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सिलक्यारा सुरंग हादसे में हमने विज्ञान की क्षमता और सीमा को देखा और समझा

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पिछली अमावस्या सहित कार्तिक मास का पूरा शुक्ल पक्ष, 41 मजदूर सिलक्यारा की निर्माणाधीन सुरंग में फँसे रहे. दीपावली, छट और इगास त्योहार भी उन्हें कोई खुशी नहीं दे सके. कृष्ण पक्ष की पहली रात्रि को, पूरे 17 दिन बाद उन्होंने खुली हवा में साँस ली. एक नया जीवन, एक नयी दुनिया में प्रवेश करने-सा ये अनुभव उनके लिए अविस्मरणीय क्षण है, और दुनिया के लिए महत्वपूर्ण सबक. इस सुखद क्षण हम सबने तन-मन के रोम-रोम को हर्षित पाया. प्रकृति और दैवी शक्ति को नमन किया और पूरे मिसन में लगे सभी एजेंसियों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट की.
(Silkyara Tunnel Rescue Utarakhand)

सिलक्यारा सुरंग हादसे में हम सबने विज्ञान की क्षमता और सीमा को भी बहुत अच्छे से देखा और समझा. ये भी कि तकनीक चाहे कितनी ही उन्नत क्यों न हो, मानव तन-मन की अद्भुत क्षमता के बिना व्यर्थ सिद्ध होती है. खुशी के इस अवसर पर हमें हादसे के कारणों पर जरूर मनन करना चाहिए. न्यूनतम सुरक्षा मानकों का ध्यान रखे जाने के लिए निर्माण एजेंसी को सचेत किया जाना चाहिए. पत्रकार बिरादरी को भी हादसे के बाद ही सक्रिय होने के बजाय, हादसा-संभावित स्थलों की रिपोर्टिंग में तत्पर रहना चाहिए.

2021 के तपोवन टनल हादसे में मैंने भी एडिट टनल्स की अनिवार्यता के बारे में लिखा था. दो साल बाद सिलक्यारा टनल के बारे में भी सभी विशेषज्ञ अब यही कह रहे हैं. मसल है कि अ स्टिच एट टाइम, सेव्स नाइन. सिलक्यारा राहत कार्य में देश का जितना संसाधन लगा उससे कम में ही पूरे देश की टनल्स में एडिट टनल्स की व्यवस्था सुनिश्चित हो सकती है.
(Silkyara Tunnel Rescue Utarakhand)

अंत भला तो सब भला कह-लिख कर सुखद अनुभूति होती है पर ये दूरदृष्टि नहीं है. भारत सरकार और उत्तराखण्ड सरकार ने सिलक्यारा सुरंग रेस्क्यू में अपने बेहतरीन संसाधन और तकनीकी का प्रयोग कर ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है. इस सफलता से सिस्टम पर सभी का भरोसा बढ़ा है. सुरक्षा मानकों की सुनिश्चितता की अपेक्षा भी इसके साथ-साथ बढ़ी है. सिलक्यारा के चक्रव्यूह का अंतिम द्वार को भेदने वाले रैट माइनर्स को हम कैसे भूल सकते हैं. विनिंग शॉट आपका ही था. आप ही हमारे समय के माधोसिंह हो. 27 तारीख़ को ही मैंने माधोसिंह का आह्वान किया था. रैट माइनर्स में वे प्रकट होकर हम सबको अविस्मरणीय आनंद दे गये. सुना था जागर में जागृत करने की क्षमता होती है, इस बार ये प्रत्यक्ष देखा भी.
(Silkyara Tunnel Rescue Utarakhanda)

माधो सिंह का जागर

तुम्हारा हौसला कितना बुलंद था माधो!
तुम किस मिट्टी के बने थे माधो!
माधो! आ जाओ एक बार फिर
किसी शरीर में, किसी दिमाग में
तेरी धरती में फँसी
इकतालीस जिंदगियों का सवाल है.
भाभी का उलाहना समझना,
माधो! इसे ही जागर समझना.
माधो! तुम्हें मलेथा के सेरे की कसम
किसी तन में, किसी मन में आ जाना
माधो! तुम से बड़ा इंजीनियर
कोई नहीं हुआ है
तुम्हारी सब्बल से मजबूत
कोई बिट नहीं बनी है.
तुम्हारी रगों में फौलाद बहता था
तुम्हारे हौसले में दिखता था हिमालय
तुम असली सेनापति थे माधो.
तुम पहाड़ के भूपति थे माधो.
तुम पहाड़ के
सीने की पसलियों को पहचानते थे.
तुम पहाड़ की नरम रग को जानते थे.
आ जाओ एक बार फिर माधो
भाभी का उलाहना समझना,
माधो! इसे ही जागर समझना.

देवेश जोशी 

सम्प्रति राजकीय इण्टरमीडिएट कॉलेज में प्रवक्ता हैं. साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और इतिहास विषयक मुद्दों पर विश्लेषणात्मक, शोधपरक, चिंतनशील लेखन के लिए जाने जाते हैं. उनकी प्रकाशित पुस्तकें है: जिंदा रहेंगी यात्राएँ ( संपादन, पहाड़ नैनीताल से प्रकाशित), उत्तरांचल स्वप्निल पर्वत प्रदेश (संपादन, गोपेश्वर से प्रकाशित), कैप्टन धूम सिंह चौहान (सैन्य इतिहास, विनसर देहरादून से प्रकाशित), घुघती ना बास (लेख संग्रह विनसर देहरादून से प्रकाशित) और सीखते सिखाते (शैक्षिक संस्मरण और विमर्श, समय-साक्ष्य देहरादून से प्रकाशित). उनके दो कविता संग्रह – घाम-बरखा-छैल, गाणि गिणी गीणि धरीं भी प्रकाशित हैं. आकाशवाणी और दूरदर्शन से वार्ताओं के प्रसारण के अतिरिक्त विभिन्न पोर्टल्स पर 200 से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं.

इसे भी पढ़ें : तेरह, तेरस और ट्रिसकाइडेकाफोबिया

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