ललित मोहन रयाल

महाभारत पढ़ने का सही तरीका

पुराने लोग कहते थे, घर में महाभारत नहीं रखनी चाहिए. जिस घर में रहेगी, उसी घर में महाभारत शुरू हो जाएगी. वे बच्चों को महाभारत पढ़ने से रोकते थे, टोकते थे.
(Mahabharata Lalit Mohan Rayal)

जानकार महाभारत को पढ़ने की एक व्यवस्था दिए रहते थे. उनके मुताबिक, इसे शुरू से न पढ़कर, एक निश्चित क्रम में पढ़ना चाहिए.

-‘शांति पर्व से शुरुआत करो. तत्पश्चात् उससे आगे के पर्वों को पढ़ो.’

-शांति पर्व बारहवां पर्व है. उससे आगे अनुशासन पर्व आता है, जिसमें शरशैया पर लेटे भीष्म, नीति-उपदेश देते हैं और उसके बाद उनका स्वर्गारोहण हो जाता है.

इस पर्व के बाद अश्वमेध पर्व, आश्रमवास पर्व, मौसुल, महाप्रस्थान और स्वर्गारोहण पर्व आते हैं. ध्यान देने की बात है कि शांति पर्व में विजेता के मन में गहरा पश्चाताप छा जाता है. इतना बड़ा संहार हो गया. फिर से मानवता को स्थापित करना है. जिसके लिए शासक वर्ग, लोकमंगल के कार्यों में जुट जाता है.
(Mahabharata Lalit Mohan Rayal)

शेष पर्वों में धर्म-कर्म, जीवन-दर्शन, मोक्ष इत्यादि की बातें होती है. इतनी सारी बातें पढ़कर, पाठक इस ग्रंथ को पढ़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है.

यहां से वो फिर शुरुआत में चला जाए तो कोई हर्ज नहीं. इसीलिए पुराने लोग, इतना पढ़ लेने के बाद ‘आदि पर्व से लेकर स्त्री पर्व’ तक पढ़ने की सलाह देते होंगे.

इतना पढ़ लेने के बाद, पाठक जान जाता है कि युद्धों के भयंकर दुष्परिणाम निकलते हैं. बाद का हिस्सा पढ़कर, शुरू के पर्वों के राग-द्वेष, लड़ाई- झगड़े गौण लगने लगते हैं. कहने का मतलब है कि बाद का हिस्सा पढ़कर, पाठक एक किस्म से विराट देखने का अभ्यस्त हो जाता है.

शांति पर्व से ठीक पहले के सात पर्व, विशुद्ध रूप से युद्ध से संबंधित हैं. उद्योग पर्व में युद्ध की तैयारियां आती हैं. भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, कर्ण पर्व और शल्य पर्व में अठारह दिन का युद्ध सिमट जाता है.सौप्तिक पर्व में अश्वत्थामा सोए हुए द्रौपदेयों और पांचालों का वध करता है. स्त्री-पर्व में युद्ध की विनाश लीला दिखती है. इसी में गांधारी के शाप वाला प्रसंग भी आता है.
(Mahabharata Lalit Mohan Rayal)

कहने का मतलब है, आधी से ज्यादा महाभारत, युद्ध-विवरणों में चली जाती है. शुरू के चार पर्वों में आदि पर्व, सभा पर्व, आरण्यक पर्व और विराट पर्व आते हैं.

बड़े-बुजुर्गों के मन में एक आशंका ये भी रहती होगी, कि शुरुआती पर्व पढ़कर लड़का छल-छद्म, घात-प्रतिघात, षड्यंत्र-कूटनीति सब सीख लेगा. फिर वहां तक तो कणिक-पुरोचन का ही बोलबाला रहता है. विदुर बेचारे जब-तब सभा में अपनी नीति के चलते धृतराष्ट्र से तिरस्कार पाते हैं.

उधर सभा के बाहर, सुयोधन-शकुनि का खेमा हाहाकार मचाए रहता है. पांडव बेचारे छद्म-वेश में जहां-तहां अपनी जान बचाए फिरते हैं

फिर लड़कपन की अवस्था भी कुछ ऐसी होती है कि उसमें उतावली कुछ ज्यादा ही रहती है. धैर्य का अभाव सा रहता है. अब बच्चा आधा-अधूरा ज्ञान लेकर ये कहते हुए कि ‘ये तो धर्मग्रंथों में दी हुई व्यवस्था है’, एक्सपेरिमेंट पर उतर गया तो उसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं. इस खतरे को टालने के लिए ही, विद्वानों ने एक दूसरे ही क्रम में, महाभारत पढ़ने की सलाह दी होगी.
(Mahabharata Lalit Mohan Rayal)

उत्तराखण्ड सरकार की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत ललित मोहन रयाल का लेखन अपनी चुटीली भाषा और पैनी निगाह के लिए जाना जाता है. 2018 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘खड़कमाफी की स्मृतियों से’ को आलोचकों और पाठकों की खासी सराहना मिली. उनकी दूसरी पुस्तक ‘अथ श्री प्रयाग कथा’ 2019 में छप कर आई है. यह उनके इलाहाबाद के दिनों के संस्मरणों का संग्रह है. उनकी एक अन्य पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य हैं. काफल ट्री के नियमित सहयोगी.

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