संस्कृति

पहाड़ में होने वाले शुभ कार्यों में महिलाओं की भूमिका

बचपन से ही अक्सर हम देखते थे गाँव में कोई भी शुभ कार्य हो महिलाओं की एक विशेष ही भूमिका होती थी. किसी के भी घर का कोई भी मांगलिक काम हो महिलाओं द्वारा उस घर में एकत्रित हो कर गीत गाए जाते थे, शगुन गाये जाते थे. (Role of Women in Auspicious Works in the Mountain)

हर मांगलिक काम का एक अलग ही गीत होता था. यदि किसी का बच्चा होता तो उस समय जच्चा-बच्चा को ले कर गीत गाये जाते, जिस में बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना की जाती. बच्चे की माँ को विशेष तौर पर इस प्रकार से गा कर बधाई दी जाती— “सुहागिली जच्चा बढ़ भागिली जच्चा तुम्हें तुम्हारा बच्चा मुबारक हो, मुबारक हो!” जब माँ द्वारा बच्चे को बार-बार देखा जाता तो उसे चिढ़ाने हेतु महिलाओं द्वारा गाया जाता कि “जच्चा झुकी-झुकी पलना देखे कि लाल मेरा किसपे गया, कि गोरा-गोरा किसपे गया मेरा ललना.”

यदि किसी घर में बच्चे का जन्मदिन होता तो उस समय “तुम्हें और क्या दूँ दुआ के सिवाय, लल्ला तुमको हमारी उमर लग जाये.” इस प्रकार से गीत गाए जाते.

जनेऊ संस्कार के समय अलग ही प्रकार से शगुन गाए जाते हैं और बट्टू के नाम के मंगल गीत गाये जाते हैं.

शादी होने पर तो गणेश पूजा से ले कर विवाह सम्पन्न होने तक महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले मंगलगीतों कि एक अलग ही भूमिका होती है. शुरुआत में शगुन गा कर फिर बाकी गीतों को गाया जाता है. महिलाएं वधू पक्ष से हो या वर पक्ष से हर कोई अपनी अपनी तरफ से मंगलगीत गाते हैं.

पक्की सड़क से जुड़ चुका गांव अब गांव सा नहीं रहा

‌जब बारात तैयार होने को होती है तो महिलाओं द्वारा गाया जाता है, “दूर घुमन मत जाओ प्यारे बन्ना, आज तुम्हारी शादी का दिन है.” बारात जब लड़की के घर पहुँचती है तो वधूपक्ष द्वारा वर पक्ष के स्वागत में विभिन्न प्रकार के गीत गाये जाते हैं. स्वागत गीत के पश्चात हंसी मजाक वाले भाव से गीत इस प्रकार से गाये जाते हैं— “आये बाराती आये, आये हैं बड़ी शान से.” या फिर “मुर्गा बोला कुकड़ी कूं, इतने बाराती लाये क्यों.” इस प्रकार माहौल एकदम ख़ुशनुमा हो जाता है. उसके बाद जब दुल्हन आँगन में आ जाती है तो इस तरह से गीत गाया जाता है — “दूर बन्ना गाये बन्नी को बुलाये आजा प्यारी बन्नी रे अटरिया सुनी रे.” जब वरपक्ष की तरफ से दुल्हन को सुहाग का सामान दिया जाता है तो महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला गीत होता है—  “सुहाग अम्बे गौरी बन्नी को दीजो सोहाग, जैसो सोहाग तुमने सरस्वती को दीना सरस्वती ने ब्रह्मा वर पाय. पाय अम्बे गौरी बन्नी को दीजो सोहाग.” इसी प्रकार से अन्य देवी-देवताओं के नाम के साथ गीत को समाप्त किया जाता है.

जब माता-पिता द्वारा लड़की का कन्यादान किया जाता है और वर द्वारा वधू का अंगूठा पकड़ा जाता है तो मंगलगीत गाने वाली महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला गीत होता है— “पकड़ कर हाथ का अंगूठा गृहस्थी अब चलानी है, निभाया आज तक बचपन गृहस्थी अब निभानी है.” जिस से माहौल एकदम से हँसी मज़ाक से ठहराव में आ जाता है. इसके उपरांत फेरे की विधि के समय भी कुछ मंगल गीत गाये जाते हैं.

हर शुभकार्य में महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले शगुन और मंगलगीत खुशियों में और भी चार चाँद लगा देते हैं. ️

पिथौरागढ़ में रहने वाली भूमिका पाण्डेय समाजशास्त्र और मनोविज्ञान की छात्रा हैं. लेखन में गहरी दिलचस्पी रखने वाली भूमिका पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज की उपाध्यक्ष भी रह चुकी हैं.

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

इसे भी पढ़ें: बदलते ज़माने में पहाड़ की महिलाओं के हालात कितने बदले

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Sudhir Kumar

Recent Posts

यह सिस्टम बचाता है स्विट्ज़रलैंड के पहाड़वासियों को आपदा से

एक ही समय में धराली और स्विट्ज़रलैंड में हिमस्खलन या भूस्खलन की घटनाएं हुईं, लेकिन…

20 hours ago

10 डिग्री की ठंड में फुटबॉल का जोश : फोटो निबन्ध

फुटबॉल के जुनून के सामने ठंड के मौसम में भी खिलाड़ियों ने मैदान में अपने…

21 hours ago

क्या हमें कभी मिलेंगे वो फल जो ट्रेल ने कुमाऊं में खाए?

आजकल पहाड़ को समझना समय को उल्टा पढ़ना हो गया है. पिछले कुछ वर्षों से…

21 hours ago

प्रबल प्रयास की चाह में सिडकुल और उपजी विषमता

पिछली कड़ी  : तिवारी मॉडल में पहाड़ की उद्योग नीति और पलायन राज्य अंर्तसंरचना एवम औद्योगिक विकास…

21 hours ago

बर्फ ही नहीं हरियाली भी गायब हो रही है हिमालयी इलाकों से

हिमालय को आमतौर पर बर्फ़, जंगल और हरियाली का प्रतीक माना जाता है, लेकिन एक…

7 days ago

उत्तराखंड क्रिकेट टीम से रचा इतिहास

उत्तराखंड क्रिकेट ने रविवार को एक नया इतिहास रच दिया. राज्य की टीम ने जमशेदपुर…

7 days ago