Featured

आजादी से पहले नैनीताल का शेरवुड

Read in English

नैनीताल में यूरोपियन बस्ती बसने के बाद एक अच्छे स्कूल की जरुरत महसूस की गयी. इस जरुरत को सबसे पहले जुलाई 1867 में द नैनीताल डाईओसिशन स्कूल ने पूरा किया. यह प्रोजेक्ट रॉबर्ट मिलमैन के सरंक्षण में डॉ कॉडोन, ए.एस. रीड और अन्य लोगों ने बनाया था. यही बाद में शेरवुड कालेज (Sherwood College ) कहलाया.

जैसा कि उम्मीद की जा रही थी, वित्तीय समस्याएं आनी ही थी लेकिन धन के लिये की गयी अपील पर लोगों की प्रतिक्रया शानदार थी. स्कूल के पहले प्रिंसिपल ई. बैस्टन (1869-1880) थे. रेव. ई. बैस्टन के ज्ञान और मार्गदर्शन ने स्कूल को अपनी पहचान दिलाई और स्कूल नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया. स्कूल की शुरुआती सफलता का अंदाजा प्रवेश के लिए आवेदनों को बड़े पैमाने पर दी गयी नामंजूरी की दर से लगाया जा सकता है. ज्यादा संख्या में बच्चों के कारण मजबूरी में स्कूल को लड़कियों और लड़कों के अलग-अलग स्कूलों में बांटा गया.

एटकिंसन ने अपनी किताब ‘द हिमालयन गजेटियर’ में लिखा है कि “1872 में विद्यार्थियों की संख्या बढ़कर 100 हो गई, लेकिन फिर भी आवास की इच्छा के परिणामस्वरूप कई आवेदनों को नामंजूर कर दिया गया.” कमेटी ने तब स्कूल बिल्डिंग बनाने में सहायता के लिए आम जनता से अपील की और लोगों ने बड़े दिल से इसमें सहायता की.

‘द हिमालयन गजेटियर’ में एटकिंसन ने स्कूल का सम्माननीय उल्लेख करते हुए इसे सीखने का केंद्र बताया है जो अपने संस्थापकों की मूल आकांक्षाओं को अच्छी तरह से पूरा करता है.

शेरवुड स्कूल का अमिताभ बच्चन और नैनीताल के छोकरे

1873 में स्कूल ने शेरवुड एस्टेट के शानदार परिवेश का अधिग्रहण किया, जो जनरल हुथवेट की संपत्ति थी. अपंने इतिहास में खुले स्थानों, रोलिंग लॉन, विशाल बागों और एक शूटिंग-रेंज (अब गोल्फ लिंक) के साथ 600 गज की दूरी पर एक शानदार संपत्ति वाला शेरवुड पहला स्कूल था.

टॉम टेलर

1880 के साल नैनीताल में भयंकर लैंड स्लाइड आया था. शेरवुड जो कि दक्षिणी नैनीताल में है इससे प्रभावित नहीं हुआ लेकिन अगले ही साल एक भयंकर तूफ़ान ने स्कूल की छत उखाड़ फेंकी. अगले कुछ हफ्ते स्कूल के बच्चे सेना के कैम्प में तो कुछ बच्चे स्कूल के मैदान में तम्बुओं में रहे.

1887 में दूसरे प्रिंसिपल इलियट के बाद ए. हैनकाक और फिर मुनरो शेरवुड स्कूल के प्रिंसिपल बने. 1895 से लेकर 1898 तक का समय शेरवुड स्कूल के इतिहास का सबसे खराब समय रहा. विश्व की सबसे सुंदर जगह पर स्कूल होने का खामियाजा शेरवुड स्कूल को भुगतना पड़ा. स्कूल को जगह खाली करने के नोटिस दिये गये. इसे सरकारी इमारत बनाने के प्रयास जोरों पर थे.

1896 की ईस्टर की सुबह बच्चों को बेतरतीबी से बिस्तर से उठाया गया. लकड़ी की पूरी इमारत में आग लगने के कारण सभी बच्चों को इमारत खाली करने को कहा गया था. इस घटना में किसी की मृत्यु नहीं हुई.

इसके बाद स्कूल को खुरपाताल के हैल्थ रिसॉर्ट में स्थानतरित करने का निर्णय लिया गया. यहां स्कूल में हैजा और आँतों में बुखार की बीमारी फैल गयी. स्कूल अपने सबसे बुरे दौर में था. जिस स्कूल में बच्चों की संख्या 100 हुआ करती थी वह 1897 में 35 और 1898 तक 32 हो गयी. इस बीमारी के प्रकोप के शिकार स्कूल के प्रिंसिपल मुनरो खुद हो गये उनकी मौत आँतों के बुखार के कारण रैम्जे अस्पताल में हुई थी.

आखिरकार 1897 में अयारपाटा के एक हिस्से पर स्कूल के लिये कुछ जमीन अधिग्रहित कर ली गई. 5 जून 1897 को लखनऊ के बिसप ने इसकी नींव रखी. मुनरो की मौत के बाद रोसलेट अगले तीन साल स्कूल के प्रिंसपल रहे जिन्होंने स्कूल को एक बार फिर मज़बूती दी. शेरवुड स्कूल का आदर्श वाक्य – ‘Mereat Quisque Palmam’ – ‘Let each one merit his prize’ रोसलेट ने ही दिया है.

1937 में भारतीय कप्तान के साथ क्रिकेट टीम

शताब्दी के अन्त तक शेरवुड ने खेलों में अपना जलवा बिखेरना शुरु कर दिया था. क्रिकेट में शेरवुड- 11 सबसे अच्छी टीम मानी जाती थी. पेम्बर्टन, रोसलेट के बाद अगले प्रिंसिपल हुये लेकिन उनके बाद आये सी. एच. डिक्सन को शेरवुड के सबसे सफल प्रिंसिपल में गिना जाता है. जब 1932 में वह सेवानिवृत्त हुए तो स्कूल की किस्मत ने अभूतपूर्व ऊंचाइयों को छू लिया था.

पेम्बर्टन के समय टॉम टेलर, रॉबर्ट्स ( जिन्होंने 1908 में स्कूल की पत्रिका शुरु की थी ), सी डगन, ‘डिंगो’ डॉसन ( जिन्होंने स्कूल सांग ‘वे डाउन डिक्सी’ की रचना की), नार्मन स्मिथ, स्कूल स्टाफ में हुआ करते थे. स्कूल को चार हाउस में बाटने का सिलसिला 1918 से शुरु हुआ.

राबिन हाउस 1946

डिक्सन के जाने के बाद जैसे एक युग ख़त्म हो गया हो कहा जाता है कि डिक्सन का स्कूल पर इतना प्रभाव था कि यह माना जाने लगा कि उनके जाने के बाद स्कूल बंद हो जायेगा लेकिन उनके बाद आये एल्विन बिन्स ने इस सब बातों को अफवाह साबित कर दिया. उनके युवा और डायनमिक नेतृत्व ने स्कूल की प्रतिष्ठा को बनाए रखा.

1937

एल्विन बिन्स ने ही कुक हाउस सिस्टम और मैराथन की शुरुआत की थी. 1937 में, स्कूल का नाम डाईओसिशन बॉयज़ स्कूल से शेरवुड कॉलेज में बदल दिया गया. एल्विन बिन्स ही भारत की आजादी के समय शेरवुड के प्रिंसिपल थे.

सभी फोटो ओल्ड शेरवुडियंस से.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

कुमाऊँ की खड़ी होली

इन दिनों उत्तराखंड के कुमाऊँ में होली की धूम है. जगह-जगह खड़ी होली और बैठकी…

6 days ago

आधी सदी से आंदोलनरत उत्तराखंड का सबसे बड़ा गांव

बात उन दिनों की है, जब महात्मा गांधी जब देश भर में घूमकर और लिखकर…

1 week ago

फूल, तितली और बचपन

बचपन की दुनिया इस असल दुनिया से कई गुना खूबसूरत होती है. शायद इसलिए क्योंकि…

2 weeks ago

पर्वतीय विकास – क्या समस्या संसाधन की नहीं शासन उपेक्षा की रही?

पिछली कड़ी : तिवारी मॉडल में पहाड़ की उद्योग नीति और पलायन आजादी के दौर…

2 weeks ago

अनूठी शान है कुमाऊनी महिला होली की

यूं तो होली पूरे देश में मनाए जाने वाला एक उमंग पर्व है परन्तु अलग…

2 weeks ago

धरती की 26 सेकंड वाली धड़कन: लोककथा और विज्ञान का अद्भुत संगम

दुनिया के अनेक लोक कथाओं में ऐसा जिक्र तो आता है कि धरती जीवित है,…

3 weeks ago