समाज

गढ़वाली गीत-संगीत-रंगकर्म का आदिपुरुष : जीत सिंह नेगी

साल 2014 में मैं जब जीत सिंह नेगीजी से पहली बार रूबरू मिला था तो सोचा था कि वापसी में ढेर सारे गीतों का खज़ाना मेरे पास होगा. ये जानकर बहुत कष्ट हुआ था कि खुद उनके पास भी उनके गीत ग्रामोफोन रिकार्ड्स, कैसेट्स, सीडी जैसे किसी भी ऑडियो फॉर्मेट में उपलब्ध नहीं हैं. उन्हीं के पास क्या किसी के भी पास नहीं हैं. कुछ साल पहले दिल्ली के किसी सज्जन ने ग्रामोफोन रिकॉर्डस उनके पास होने की बात जरूर कही थी लेकिन आज तक कोई प्रमाण उन्होंने भी दिया नहीं है.
(Remembering Jeet Singh Negi)

व्यक्ति-सृजित गढ़वाली गीत-संगीत के आदिपुरुष जीत सिंह नेगी जी के जीवनकाल का अनुमान कुछ इस तरह किया जा सकता है कि 78 वर्ष की अवस्था में इसी माह दिवंगत लोकगायक हीरा सिंह राणा उनसे 17 साल छोटे थे. सन 59-60 में जब हीरा सिंह राणा पहाड़ से दिल्ली पहुँचे ही थे तब तक जीत सिंह नेगी न सिर्फ आकाशवाणी सहित कई महानगरों के मंचों से अपने गीतों और गीतनाटिकाओं की प्रस्तुति दे चुके थे बल्कि कई हिंदी फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में भी योगदान दे चुके थे. समकालीन उत्तराखंड के सफलतम गीतकार-गायक-संगीतकार, नरेन्द्र सिंह नेगी और जीत सिंह नेगी में तो पूरी एक पीढ़ी का अंतर है.

एक कलाकार के लिए इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि उसके जीते जी ही उसकी रचनाएँ अप्राप्य हो जाएँ और वो स्वयं अप्रासंगिक. 95 वर्ष का सुदीर्घ जीवन जीने वाले जीत सिंह नेगी जी के अंतिम 25 साल लगभग गुमनामी में ही बीते. इसी गुमनामी के दौरान उत्तर प्रदेश से अलजग राज्य उत्तराखंड अस्तित्व में आया. विडम्बना ये भी कि उनका आवास इस नवसृजित राज्य की अस्थायी राजधानी में स्थित विधानसभा से मात्र दो किमी के फासले पर होने के बावजूद, किसी ने उनकी गीत-प्रतिक्रिया को जानने-सहेजने का कभी प्रयास ही नहीं किया.

2 फरवरी 1925 को पौड़ी की पैडलस्यूं पट्टी के अयाल गाँव में जन्मे जीत सिंह नेगी को उनके चाहने वाले गढ़वाली सहगल कहा करते थे. बचपन, सुदूर बर्मा (म्यांमार) में बीता, पिता के साथ. 1949 का साल उनके रचनात्मक जीवन का पहला टर्निंग प्वाइंट था जब यंग इण्डिया ग्रामोफोन कम्पनी ने उन्हें रिकार्डिंग के लिए बम्बई बुलाया. कहा जाता है कि उनके सर्वाधिक लोकप्रिय गीत, तू होली उंचि डांड्यों मा बीरा घसियारी का भेस मा… को 1961 की जनगणना में सर्वाधिक लोकप्रिय पहाड़ी लोकगीत के रूप में दर्ज़ किया गया था. यही नहीं 1957 में एचएमवी और 1964 में कोलम्बिया ग्रामोफोन कम्पनी के लिए आठ गढ़वाली गीतों को रिकार्ड कराकर कीर्तिमान स्थापित किया था जो उत्तराखण्ड के परिपेक्ष में आज भी बरकरार है.

जीत सिंह नेगी जी ने गीत लिखने और उन्हें संगीतबद्ध कर गाने के साथ-साथ सांस्कृतिक दृष्टि से एक और उल्लेखनीय योगदान दिया है. ये योगदान है गीतनाटिकाओं का लेखन, मंचन और निर्देशन का. नाटिकाओं के संवादों को गेय और गीतात्मक बनाने के पीछे उनका दमदार तर्क था कि इससे नाटिकाओं में क्षेत्रीय उच्चारण-भेद-जनित असहजता नहीं रहती. उनकी प्रमुख नाटिकाओं भारी भूल, मलेथा की कूल, जीतू बगड्वाल, रामी, राजू पोस्टमैन का मंचन उनके देश के महानगरों में दर्जनों बार हुआ था. खलीफा और चैदहवीं रात फिल्म में उन्होंने बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया. आकाशवाणी द्वारा भी उनकी नाटिकाओं का प्रसारण किया गया है.
(Remembering Jeet Singh Negi)

जीत सिंह नेगी पहले गढ़वाली गायक थे जिनके गीत दिल्ली आकाशवाणी से 1955 में रिकॉर्ड हुए. गीत गंगा, जौंळमंगरी, छम घुंघुरू बाजला उनके गीत संग्रह हैं. म्यारा गीत नाम से संस्कृति विभाग ने भी उनका गीत संग्रह प्रकाशित किया है. 1942 से 1987 तक पैंतीस वर्षों तक वो गायन-मंचन के सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय योगदान करते रहे. इस तरह चालीस के दशक से सत्तर के दशक की तीस वर्षीय अवधि को गढ़वाली गीतिकाव्य और गीतनाटिका के इतिहास में जीत सिंह नेगी युग कहना पूरी तरह न्यायसंगत है. देश के विभिन्न नगरों की प्रवासी पर्वतीयों की संस्थाओं ने उन्हें दिल खोल कर प्यार दिया, सम्मान दिया तो पहाड़ में रहने वाले भोले-भाले पहाड़ियों के लिए उनके गीत, पहाड़-सी दिनचर्या के बीच और लोकगीतों से अलग किसी वरदान से कम नहीं थे. घूमते हुए काले तवे जैसे ग्रामोफोन रिकॉर्ड से निकलते, गढ़वाली गीतों के दिल को बेधते बोल और मर्मस्थल को स्पंदित करता संगीत, उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था. वो जिसने जीत सिंह नेगी को कभी देखा भी न था उनकी दिलकश आवाज़ को पहचानने में कोई भूल कभी नहीं कर सकता था, इस तथ्य के बावजूद कि ग्रामोफोन रिकार्ड्स की पहुँच तब गाँवों तक नहीं थी. आकाशवाणी ने जीत सिंह नेगी की आवाज़ को पहाड़ के घर-घर की जानी-पहचानी आवाज़ बना दिया था.

व्यक्तिसृजित गीत हालांकि जीत सिंह नेगी के जन्म से लगभग सौ साल पहले से लिखे जाने लगे थे फिर भी ये भी तथ्य है कि गढ़वाली गीतिकाव्य को पहला मात्रात्मक विस्तार जीत सिंह नेगी ने ही दिया. न सिर्फ विस्तार दिया बल्कि उन्हें मधुर स्वर और कर्णप्रिय संगीत भी दिया. कुछ लोगों को ये मलाल है कि वे आयु का शतक बनाने से चूक गए पर मैंने उन्हें उनके जीवित रहते ही गढ़वाली गीतों का जिंदा शतकीय दस्तावेज़ की उपमा दी थी. एक ऐसा दस्तावेज़ जिसकी वजह से गढ़वाल के गीत-संगीत और नाटिकाओं के माध्यम से यहां की गौरवपूर्ण गााथाओं को देश के सभी छोरों में प्रतिष्ठा मिली. ऐसे कालखण्ड में जब गढ़वाल की गढ़वाल राइफल्स के अतिरिक्त कोई विशिष्ट पहचान शेष देश-दुनिया में नहीं थी.

जीत सिंह नेगी के गीतों का महत्व सिर्फ लोकरंजन को लेकर ही नहीं है. उनके गीतों में एक ऐसे कालखण्ड का गढ़वाल संरक्षित है जिसमें प्रिंट मीडिया की पहुँच यातायात और संचार की तरह पहाड़ में बहुत सीमित थी. यहाँ के सामाजिक-आर्थिक पक्षों पर जब विश्वविद्यालयी शोधकर्ता मौन थे और अपनी सांस्कृतिक धरोहर के प्रति आत्मविश्वास जब अत्यंत दयनीय था.
(Remembering Jeet Singh Negi)

उनके कुछ गीत फोटोग्राफ की तरह तत्कालीन परिस्थितियों को दिखा जाते है. जैसे जौंळमंगरी का ये गीत, जिसके लिए किसी व्याख्या, किसी टिप्पणी की भी जरूरत नहीं  – गैथू भट्टू का द्वी फांगा अर/ एक झंगरेड़ो तीन कुदाड़ी/ ओबरा-पांडा को कूड़ो एक/गोरू का बिना गुठ्यार खाली/ चूनौ बाड़ी बसींगा की भुज्जी/ कबि कंडली को कफिलो बणैकी/ अणभुटो अद्उमलो अलुणो/ पेट बुझांदा छा ऊ खैकी/ बिंडी कै दिनू गैथ उजैकी/कटदा छा बेली भट बुखैं की/ कबी त इनी भूखा ही रैकी/ से जांदा छैया नौना बुथे की. जौंळमंगरी गीतसंग्रह जीत सिंह नेगी की अपनी उस एकतरफा प्रेयसी को भेंटस्वरूप है जो चेहरा भी न देख सकने के बावजूद उनकी हृदय-वीणा के तार झंकृत कर गयी थी. उनके ही शब्दों में –  मिन जौंळमंगरी का मूड़ तेरी/ परछैं-ही-परछैं देखी छै/ त्यारा हातू मा पैली दीणू को या – तब गीतू की पतरी लेखी छ.

कन्या के पिता द्वारा धन-आभूषण लेकर बेटियों का विवाह तय करना तत्कालीन पहाड़ का कटु यथार्थ है. लोकगीतों में भी ये दर्द खूब मुखरित हुआ है. जीत सिंह नेगी ने भी इसे एक मार्मिक गीत का विषय बनाया है – नौनी तैं बारा बरस नी ह्वीना/ मंगदेरु की पांति लगणा लगीना/ स्वाणी मुखड़ी देखीक वींकी/ द्वी सेठ जमी की बैठि गीना/ निरभागी छोरी स्वाणी नि हूंदी/ चुलबुली सुबाणी ल्हे नि हूंदी/ त यूं रागसू का हात बिकी/ बेजति ह्वेकी किलैकी रूंदी/ सेठू की चांदी का कलदारू की/ थौली बजणा लगीना खणाखण/ नथुली, बुलाक,मुरखला, झिंवरा/ पौंछी बजणा लगीना छणाछण/ बुड्या सेठ तैं नौंनी दीणू को/ बुबान् जनी बचन द्याया/ कुंगलो सी फूल तबरि एक/ डाला बटि भियां पोड़ी ग्याया/ एक तरफ बुबा की कंगाली/ हैंकी तरफ छै जीवन की हत्या/ पर भुलौं की दशा देखि वींना/ थौली बुबा मा पकड़े द्याया.

पहाड़ी-ब्याहताओं के मायके से अतिशय लगाव को भी उन्होंने एक सुंदर गीत में व्यक्त किया है – सौंण-भादौ का बादलू सूणा/ बरखा न कयां मिन मैत जाण/ ऐ गे घिया संगरांदी को मैना/ कखड़ी मुंगरी खाणा का दिना/ मैत की सबि भलि-बुरी चीजी/ खाणा मा मीठी ही लगदीना/ मी तैं रुलैकी तुमना क्या पाणा/ बरखा ना कयां मिन मैत जाणा.
(Remembering Jeet Singh Negi)

बम्बई में रहने के कारण कुछ गीतों में फिल्मी असर भी दिखाई देता है पर इस असर को वो खूबसूरती से पहाड़ी महक देने में भी सिद्धहस्त थे – मी तैं सदानी कू अब भूल जैयां/ भूली कै बी कबि याद नी कैयां/ आज तुमारी बारात जाली/ तुम तैं दगड़्या नयीं मिली जाली/ मी तैं अभागी वीयी बिवालो/ थौलौंन रुप्या जू बुबा मा द्यालो/ हम द्वी दगड़्या बस इतगै छैयां/ जब तक डांड्यूं हम ग्वेर छैयां.

जीत सिंह नेगी के सुपरहिट गीतों की बात करें तो तू होली उंचि डांड्यों मा बीरा, घसियारी की भेस मा, पहले नम्बर पर आता है. इतना लोकप्रिय कि दशकों तक गढ़वाल में घसियारी और बीरा एक-दूसरे के पर्याय जैसे हो गए. पहाड़ो का सुरम्य ग्राम्य जीवन किस तरह नौकरी के लिए परदेश में रह रहे एक पहाड़ी को याद आकर व्याकुल करता है, यही इस गीत की थीम है. पाकी गैना गौं की सारी, पड़िगे सट्यों की झड़ाई, मेरी कमला/ भेंटि जा तू आज मी तैं, हिमाली जांदु छौं लड़ाई, मेरी कमला दूसरे नम्बर पर आता है. सैन्यबहुल गढ़वाल-कुमाऊँ के हर तीसरे घर में ये दृश्य आम होता था. गीत 1962 के चीन-यु़द्ध के समय का लिखा हुआ है. लोकप्रियता में भले ही तीसरे नम्बर पर हो पर पंचमी गीत उनका सर्वाधिक कलात्मक गीत है. बिम्ब, रूपकों और मानवीकरण के सम्मिलित प्रभाव से गीत सुनने में जितना मधुर लगता है पढ़ने में भी उतना ही रस प्रदान करता है. ऐसा लगता है जैसे गीत सुन-पढ़ नहीं रहे बल्कि कोई बुजुर्ग उंगली पकड़ कर किसी बच्चे को बसंतपंचमी की सुबह प्रकृति के मनोहारी रूप को दिखा रहा हो, समझा रहा हो – पिंगळा परभात का घाम तै लेकी/सूरज धार मा ऐगे/ भैर ओ धौं माऊ की पंचमी तेरो बसंत ऐगे/कुंगळी हत्यों ला देळी देळ्यूं मा, फूलू को रंग चढ़ीगे/ दीदी भुल्यूंक का गीतू कि ढौळ मा, ऋतुराज नाचण लैगे/ डांड्यूं का मौळ्यार दगड़्या, पाखी पिंगळी फ्यूलड़ि कैगे/ ग्वेरू का गीतू मा कृष्ण सि जीतू, बांसुरी बाजण लैगे. अगले नम्बर पर इस गीत को रखा जा सकता है जो भावविह्वल कर देता है.

पति-पत्नी-दुधमुँहे बच्चे का छोटा परिवार. घास को जंगल गयी पत्नी का सांझ ढलने तक भी लौट कर न आना. आशंकाओं से बेचैन पति का पत्नी को याद करते हुए अदरोयी (आधे रास्ते तक सहायतार्थ जाने वाला) आना  -घास काटीक प्यारी छैला हे, रुमक ह्वेगे घर ऐजा/ दूदी का नौंना की हिंगर गड़ींच, बग्त ह्वेगे घर ऐजा. लोकप्रियता के क्रम में अगले नम्बर पर इस गीत को रखना चाहूंगा – चल रे मन माथी जयोंला कैलासू की छांऊ रे/ बैठी होली गौरा भवानी शिवजी क पांऊ रे. ये गढ़वाली का एकमात्र गीत है जिसमें लोकनृत्य सरौं का भी उल्लेख है. गौरतलब है कि सरौं छोलिया का गढ़वाली संस्करण है और कुमाऊं से लगे पौड़ी के इलाके में किया जाता है.
(Remembering Jeet Singh Negi)

यह भी उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा कि सरौं लोकनृत्य की राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार प्रस्तुति देने वाली टीम में इन पंक्तियों के लेखक को भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है. अगले क्रम पर रखा गीत, मेरी व्यक्तिगत पसंद है. नव-ब्याहता का पति साढ़े चार साल बाद घर लौटा. पत्नी के हिस्से में पति से बात करना दिन में नसीब न हुआ. सास-ससुर और गाँव की प्राॅयरिटी लिस्ट में उसका क्रम लगभग आखिर में जो था. फिर ये हसरत रात को पूरी हुई. सुबह पति के प्रति अनजाने में किए अन्याय का उसे अहसास हुआ. इधर मुर्गा है कि बांग देकर सबको जग जाने की चेतावनी दे रहा है. पत्नी मन नही मन मुर्गे से प्रार्थना कर रही है कि – माठु-माठु बास रै मैर! निंद ऊंकि बिजि जाली/ सैरी रात हमारी बातू मा बीती, आँखीं छन घुँघर्याळी. वो पंक्तियां तो और भी कलात्मक और मौलिकता लिए हैं जहाँ पत्नी कहती है कि – ऊँको ढब च सेण कू मेरि जंदरि का गगराट मां/ मेरो ढब च बस ऊँका निंद्रा का घुर्राट मां.

जीत सिंह नेगी जी के गीत और गीतनाटिकाएँ हमारी धरोहर हैं, पथप्रदर्शक हैं और सृजन-प्रेरणा देने वाला प्रकाशस्तम्भ भी. मैं अपने को खुशनसीब मानता हूँ कि मैंने उनके गीत उनके मुख से उनके सम्मुख बैठ कर सुने हैं क्योंकि आज साउण्ड-टेक्नालॉजी के चरम उत्थान काल में भी उनके गीत किसी तकनीकी विधा से भी संरक्षित नहीं हैं. गीत-संगीत-गायन के सशक्त हस्ताक्षर नरेन्द्र सिंह नेगी का उल्लेख किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती. और बात ये कि उन्होंने जीत सिंह नेगी जी की धरोहर को जीवित रखने के लिए अकेले ही वो प्रयास किया है जो लाखों लोग मिलकर भी नहीं कर सके. और ये प्रयास है – जीत सिंह नेगी के लोकप्रिय गीतों को अपनी आवाज़ में ऑडियो एलबम के रूप में समाज को भेंट करना. तू होली बीरा नाम की इस एलबम के गीतों को सुनकर, जीत सिंह नेगी जी के गीतों से पहचान का एक रास्ता सुरक्षित हो सका है.

गीत में शब्द और संगीत मूल गीतों का ही है बस स्वर उस लोकप्रिय गायक का है जो उनसे 23 साल बाद पैदा हुआ था. गीत-संगीत के क्षेत्र में जोरआजमाइश कर रहे समकालीन युवाओं को इस प्रसंग से अवश्य ही सीख लेनी चाहिए कि धरोहर और अग्रगामियों का सम्मान करके ही आप भी सम्मान और प्रतिष्ठा के हक़दार बन सकते हैं. अपने गीतसंग्रह के आवरण पृष्ठ पर जीत सिंह नेगी जी से आशीषस्वरूप प्राप्त दो पंक्तियों को भी मैं सगर्व अपना बैंक-बैलेंस बतलाता हूं. जीत सिंह नेगीजी! गढ़वाली गीत-संगीत-रंगकर्म के लिए आप राजमार्ग निर्मित कर गए हैं, हमीं में इस पर चलने का सलीका न हो तो ये हमारा दुर्भाग्य. अलबिदा हे अमर गीतशिल्पी. जब तक पहाड़ों में हरी घास रहेगी, बीरा भी रहेगी और तू होली बीरा का कालजयी गीतकार-गायक की याद भी. पहाड़ की हर बसंतपंचमी पर पीले प्रभात की सुखद ऊष्मा को लेकर सूरज जब भी धार में आएगा, आगोश में जीत सिंह नेगी जी की झलक हमेशा दिखलाएगा. उसी सूरज को मैं भी श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूँ.
(Remembering Jeet Singh Negi)

1 अगस्त 1967 को जन्मे देवेश जोशी अंगरेजी में परास्नातक हैं. उनकी प्रकाशित पुस्तकें है: जिंदा रहेंगी यात्राएँ (संपादन, पहाड़ नैनीताल से प्रकाशित), उत्तरांचल स्वप्निल पर्वत प्रदेश (संपादन, गोपेश्वर से प्रकाशित) और घुघती ना बास (लेख संग्रह विनसर देहरादून से प्रकाशित). उनके दो कविता संग्रह – घाम-बरखा-छैल, गाणि गिणी गीणि धरीं भी छपे हैं. वे एक दर्जन से अधिक विभागीय पत्रिकाओं में लेखन-सम्पादन और आकाशवाणी नजीबाबाद से गीत-कविता का प्रसारण कर चुके हैं. फिलहाल राजकीय इण्टरमीडिएट काॅलेज में प्रवक्ता हैं.

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