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हत्यारे ही सूत्रधार हैं ‘सेक्रेड गेम्स’ में

‘वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था’, वो बात ये है कि सेक्रेड गेम्स (Sacred Games) नाम की वेब सीरीज़ के सीज़न वन के आठ एपिसोड जाने अनजाने एक समुदाय की बैशिंग की एक समांतर पटकथा को फ़ॉलो करते हैं. बल्कि ये अलिखित और अनकही स्क्रिप्ट ही है जो पूरे सीज़न पर तार की तरह इधर से उधर टंगी है.

अब इसे कहानी की ख़ूबी कहें या इसकी कमी पर ताज्जुब करें कि पात्रों का एक तरह से हम और वे में विभाजन है. गणेश नाम का एक डॉन भी बार बार अपने हिंदू होने और अपने दयावान होने की दुहाई देता फिरता है. दुहाई क्या देता है वो इसका ताबड़तोड़ डंका बजाता है- वह रिवॉल्वर लहराते हुए जैसे अपना ध्वज लहराता है और संभोग करते हुए भी अपनी ताक़त, अपने नियंत्रण और अपने गुस्से और इन्हीं के बीच अपनी कथित करुणा का भी प्रदर्शन करता है. वह ख़ून खौलाता हुआ, फुंफकारता हुआ बदला पूरा करता है और उसी फुंफकार में जब सेक्स करता है तो उसकी पत्नी भी कहती है कि बदला ले लिया तब तुम इस लायक हुए. इस तरह क्रूरता अपना सेक्रेड गेम खेलती है.

सरताज सिंह का साथी इंस्पेक्टर माजिद ख़ान एक बेचारा और अपने बॉस के इर्द-गिर्द रेंगता हुआ जैसा रहता है जिसे बाज़दफ़ा सरताज चिंहित भी करता है और माजिद का आह्वान करता है कि वो बॉस की……से बाहर निकले. आख़िरकार माजिद का हृदय परिवर्तन दिखाया गया है और दृश्य में और दर्शक की ईगो में जहां पहले वो मिसफ़िट था, अब फिट है और स्वीकार्य है.

गणेश एक सेक्युलर डॉन रहा है, वो धर्म को धंधे की राह में रोड़ा मानता रहा है लेकिन उसका अंत मुसलमान बदमाशों को एक एक कर ध्वस्त करते गोली से उड़ाते हुए होता है. वो भयानक गुस्से में आ चुका हिंदू हृदय सम्राट सरीखा है जिसने अपने गिरोह के सेक्युलर तानेबाने को गोलियों से उड़ा दिया है क्योंकि उसे मुसलमान से ही धोखा मिला है. और फिर वो क़ौम को इतनी भद्दी गालियां देता है कि गोली खाते हुए उसके मुस्लिम कारिंदे भी मानो गोली से नहीं ग्लानि से मर रहे हों. पेश ये है कि उनका जीना ही व्यर्थ है. उनकी हैरानी और स्तब्धता को भी ठिकाने लगा दिया गया है. क्या उन्हें ज़ाहिर न कर पाना पात्रों का कच्चापन था या ये निर्देशकीय रणनीति थी. अनुराग कश्यप अपने पॉलिटिक्ल डार्क सिनेमा के लिए जाने जाते हैं, किरदार गणेश की तरह वो शायद धर्म और धंधे को बखूबी जानते हैं और उसे मिक्स भी अपने सिनेमा में एक चतुर अंदाज़ में कर लेते हैं.

कुछ दृश्य विचलित करते हैं, जेएनयू के लापता नजीब और उसकी मां की याद दिलाते हैं. एक बिखरा हुआ और टकटकी लगाए हुए सत्ता और कानून के पास भटकता परिवार है जिसका बेटा लापता है. और वे एक कोने में खड़े रहते हैं. और लगता है कि सरताज या दर्शक की चेतना में प्रेत की तरह चिपक गए हैं. वे इंसाफ़ मिलने तक नहीं हटेंगे. लेकिन ऐसे दृश्य बस एक तरह से रियायत की तरह आते हैं. गणेश डॉन की तरह रियायत बांटते से. सरताज सिंह का साथी कॉस्टेबल बहुत दिनों से थाने में आकर इंतजार कर रही और इंसाफ के लिए भटक रही एक मुस्लिम मां पर आख़िरकार तरस खाकर उसके गुमशुदा बेटे की तलाश में मुंबई के अंधेरों में उतरता है तो गुनहगारों से कोसों दूर वो उचक्कों जैसे उसके साथियों को ही पकड़ लेते हैं जो इस पूरे खेल की बहुत नीचे की कड़ी की तरह दिखाए गये हैं और वे शायद जानते हैं कि मां का खोया बेटा कहां है या है भी या नहीं. मौके पर ही पूछताछ में करूं न करूं के असमंजस से लड़ने वाला कॉस्टेबल मारा जाता है और सरताज सिंह मारने वाले नवयुवक को भागने की कोशिश में गोली मार देता है. बाकी दो साथियों का एनकाउंटर तो बनता ही है.

तो इस तरह मां की तलाश और उसके बेटे की कहानी तीन और मौतों के साथ दम तोड़ देती है या एक नये रिंग में जाकर गुम हो जाती है जैसे इस खेल की पूरी मशीन में मुसलमान मां की दरयाफ़्त और भटकती देह का बस इतना ही काम था और उनकी अधूरी कहानियों को एक बड़े खेल के लिए उस मशीन में पिस जाना था. हो सकता है कि निर्देशकगण कुछ समकालीन हलचलों को भी शामिल करना चाहते हों, लेकिन वेबसीरीज़ के ज़रिये पता चलता है कि इस डार्कनेस की राजनीति में धकियाए हुए और शापित प्रतिनिधि, मुस्लिम ही क्यों हैं. क्या ये उनके साथ एक समानुभूति है या उनके ज़रिए एक बहुसंख्यकवादी श्रेष्ठता ग्रंथि का प्रदर्शन या निर्देशक आज के पॉलिटिक्ल सोशल नैरेटिव की नाव खे रहे हैं? कितने हाथों में कितनी पतवारें. बाज़दफ़ा पता भी नहीं चलता कि ये पतवार है या कुछ और. आप हर बात को फ़िक्शन कहकर अपनी कला के कथित मुहावरे में बंद नहीं कर सकते.

गणेश एक तरह से बंबई का अघोषित सरताज है. वो सेक्रेड गेम्स का खलनायक नहीं प्रतिनायक है बल्कि वो धारावाहिक की शब्दावली के सहारे ही कहें तो वो नायक का भी बाप है. अहम ब्रह्मास्मि तो वो कहता ही है. वो देश के तत्कालीन राजनीतिक सामाजिक हालात पर कंमेट्री भी करता है और सूत्रधार की भूमिका भी निभाता है जिसका कुछ ऐलान तो वो पहले एपिसोड के शुरुआती दृश्यों में कर भी देता है. अभिनय के तो नवाज़ुद्दीन उस्ताद हैं. सैफ़ का डायलेक्ट भी देखने लायक है. राधिका आप्टे के हिस्से और दृश्य होने चाहिए थे. लेकिन माफ़िया से ठीक सर के बीचों बीच गोली दगवा कर उनके रोल का पटाक्षेप कर दिया गया. लेकिन हम यहां एक संरचना के निहितार्थों पर बात कर रहे हैं. मार देने का पूरा पूरा मौक़ा होने के बावजूद वो ज़िद्दी और पिद्दी दोनों तरह से पेश हीरो- सरताज का सिर्फ़ अंगूठा काट पाता है.

बहुसंख्यकवाद से ये देश दरअसल कभी बाज़ आया ही न था. अब ये खुलेआम है. कैसा संयोग है कि एक ओर नेटफ्लिक्स जैसी धुआंधार ऑनलाइन सेवा प्रदाता कंपनी में सेक्रेड गेम्स जैसा एक सीरियल आता है, और इधर राजनीति की मुख्यधारा में हिंदूहिंदू की चिल्लाहट तीखी हो रही है, 2019 बस आया ही चाहता है. स्वामी अग्निवेश के केसरिया वस्त्र भी चीर दिए गए हैं.

वर्चुअल रिएलिटी में सेक्रेड गेम्स का डॉन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को धिक्कार रहा है. और रिएल वर्चुअलिटी में एक पार्टी को धर्म के आधार पर कोसा जा रहा है. वो उसे बोफोर्स, शाहबानो, अयोध्या के लिए बुरी तरह कोसता है और आत्मघाती हमले में उसकी दर्दनाक मौत पर भी सपाटबयानी करता है. एक बेटे के रूप में और पार्टी उत्तराधिकारी के रूप में राहुल गांधी ने इसके जवाब में ग़लत नहीं कहा. सूत्रधार का ज्ञान यहीं तक क्यों सीमित रखा गया, फिर ये सवाल सामने आ जाता है.

मस्जिद क्यों ढहाई गई, रथ किसका था, कौन उसका चालक परिचालक और अदृश्य चालक था- इस पर सेक्रड गेम्स बड़ी चतुराई से आगे बढ़ जाता है. इस तरह पुरानी छाप वाली एक नयी घेरेबंदी बन जाती है. एक नया अग्नि-वृत्त बनने लगता है. सरकार की एक मंत्री कह चुकी हैं कि अब से 19 तक समाज में कोई दंगा फ़साद हुआ तो जिम्मेदारी कांग्रेस की होगी. ये सारे नैरेटिव यहां से वहां फैले हुए हैं. वेब हो या नॉन वेब, फ़ेसबुक हो या किताब, भाषण हो या वॉट्सएप, आभासी हो या वास्तविक- आप पाएंगें कि 90 का दशक अपनी नयी फ़ितरतों के साथ प्रकट है. नये परिधान नयी साज सज्जा नयी खूंखारी के साथ. वहां बाजार खुले थे और रामायण के लिए टीवी सेट खुले थे, यहां तो एक ऐसा घुलामिला धूल और धुएं और खून और शोर से भरा मंज़र बिखरा हुआ है कि आप खुद कभी चकरा सकते हैं कि क्या ये सिर्फ़ चुनावी लड़ाई या सत्ता की भीषण लपलपाहट है या फिर ये कुछ और है जो उतने तक पर ही जाकर थमने वाला नहीं.

क्या हमारे लिए सेक्रेड गेम्स का सही वक्त आना बाकी है या वो खेल हमारे दिलोदिमाग में भरा जा चुका है और हम भी सरताज सिंह की तरह झूठ और सच, फ़र्ज़ और अफ़सोस की मिलीजुली भावनाओं के गर्त में धंसते ही जा रहे हैं. वो गणेश डॉन का बनाया गर्त है. क्या सेक्रेड गेम्स मुबंई (बंबई) के अपराध और राजनीति की हिंसक लड़ाइयों से ज़्यादा हमारे अपने अंजाम की ओर इशारा है.

सेक्रेड गेम्स किसी अन्य खेल का हिडन स्वरूप है जो एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनी के सौजन्य से प्रस्तुत वर्चुअल स्क्रीन पर नहीं बल्कि वास्तविक राजनीतिक और सामाजिक यथार्थ में घटित हो रहा है और हम इस पर कुछ कहना चाहें तो उसे ओवररीडिंग कहकर खारिज भी किया जा सकता है. हो सकता है सेक्रेड गेम्स का अगला सीज़न आए और हमें कुछ साहसी और कम नाटकीय और कुछ अधिक राजनीतिक वस्तुपरकता का वेब-सिने कथानक विस्तार देखने को मिले.

शिवप्रसाद जोशी


‘शिवप्रसाद जोशी ‘वरिष्ठ पत्रकार हैं और जाने-माने अन्तराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों जैसे बी.बी.सी और जर्मन रेडियो में लम्बे समय तक कार्य कर चुके हैं. वर्तमान में शिवप्रसाद देहरादून और जयपुर में रहते हैं.

संपर्क: joshishiv9@gmail.com 

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