएं बनवाई. ये धर्मशालाएं हल्द्वानी से कैलास मानसरोवर मार्ग के व्यास घाटी में गुंजी तथा नेपाल के महेन्द्रनगर व बैतड़ी जिलों में बनाई गई थी.
कैलास जाने वाले यात्री, भेड़ पालक व व्यापार के लिए मैदानी क्षेत्रों में पैदल आने-जाने वाले व्यापारी इन्हीं धर्मशालाओं में रात को ठहरते थे. इन धर्मशालाओं की जगहों का चुनाव मुसाफिरों की सहूलियत को ध्यान में रखकर किया गया. मसलन इन्हें जलस्रोतों के पास बनाया गया और एक धर्मशाला से दूसरी का फासला नौ मील रखा गया.
चार से लेकर बारह कमरे वाली इन धर्मशालाओं में मेहराबदार नुमा दरवाजे बनाए गए. यात्रियों और उनके खच्चर-घोड़ों के रात बिताने को अलग-अलग कमरे हुआ करते थे. आज भी कुमाऊं में अनेक जगहों पर जसुली शौक्याणी के धर्मशालाओं के खंडहर मिल जाते हैं.
हम करीब आधे घंटे तक वहीं बैठकर कभी पंचाचूली तो कभी जसूली बुढ़ी की मूर्ति को निहारते रहे. आगे दातूं गांव की गली में इकलौती दुकान खुली मिली. दुकान स्वामी से भोजन के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने हामी भर दी. रकसेक किनारे रख हम वहीं आगे मैदान में चहल-कदमी करने के बाद मैदान में ही पसर गए. आधे घंटे तक दुकान में कोई हलचल होते न देख दुकान स्वामी से भोजन के बारे में पूछा तो वह बड़े प्रेम से बोले
आजकल सीजन कम है तो दुकान में खाना बनाना बंद कर दिया है. आपका खाना घर में बन रहा है. बस थोड़ी देर में तैयार हो जाएगा.
उनकी आत्मीयता देख महेशदा उनसे गपियाने में लगे और उन्हें नैनीताल समाचार के कुछ अंक भी दे दिए. समाचार पत्र देख उन्होंने तुरंत ही उसकी सदस्यता भी ले ली. उनके घर से आवाज आई तो वो हमें घर में ले चले. दो मंजिले एक चाख में कालीन बिछे हुए थे. हम आराम से पालथी मार उसमें बैठ गए. थोड़ी देर में उनकी पत्नी चावल, दाल और बांस की हरी कोपलों की टपकिये के साथ चटनी परोस गई. खाना किसी फाइव स्टार रेस्टोरेंट से भी कई गुना आगे का था.
हम पांच लोगों से खाने के उन्होंने मात्र डेढ़ सौ ही लिए. ऊपर से पचास रुपये नैनीताल समाचार की सदस्यता में चढ़ा दिए. हमें कुछ अजीब सा लगा तो उनकी दुकान से बेज़रूरत कुछ सामान भी खरीद लिया. उनसे विदा लेकर हम दुग्तू गांव की ओर जाने वाली पगडंडी में आगे बढ़ गए. आज सब फिट थे तो वक्त देख आगे नागलिंग गांव का लक्ष्य कर लिया. रास्ते में आईटीबीपी का एक दल बेदांग की रेकी को जाते हुए मिला तो उनसे हम सबकी एक फोटो खींचने की गुजारिस की तो एक जवान ने हमारी ईच्छा पूरी कर दी.
धौलीगंगा पर बने पुल को पार करते वक्त महसूस हुवा कि धौलीगंगा के उफान में पुल कांप जैसा रहा हो. दोपहर की गर्मी में पंचाचूली ग्लेशियर से निकलने वाली धौलीगंगा भी पूरे उफान के साथ कीचड़ समेटे हुए ढलान में दौड़ती चली जा रही थी. पुल पार से दाहिने ओर उंचाई लिए हुए रास्ता आगे पंचाचूली ग्लेशियर की ओर जाता दिख रहा था. पंचाचूली को कुछ पल निहारने के बाद आगे बढ़े. (Sin La Pass Trek 19)
घंटे भर चलने के बाद दुग्तू गांव की सीमा शुरू हो गई. कुछ लोग खेतों में काम करते दिखाई दिए. आगे एक बाखली में तीन-चार दुकानों की बाजार में बुजुर्गों की गप्पें चल रही थीं. उन्हें देख कुछ देर रुकने का मन हो गया. एक दुकान में चाय पीते हुए गांव के बुजुर्ग मानसिंह दुग्ताल से बौखलाई नदी के बारे में बातें होने लगीं. उन्होंने बताया कि धूप में चमक बढ़ने के बाद ये तो यहां हर रोज होने वाला हुवा. उन्होंने एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि
दशकों पहले पंचाचूली का ग्लेशियर टूटा तो ग्लेशियर से कुछ आगे बसा लगभग सौ मवासों का गांव उसमें दफन हो गया. आज तक भी कोई नहीं मिला. कभी कभार नदी में बर्तनों के बहने की आवाजें सुनाई देती थी. अब वह भी बंद हो गई हैं.
‘आगे नागलिंग गांव कितने घंटे में पहुंच जाएंगे?’ पूछने पर उन्होंने बताया कि दो-एक घंटे का ही रास्ता है बस. उन बुजुर्गों से विदा ले आगे को बढ़े. बालिंग गांव के हरे भरे खेतों से होते हुए नागलिंग गांव में पहुंचने में हमें तीन घंटे लग गए. चौड़ा सा मैदान पार कर बाईं ओर एक दुकान में गए. परिचय देने के बाद वहीं रहने की भी बात हो गई. (Sin La Pass Trek 19)
दुकान स्वामी हमारे मित्र करन सिंह नगन्याल के चचेरे भाई निकले तो आत्मीयता बढ़ गई. चचेरे भाई से नगन्यालजी का घर देखने की इच्छा जाहिर की तो उन्होंने हमारे साथ एक बालक को भेज दिया. सांझ हो गई थी और नीम अंधेरे में भी चढ़ाई वाली गलियों से गुजरते हुए महसूस हो रहा था कि गांव काफी संपन्न है. नगन्यालजी का घर गांव के अंतिम छोर में था. मकान की मरम्मत चल रही थी. बगल में रह रहे उनके रिश्ते-नातेदारों को दुआ-सलाम कर हम वापस अपने ठिकाने में आ गए.
खाने में आज एक-एक रोटी के साथ भरपूर दाल-चावल मिला. थकान के साथ-साथ भूख भी जोरदार थी तो छककर आनंद लिया. सुबह धारचूला की ओर निकलने का मन बनाकर होटल के लकड़ी के दोमंजिले चाख में अपने मैटर्स-सिलिपिंग बैग बिछाकर हम मीठे सपनों में खो गए. (Sin La Pass Trek 19)
जारी…
– बागेश्वर से केशव भट्ट
पिछली क़िस्त: दारमा के बेदांग में तैनात पंचाचूली के पहरेदार
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बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं.
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