समाज

सिद्ध साधकों की कर्मस्थली : उत्तराखंड

उत्तराखण्ड का प्राकृतिक सौन्दर्य आध्यात्मिक शान्ति का जन्मदाता रहा है. उच्च हिमाच्छादित शिखर, कल-कल करती हुई धवल नदियाँ और देवभूमि ने साधकों को अपनी ओर आकर्षित किया. इसी पर्वत प्रदेश की कन्दराओं में प्राचीन ऋषियों ने गहन तपस्या की थी. उत्तराखण्ड में तपस्वी अगस्त्य और अत्रि ने अपने तपोबल से आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार किया. उत्तराखण्ड की इस पवित्रता का उल्लेख स्कंदपुराण के मानस खण्ड में वर्णित है. इस पवित्रता के कारण उत्तराखण्ड की भूमि ने महान साधक, तांत्रिक ज्योतिष शास्त्री, प्रशासक और वैज्ञानिकों को जन्म दिया.
(Saints of Uttarakhand)

जगदगुरु शंकराचार्य बौद्ध धर्म के प्रभाव से सनातन धर्म की रक्षा और भारत वर्ष की एकता के लिये उत्तराखण्ड से ही बद्री केदार की स्थापना हेतु गये. चिर प्रवाहिनी गंगा का यही उद्गम स्थान रहा. अतः आध्यात्मिक शान्ति और आत्मा पर- मात्मा के साक्षात्कार का यह उचित स्थान प्राचीन काल से आदि काल तक रहा है. मध्य युग में गुरुनानक इसी मार्ग से हेमकुन्ड को गये और एकता व भ्रातृत्व का उपदेश दिया.

उत्तराखण्ड की इस पवित्र भूमि में स्वामी विवेकानन्द योग के प्रचार हेतु पैदल अल्मोड़ा आये अल्मोड़ा में उनका स्मृति चिन्ह लोधिया की चुंगी में है. इसी स्थान में स्वामी जी ने एक वृद्धा के हाथ से ककड़ी लेकर अपनी प्यास बुझायी थी स्वामी विवेकानन्द का नागरिक अभिनन्दन अल्मोड़ा में किया गया. अभिनन्दन पत्र कुमाऊँ के प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान श्री गौरी दत्त पाण्डेय जी ने दिया. श्री पाण्डेय की प्रतिमा प्रकाश में न आ सकी. यह अभिनन्दन पत्र संस्कृत भाषा में था. स्वामी जी ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की. जिस भूमि में स्वामी विवेकानन्द का स्पर्श हो क्यों न वहीं साधक, सिद्ध और नाथों का आविभाव न हो. आइए एक दृष्टि उत्तराखण्ड के साधकों पर डालें-

उत्तराखण्ड के सिद्धों में श्री 108 सोमवारी, श्री हैडियाखानी, श्री नारायण स्वामी, श्री उदासीन सन्त और श्री वनखण्डी स्वामी का उल्लेखनीय स्थान है. पूज्य माँ आनन्दमयी ने इस क्षेत्र को पवित्र किया. उनका आश्रम अभी भी पाताल देवी में चिरशान्ति का केन्द्र है ये सभी साधक उच्च के थे. उत्तराखण्ड की मिट्टी का प्रत्येक कण इनके चरण-स्पर्श से पवित्र है. इन्होंने उत्तराखण्ड को अपनी कार्य स्थली बनाया और गहन तपस्या के बाद आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार किया इन्होंने अपनी पवित्र वाणी और समाज सेवा से उत्तराखण्ड के हृदय को जीत लिया.
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श्री पूज्य 108 सन्त सोमवारी पंजाब के बहुत बड़े जागीरदार के एकमात्र पुत्र थे. उनको किसी चीज का अभाव न था. आध्यात्मिक शान्ति और ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने घर को छोड़ दिया और उत्तराखण्ड के दुर्गम स्थानों में तपस्या की. उनकी तपस्या सफल रही. सन्त सोमवारी ने काकड़ी घाट और पदमपुरी में अपने आश्रम की स्थापना की. उनकी वाणी और सत्संग का लाभ उठाने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे. उनको देवतुल्य माना जाता है. नयी फसल का पहला अंश उनके आश्रम को जाता था. वह तीन बार स्नान करते थे. तीनों बार उनका रूप शिव के तीन रूप प्रकट करता था. सन्त ने जीवन पर्यन्त किसी स्त्री को अपने दर्शन नहीं दिये सन्त के आश्रम में रात्रि को कोई विश्राम नहीं करता था धूनी जली रहती थी. पास ही में विशाल चिमटा रहता था. बद्रीनाथ की यात्रा में सन्त के साथ रोगी, वृद्ध, असहाय सभी जाते थे और सकुशल लौटते थे. सन्त अकसर कहा करते थे कि मनुष्य के भाग में जो लिखा होगा वह अवश्य होगा. सन्त मात्र उसको आभास करा सकता है टाल नहीं सकता. इसलिए मनुष्य को अपना कार्य करना चाहिए. फल की आशा नहीं करनी चाहिये.
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कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर एटकिंसन ने इस सन्त की महानता का उल्लेख किया है. सन्त के आश्रम काकड़ी घाट में कोसी नदी में विशाल मछलियां थीं उनको मारना वर्जित था. कमिश्नर के इलाके में मुआयना था. उनके सेवकों ने कहा कोसी में बड़ी मछलियां हैं. आप शिकार कीजिये. शिकार किया गया. लेकिन मछलियाँ चारे को सूंघ कर चलीं गयीं. इसप्रकार एक भी मछली नही फसी. कमिश्नर विश्राम स्थल में थे. उनसे कहा गया तो वह अपने आदमियों पर क्रोधित हुए. ग्रामवासियों ने कमिश्नर साहब से कहा कि ये मछलियाँ आश्रम की हैं. इन्हें मारना वर्जित है. आश्रम के नागा चिमटा लेकर शिकारियों से लड़ने को तैयार हो गये. बाबा ने उनका क्रोध शान्त किया और कहा मछलियों का रक्षक भी ईश्वर है. कमिश्नर को जब आश्रम का पता चला तो उसने अपने सेवकों को माफी माँगने के लिए भेजा. बाबा ने कहा प्रायश्चित तो तुम्हें करना होगा. अतः मछलियों को मिठाई खिलाओ. कमिश्नर के आदेश पर कोसी पर मिठाई के थाल लगाये गये. बड़ी, छोटी सभी प्रकार की मछलियाँ आयीं पर उन्होंने मिठाई को सूंघा और खाया नहीं. कमिश्नर को घटना बतायी गयी.

पुनः कमिश्नर स्वयं आश्रम में गये. बाबा ने उनसे कहा तुम्हारे हृदय में प्रेम है लेकिन तुम्हारे सेवकों के हृदय में नहीं. अतः तुम स्वयं जाकर शुद्ध भाव से मछलियों को मिठाई खिलाओ. कमिश्नर ने बाबा के आदेश का पालन किया. मछलियाँ सारी मिठाई खाकर कोसी में विलीन हो गयीं.

सन्त के हृदय में लोक कल्याण और परमर्थ की भावना थी उनके आश्रम से कोई बिना भोजन किये नहीं जाता था कहते हैं कि उन्होंने तपोबल से कोसी के जल को घी में बदल दिया और घी आने पर कोसी का ॠण साभार उसे दे दिया. सत्तर वर्ष की अवस्था में सन्त ने अपने शरीर को छोड़ दिया. कहा जाता है जब उन्होंने समाधि ली, मनुष्य तो मनुष्य बंजारे के घोड़े भी अपने स्थान से नहीं हटे. सन्त ने अपनी दैवीशक्ति से अपने पिता के निधन के समाचार को जान लिया और कोसी के तट में प्रातःकाल दुःखी मन से अपने पिता को अंजली दी.
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कूर्माचल के सन्तों में श्री 108 हेड़ियाखान का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है. वह श्री सोमवारी के समकालीन थे. दोनों ही सन्त एक दूसरे को महान समझते थे. इस सन्त का स्मृति चिन्ह हैड़ियाखान और कटघरिया में सुरक्षित है. कहा जाता है कि सन्त हैड़ियाखान अमर हैं. उनसे उनकी अवस्था पूछी जाती है तो वे कहते हैं कि मेरी उम्र जानना चाहते हैं वह अपने वस्त्रों को उतारकर अत्यन्त विकराल रूप प्रकट करते थे. शरीर में जगह-जगह घाव और रक्त तथा मवाद. वह कहते थे कि महाभारत के युद्ध में एक योद्धा में भी था. अब मेरी अवस्था का पता लगालो. इसी घटना से उन्हें अश्वत्थामा माना जाता था.

श्री हैड़ियाखानी सफेद मिर्जई कंछोप और लंगोट में आसीन रहते थे. संध्यावंदन के समय उनके गले पर नागों का जाल नसों से बन जाता था. श्री हैड़ियाखानी द्विशरीरी थे. ग्रहण का स्नान उन्होंने कुछ शिष्यों के साथ पुष्कर में किया और उसी समय यह स्नान हल्द्वानी में गोला में किया गया. कहा जाता है कि उन्होंने नेपाल जाते वक्त काली में डुबकी लगाई और अन्तर्धान हो गये. उन्होंने अपने शिष्यों से कहा था कि मैं पुनः प्रकट हूँगा. विश्वास किया जाता है कि स्वामी योगानन्द ने अपनी आत्मकथा में अपने गुरु युक्तेश्वर और लाहिणी महाशय के गुरुमहावतार बाबा का उल्लेख किया है वह हैड़ियाखानी ही थे. उनका आजानबाहु होना और गगास की पर्वत कन्दराओं में लाहिणी को अपनी ओर योगविद्या के लिए आकर्षित करना इसका प्रमाण है.
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कुमाऊं के सन्तों में श्री 108 नीमकरोली के चरम भक्त थे. जिस प्रकार हनुमान के चरम भक्त थे. लोकनायक तुलसीदास ने वाराणसी को भयंकर लिंग से बचाने के लिए संकट मोचन हनुमान की स्थापना जगह-जगह करवायी. उसी प्रकार नीमकरोली जी ने उत्तराखण्ड के हितार्थं हनुमान मन्दिरों की स्थापना करा कर भक्ति का प्रचार किया. लेखक ने इस महान सन्त को सदैव एक ही रूप में देखा. वृद्धावस्था के उनपर कोई चिन्ह न थे. राम की महिमा गाते थे और “मंगल मूरति मारुत नन्दन” उनका प्रिय जाप था. सन्त के शिष्यों में अमीर गरीब सभी थे. उनका मानवीय सहिष्णुता का रूप प्रत्येक उत्तराखण्ड वासी का हृदय जीत लेता है.

कहा जाता है कि सन्त ने अपनी शक्ति से करौली स्टेशन में रेलगाड़ी को रोक दिया था. श्री 108 नीमकरोली का मथुरा में दशगोत्र संस्कार किया गया. चन्दन की चिता में जब उनका शरीर अग्नि को समर्पित हुआ. पीला प्रकाश आसमान में छा गया. इस प्रकार इस सन्त ने मानवरूप में आकर दीन-दुर्बल असहायों की सेवा की. उनके स्मृति चिन्ह हनुमान गढ़ी, नैनीताल, कैची, लखनऊ में अलीगंज और हनुमान सेतु में सुलभ है.
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कुमाऊँ के सन्तों में स्वामी हरनारायण और नारायण स्वामी विद्वता और जन- कल्याण की भावना से प्रेरित थे. स्वामी हरनारायण वेद, पुराण, उपनिषद और धर्म- ग्रन्थों के अद्भुत जानकार थे. स्वामी जी का कार्यक्षेत्र मासी, चौखुटिया और द्वाराहाट रहा. स्वामी जी ने  बहुत दीर्घ आयु में निर्वाण प्राप्त किया.

स्वामी नारायण स्वामी का कार्यक्षेत्र लोहाघाट, चम्पावत, अस्कोट और रामगढ़ रहा. कुर्माचल वासियों की शिक्षा के लिये स्वामीजी ने शिक्षा के केन्द्र खोले स्वामीजी का चौदास व्यास आश्रम चिर शान्ति का केन्द्र है. स्वामी जी का रूप लोकपकारी और जन कल्याणकारी था.

उत्तराखण्ड के सन्तों में श्री 108 नानतिन महाराज का विशेष स्थान है. उनका कार्यक्षेत्र रामनगर (सीतामढ़ी) श्यामखेत और भवाली रहा. श्री नानतिन महाराज अपनी ज्योतिष विद्या के लिए प्रसिद्ध थे. जड़ी-बूटियों में वे सिद्धहस्त थे. असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति उनके पास जाते थे और ठीक होकर आते थे श्री नानतिन महाराज में आध्यात्म और ज्योतिष का सुन्दर समन्वय था. दुर्लभ जड़ी बूटियों का प्राप्ति स्थान वह स्वयं बतलाते थे. चर्म-रोगों में वे सिद्ध हस्त थे. कोढ़ से ग्रस्त मरीजों को उन्होंने पुनः जीवन दान दिया. श्री नानतिन महाराज रामनगर के भयंकर जंगलों में रहते थे. उनके आश्रम के पास हिंसक जन्तु आते थे. और प्रसाद पाकर जाते थे. बाल्यकाल में लेखक ने प्रथम बार नानतिन महाराज के दर्शन नैनीताल में श्री श्रीराम साहजी आढ़ती के यहाँ किये थे. भूरा लंबा चोला उनका प्रिय वस्त्र था. गत वर्ष इस महान सन्त ने चिर समाधि ली. उनकी याद में श्यामखेत में उनका मन्दिर है जहाँ दूर-दूर से लोग दर्शन करने आते है.
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सन्त सोमवारी के महानिर्वाण के समय एक बच्चा निर्वाण स्थल पर कमलदल के डण्डे खा रहा था. यही बालक कालान्तर में श्री 108 ब्रह्मचारी बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए. कहा जाता है कि ये नेपाल के थे. इनकी कुटिया भूमियाधार में स्व० भवानीदास साह सकिल इन्सपेक्टर साहब के यहाँ अब भी है. हर वर्ष यहाँ भण्डारा लगता है. श्री ब्रह्मचारी जी का वसन कभी एक तहमद था तो कभी वे टाई और बेल्ट भी लगाते थे. श्री ब्रह्मचारी अपने शिष्यों के साथ तास खेलने का भी आनन्द लेते थे. वह अपने शिष्यों के विकारों को मिटाकर उन्हें आध्यात्म की ओर प्रेरित करते थे.

उत्तराखण्ड के सन्तों में श्री 108 महादेवगिरी को कोई भूल नहीं सकता है. श्री बाबा गांव-गांव में जाकर आध्यात्म विद्या का प्रचार करते थे. वह योग्य पण्डितों की सहायता से भागवतों का आयोजन करते थे उनके स्मृति चिन्ह चक्रवर्तश्वर (गरुड़) और एड़द्यो में सुरक्षित हैं. श्री महादेवगिरी ने धर्म / कर्म द्वारा उत्तराखण्ड वासियों में आध्यात्म प्रवृत्ति पैदा की. सन्तों की इस भूमि में श्री कैलाशगिरि और वर्तमान में स्वामी बनखण्डी जी को नहीं भुलाया जा सकता है. सातताल के पास की उच्च पर्वत शिखरों में स्वामी बनखण्डी जी धर्म और लोक कल्याण का उपदेश देकर उत्तराखण्ड को जागृत कर रहे हैं.
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पोल वन्टन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में उत्तराखण्ड के श्री उदासीन महाराज का उल्लेख किया है. वे निर्वस्त्र एक पर्वत खण्ड के नीचे आध्यात्म विद्या में लीन रहते थे. कैलास सरोवर की यात्रा के समय अनेकों सिद्ध साधक मार्ग की असध्य कठिनाईयों का सामना करते उत्तराखण्ड को आते थे और देवाधिदेव शंकर की सेवा में तत्पर रहते थे.

इन सिद्धों में एक ऐसे सन्त भी आये जिनका दायां हाथ तीन बार मुड़ा होकर सूर्य की ओर रहता था. हाथ की यह स्थिति हर समय विद्यमान रहती थी. कहा जाता था कि इन सन्त का दक्षिण हस्त सूर्य समर्पित था. इन सन्त पुरुष का साक्षात्कार मेरे मित्र और सहशिक्षक श्री सुरेशचन्द्र पन्त ने अपने बाल्यकाल में बेरीनाग में किये. श्री पन्त के पूज्य पिता और ग्रामसभा के प्रधान श्री पीताम्बर पन्त जी तथा एक सज्जन बेरीनाग में एक सन्त की सेवा के लिए दूध केला और नारंगी लेकर गये. सन्त ने अपनी दिव्य दृष्टि से जानकर कहा कि दूध पीने की इच्छा दूध लाने वाले के हृदय में थी और नारंगी लाने वाले का विचार था कि फल बाबा की सेवा में लाकर क्या लाभ | श्री पन्त के पूज्य पिता स्व० केदारदत्त जी से सन्त कुछ कहा. इस घटना के बाद दोनों सज्जन शुद्ध भाव से बाबा के सत्संग में आने लगे. बाबा के अनुसार हृदय की भावना का पवित्र होना आवश्यक है इसी सन्दर्भ में स्वामी हीरानन्द जी का उल्लेख करना भी आवश्यक है.

स्वामी जी मृदुभाषी और सरल थे. गंगोलीहाट क्षेत्र में पावन हाटकमलिकन के सिद्ध श्री 108 जंगम बाबा अपनी दिव्य शक्ति और मानव कल्याण हेतु उत्तराखण्ड में प्रसिद्ध थे. धन्य है यह पावन उत्तराखण्ड जहाँ सिद्धों के पदचाप उसकी पावन मिट्टी को स्निग्ध करते हैं पवित्र किया इसी भूमि को स्वामी शिवानन्द जी ने मानव रूप में साधुओं की सेवा करके श्रीयुक्त 108 नीम करोली के प्रिय शिष्यों में वर्तमान में भी 108 हरदा बाबा अमेरिका में योगध्वनि को मुखरित कर रहे हैं.

धन्य है यह उत्तराखण्ड जहाँ इन पवित्र सन्तों का प्रादुर्भाव हुआ उत्तराखण्ड की मिट्टी का प्रत्येक कण इनकी आध्यात्म विद्या से ओतप्रोत है. धन्य है गोमती, गंगा, गंगास और कोसी की जलधारायें जो इन प्रवित्र सन्तों की समाधियों को जल का अभिषेक कराती हैं. धन्य हैं यहाँ के वृक्ष, लतादि जिनकी कोपलों से सन्तों के सत्संग की सुवास आती है धन्य है इन सन्तों का प्रसाद जिससे उत्तराखण्ड वासी सरल, निर्वि- कार, तथा त्यागमय जीवन के लिये समर्पित है.
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हरिश्चंद्र मिश्रा

हरिश्चंद्र मिश्रा का यह लेख ‘श्री लक्ष्मी भंडार हुक्का क्लब, अल्मोड़ा’ द्वारा प्रकाशित प्रतिष्ठित पत्रिका पुरवासी के 1989 के अंक में छपा था. काफल ट्री में यह लेख पुरवासी पत्रिका से साभार लिया गया है.

काफल ट्री डेस्क

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