कभी बूढ़ा न होने वाला एक नास्टैल्जिया – सिनेमा पारादीसो

आशीष ठाकुर

 

आशीष ठाकुर
आशीष मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं.फिलहाल पिछले 15 वर्षों से मुंबई में रहते हैं. पहले एडवरटाइजिंग, फिर टेलीविज़न और अब फ्रीलांसिंग करते हुए मीडिया से जुड़े हुए हैं. फिल्मों और साहित्य से गहरा जुड़ाव रखते हैं और फिलहाल इसी क्षेत्र में कुछ बेहतर करने के लिए प्रयासरत है.

 

 

बहते हुए वक़्त के सीने में टँकी एक जवान याद है सिनेमा पारादीसो. ज्यूसेप्पे तोर्नातारे की ये कविता कभी बूढ़ी नहीं होती. यह यादों का वो मखमली तूफ़ान है जिसमे गहरे और गहरे डूब जाने को जी चाहता है. यहाँ पतझड़ के बाद बसंत आता तो है, लेकिन एक उदासी लिए. यहाँ दर्द खूबसूरत है, यहाँ दिल टूटकर नरम-नरम घास के पत्तो पर गिरता है.

समंदर किनारे बसा इटली का एक छोटा सा गाँव, जहाँ नीले समंदर और चमकीली धूप का रिश्ता गाँव की ज़िंदगी में भी रचा बसा है. बूढ़े अल्फ्रेडो के साथ छोटा सा टोटो सिनेमा के जादू में ऐसा डूबता है कि वही सिनेमा उसकी ज़िन्दगी बन जाता है. विधवा माँ और छोटी बहन के साथ ज़िन्दगी कठीन थी लेकिन सिनेमा टोटो की ज़िन्दगी को सुनहरा बना रहा था. फिर वक़्त ने अपने पन्ने पलटे, छोटा टोटो अब जवान सल्वातोर बन चुका है, ऐलेना की नीली आँखें उसे गाँव के समंदर की तरह लगी, खूबसूरत, गहरी, अपनी सी. लेकिन सेकंड वर्ल्ड वॉर और ऐलेना के पिता तूफ़ान बन के आते हैं जिसमें सल्वातोर के सारे सपने बह जाते हैं. जब सब कुछ खोने का दर्द ही जीने का सहारा बन जाए तो दर्द की उसी मिट्टी से कला का जन्म होता है. मौसम अब बदल चुका है ३० साल बीत गए, सल्वातोर अब एक बड़ा फ़िल्म डायरेक्टर है. बूढ़े अल्फ्रेडो की मौत उसे फिर से अपने गाँव ले आती है. जिस नास्टैल्जिया से वो ३० सालों से बच रहा था, वहीं फिर से सामने खड़ा है. बचपन के जाने-पहचाने चेहरों पर उम्र चढ़ चुकी है, कच्ची गलियां अब पक्की सड़क में बदल चुकी है सिनेमा पारादीसो भी बस टूट कर गिरने ही वाला है वहां एक मॉल बनेगा. ज़माना बदल चुका है, बाज़ार का होना ज़रूरी है रिश्तों का नहीं. मॉर्डनाइज़ेशन में स्मृतियों के लिए क्या जगह!

३० सालों बाद दिल फ़िर धड़कता है ऐलेना एक बार फ़िर सामने खड़ी है. जब पहले प्यार में उदासी घुल जाती है तो उसकी महक और भी बढ़ जाती है. टूटे हुए काँटे के ज़ख्म को कुरेदने का अपना ही मज़ा होता है. ३० सालों के बाद ऐलेना से कुछ पलों की मुलाक़ात में सल्वातोर के बरस पिघल जाते हैं. लेकिन ज़िन्दगी के अपने उसूल होते है, उसे दिलों के टूटने, मिलने-बिछड़ने से क्या मतलब? साल्वातोर वापस लौट जाता है, रह जाती है उदासी, रह जाता है धीमे-धीमे सुलगता, सब कुछ खो देने के एहसास के लोभान की खुशबू से महकता दर्द.

बकौल जावेद अख्त्तर

कौन दोहराए अब पुरानी बातें
ग़म अभी सोया है जगाये कौन

लेकिन ज़िन्दगी दर्द के इस पुराने ब्लैक एंड वाइट अलबम में ही खूबसूरत नज़र आती है. सिनेमा पारादीसो देखने के बाद ऐसा लगता है ज्यूसेप्पे तोर्नातारे ने ज़िन्दगी के उजले से कैनवास पर पीले रंग से बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया हो – नास्टैल्जिया.

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