अपनी एक यात्रा में कमल जोशी
मशहूर इतिहासकार व लेखक राम चन्द्र गुहा ने कल यानी 28 जुलाई को ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में छपे अपने एक लेख में पहाड़ के मशहूर फोटोग्राफर और यात्री स्व. कमल जोशी को बहुत मोहब्बत से याद किया है. उनके इस लेख का अनुवाद भी कल ही ‘अमर उजाला’ में भी छपा था. (Ram Guha Remembers Kamal Joshi) पाठकों की सुविधा के लिए हम उसे इन दोनों अखबारों से साभार लेकर जस का तस यहाँ पेश कर रहे हैं.
बात 1983 की है जब अरविंद केजरीवाल हाफ पैंट पहन कर स्कूल जाते होंगे, मेरे एक मित्र और मैंने एक संगठन बनाया था, जिसका नाम था आप (AAP). इसका पूरा नाम था (द) एसोसियेशन ऑफ़ अस्थमा पेशेंट्स. मेरे सह संस्थापक एक गढ़वाली वैज्ञानिक कमल जोशी थे. और पिथौरागढ़ कस्बे की पहाड़ी पर चढते हुए सांस की तकलीफ होने पर हमें पता चला था कि हमें एक ही तरह की बीमारी है. कमल और मैं इतिहासकार शेखर पाठक के बुलावे पर वहां गए थे, जिन्होंने हिमालय पर केन्द्रित अपनी वार्षिकी ‘पहाड़’ (पीपुल्स एसोसियेशन फॉर हिमालय एरिया रिसर्च) का पहला अंक तैयार किया था. पत्रिका के औपचारिक विमोचन के बाद हमें देहात की ओर सैर के लिए ले जाया गया, जहाँ मैग्नेसाईट खनन ने अपने गहरे निशाँ छोड़ रखे थे. पहाड़ के लम्बे छरहरे और असंभव रूप से हृष्ट-पुष्ट सम्पादक तेजी से आगे बढ़ रहे थे वहीं अस्थमा पीड़ित उनके दो दोस्त उनसे काफी पीछे रह गए थे. (Ram Guha Remembers Kamal Joshi)
कमल जोशी औए मेरे करीब आने की पहली वजह थी उत्तराखंड के पहाड़ों के प्रति हमारा प्रेम; और दूसरी वजह थी, शेखर पाठक के प्रति हमारा अनुराग जो कि इतिहासकार होने के साथ ही ट्रेकर, कैम्पेनर, लेखक, संपादक और वक्ता हैं और जो उत्तराखंड का मूर्त रूप हैं, जिनके बारे में हम दोनों को पता था और हमसे उनसे प्रेम करते थे. लेकिन हम दोनों अस्थमा की पुराणी बीमारी से पीड़ित थे जो कि हमारे अन्तरंग संपर्क की तीसरी वजह बन गयी. कुछ लोगों को भांति-भांति के तम्बाकू वाले पाइप आपस में जोड़ने का काम करते हैं तो कुछ लोगों को सिंगल माल्ट व्हिस्की करीब लाती है. कमल और मुझे जोड़ने में सांस से सम्बंधित दवाएं फोरमोनाइड और सेरोफ्लो और फोरमोनाइड जैसे इन्हेलर की भूमिका थी. हमारी संस्था आप के लिए एक खुशी की बात यह भी थी कि पूरी तरह से स्वस्थ और तंदुरुस्त शेखर पाठक को इसकी सदस्यता से पूरी तरह बाहर रखा गया था.
कमल जोशी कोटद्वार में पैदा हुए थे और वहीं पले-बढ़े जो कि हिमालय के छोर पर स्थित है और जहाँ से पहाडियों का तपते मैदानी इलाके से मिलन होता है. वह कैमिस्ट्री के शानदार छात्र थे और यदि लेबोरेटरी के धुएं से उन्हें सांस की तकलीफ नहीं होती तो वह शोध के क्षेत्र में अपना करियर बना सकते थे. स्नातकोत्तर में उच्च प्रथम श्रेणी की डिग्री के साथ वह अनुबंधित सरकारी सेवा में जा सकते थे लेकिन न तो बंधी-बंधाई दिनचर्या और न ही दिखावे ने उन्हें आकर्षित किया. वह स्वतंत्र लेखक और फोटोग्राफर बन गए और अपने प्यारे पहाड़ों पर घूमने लगे और भौगोलिक परिदृश्य और जीवन को दर्ज करने लगे. अपनी शारीरिक मजबूरियों के बावजूद उन्होंने इच्छाशक्ति के दम पर ऊंचे पहाड़ों की चढ़ाई की, उनके पिठ्ठू में रखी दवाएं और इन्हेलर्स उन्हें हौसला देते रहे.
1983 में ‘पहाड़’ के पहले अंक के प्रकाशन के बाद से इसके 17 अंक आ चुके हैं; इनमें से प्रत्येक सैकड़ों पेजों में है, जिनमें हिमालय की संस्कृति, पारिस्थितिकी, इतिहास, समाज, साहित्य और राजनीति पर मौलिक निबंध शामिल हैं. कमल जोशी इस पत्रिका के विजुअल हिस्से की जिम्मेदारी सम्हालते थे और साथ ही सम्पादन तथा फंड जुटाने जैसे कामों में भी मदद करते थे.
1980 के दशक में कमल जोशी से मेरी अक्सर मुलाकात होती थी और 1990 के दशक में यदाकदा हम मिलते थे. बीमारियों और दुर्बलता के बावजूद उसमें असाधारण किस्म का जोश था. इसके बाद मैं बंगलुरु में बस गया था और वह कोटद्वार में जिससे हमारा संपर्क टूट गया. 2017 में जब उनके निधन की खबर मिली तो मुझे बहुत दुःख हुआ था. जो लोग उन्हें मुझसे बेहतर तरीके से जानते थे और जिन्होंने उनके साथ ज्यादा वक्त गुजारा था, उन्हें उनके जाने से निश्चय ही अधिक दुःख हुआ होगा. सौभाग्य से उन्होंने अपने शोक को ‘कमल जोशी स्मृति’ के रूप में एक सालाना आयोजन के जरिये रचनात्मक रूप दिया.
इसके पहले आयोजन में मैं शामिल नहीं हो सका था. लेकिन सौभाग्य से मुझे उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में इसी महीने की शुरुआत में हुए दूसरे आयोजन में जाने का अवसर मिला. टाउन हॉल में यह कार्यक्रम दिन भर चला, जिसमें वार्ता और विमर्श के साथ ही खेल हुए. सप्ताहांत न होने के बावजूद हॉल पूरा भरा हुआ था. श्रोताओं में विविधता थी जिनमें शिक्षक, विद्यार्थी, नौकरशाह, व्यापारी और डाक्टर इत्यादि शामिल थे. इनमें शेखर पाठक तो थे ही, दूसरे थे प्रोफ़ेसर पुष्पेश पन्त जिन्हें कुछ लोग अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विद्वान् के रूप में जानते हैं तो बाकी लोग उन्हें भारत की पाककला के इतिहास के विशेषज्ञ के तौर पर, लेकिन वह यहाँ अपने मूल रूप में यानी एक ऐसे पहाड़ी के रूप में मौजूद थे जिसको अपने राज्य और वहां के लोगों में खासी दिलचस्पी है. तीसरे थे कमल के छोटे भाई डॉ. अनिल प्रकाश जोशी जिन्होंने पहाड़ों में जल-संरक्षण और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए अनुकरणीय काम किया है. हालांकि कुछ गैर-उत्तराखंडियों ने भी अपने विचार रखे जिनमें जाने माने सिनेमेटोग्राफर अपूरब कुमार बीर शामिल थे जो कि कमल की स्मृति में युवा फोटोग्राफरों की एक प्रतिस्पर्धा का निर्णायक बनने के लिए मुम्बई से आये थे.
जब तक वह जीवित थे, मुझे कमल जोशी को एक एक्टिविस्ट मानने में झिझक होती थी क्योंकि इस शब्द से परिहासरहित होने का भाव पैदा होता है और ऐसी प्रवृत्ति का भान होता है जिसमें आप हर चीज को श्वेत-श्याम नजरिये से देखते हैं, जो कि मेरे मित्र के चरित्र से मेल नहीं खाती थी. और हाँ, अपने मजाक और शरारतों के साथ कमल एक एक्टिविस्ट थे और अपने समाजम से गहरे तक जुड़े हुए थे और उसे अन्याय और तकलीफों से मुक्त कराना चाहते थे. वह कई सामाजिक आन्दोलनों में सक्रिय थे, जिनमें बड़े बांधों और शराब के विरोध में होने वाले आन्दोलन शामिल थे और इन सबसे ऊपर वह उत्तराखंड राज्य के निर्माण के आन्दोलन में सक्रिय थे.
2000 में जब राज्य की स्थापना हुई, कई लोगों की तरह वह भी इसके लिए चुनी गयी राजधानी को लेकर असंतुष्ट थे. उत्तराखंड के एक कोने में बसा देहरादून इस पहाड़ी राज्य की राजधानी के रूप में उपयुक्त नहीं था और कमल चाहते थे कि राजधानी को पहाड़ों में स्थानान्तरित करना चाहिए. इसके लिए गैरसैण नामक गांव की तलाश भी की गयी थी.
मीडिया में राष्ट्रीय नायकों को लेकर जूनून सवार है- मसलन वह प्रधानमंत्री और क्रिकेट टीम के कप्तान के रूप में महामानव चाहता है. भाषाई प्रेस का ध्यान भी फिल्म सितारे जैसे नायकों पर ही केन्द्रित है. कमल जोशी जैसे खामोशी से समाज के लिए काम करने वाले लोग जिन्हें न धन की चाहत है न सत्ता या प्रसिद्धि की, उन पर मीडिया का ध्यान नहीं जाता. यह भी सच है कि वे खुद भी ऐसा नहीं चाहते. फिर भी ऐसे ही स्थानीय नायक हमारे गणतंत्र में निहित लोकतंत्र और स्वतंत्रता की भावना को कहीं अच्छे तरीके से प्रस्तुत करते हैं. उस दिन देहरादून के टाउन हॉल में कमल जोशी की स्मृति को सम्मान देने के लिए मौजूद लोग इसे बखूबी समझते हैं.
देश के सबसे प्रखर बुद्धिजीवियों में गिने जाने वाले राह चन्द्र गुहा एक इतिहासकार और विख्यात लेखक हैं. गढ़वाल की पर्यावरण-चेतना पर लिखी उनकी किताब ‘द अनक्वायट वुड्स’ बहुत चर्चित हुई थी. माधव गाडगिल के साथ लिखी उनकी एक और किताब ‘इकोलोजी एंड इक्विटी’ समूचे देश की पारिस्थिकी को देखने की एक नई दृष्टि देती है. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम परउनकी लिखी किताबें मील का पत्थर बन चुकी हैं. लेखन में हरफनमौला माने जाने वाले राम ने क्रिकेट के इतिहास पर भी अनेक किताबें लिखी हैं.
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यह बेहद दुखद होता है कि अपने बंदे कि पहचान और उसके महत्व का पता हमें दूसरों के द्वारा मिले।