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एक मिसाल है पहाड़ की यह बेटी

मेरे लिए वह एक प्यारी बहन है. मेरी अपनी बैणी. पहली बार उस लड़की से मिलिए तो उसमें आपको एक निहायत भोली और ठेठ पहाड़ी लड़की नज़र आएगी. सादगी से भरी उसकी शुरुआती बातें आपके पहले इम्प्रेशंस से मेल खाएंगी. फिर आप उसकी बनाई फ़िल्में देखिये. उसके बाद वह आपके सामने पहाड़ जितनी मज़बूत और बेहद दिलेर स्त्री में तब्दील हो जाएगी. Pushpa Rawat Filmmaker from Uttarakhand

यह पुष्पा रावत है. हमारे-आपके घरों से निकली एक बिलकुल हम-आप जैसी मध्य-निम्न मध्यवर्ग की साधारण नागरिक. अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया ब्लॉक में उसका पैतृक घर है. पिता बैंक में छोटी सी नौकरी करते हैं. मां गृहिणी. पिताजी गाज़ियाबाद में पोस्टेड थे तो शुरुआती शिक्षा भी वहीं हुई. फिर वहीं के विद्यावती पीजी कॉलेज से उसने दर्शनशास्त्र में एमए किया.

कैमरे के प्रति बचपन से ही उसके भीतर गहरा आकर्षण था. घर पर कैमरा नहीं था सो वह पड़ोसियों से कैमरा उधार लेकर फोटो खींचा करती थी. फिल्म रोल्स के लिए अपनी पॉकेट मानी बचा-बचा कर अपना शौक पूरा करने वाली इस लड़की ने बारहवीं क्लास में दिल्ली में एक फोटोग्राफी वर्कशॉप में हिस्सा क्या लिया उसे उसकी ज़िंदगी का मकसद मिल गया. इसी वर्कशॉप के दौरान उसे मशहूर डॉक्यूमेंट्री निर्मात्री अनुपमा श्रीनिवासन का मार्गदर्शन मिला और कुछ सालों बाद उन्हीं की सहायता और प्रेरणा से उसने अपनी पहली फिल्म बनाई जिसका नाम था ‘निर्णय’.

निर्णय को बनाने का निर्णय तक ले सकना बेहद हिम्मत का काम था. पुष्पा ने अपने पहले प्रेमसंबंध के बिखरने और उससे जुड़े अन्तरंग सामाजिक पहलुओं को बेहद बारीकी से इस फिल्म में दर्ज किया. वह खुद इस फिल्म की नायिका है. वह फिल्म के दौरान अपने माता-पिता, अपने भाई, अपने दोस्तों, अपने प्रेमी, उसकी बहन, उसके माता-पिता और यहां तक कि उसकी होने वाली पत्नी तक से सवाल करती दिखती है,ऐसा क्यों हुआ कि उसके प्रेम की मज़बूत डोर रेशा-रेशा बिखर गई. फिल्म में सारे पात्र असली हैं.

ये पुष्पा के वास्तविक जीवन की कहानी का निर्माण करने वाले वास्तविक पात्र हैं जिनकी अपनी-अपनी लाचारियाँ हैं. फिल्म में कोई खलनायक या खलनायिका नहीं है. अलग अलग चेहरों के माध्यम से साधारण मनुष्यों का जीवन ही इस फिल्म के सारे किरदार निभा रहा होता है. फिल्म का अंत आते-आते आप खुद उसका हिस्सा बन जाते हैं क्योंकि आपने उनमें से किसी न किसी पात्र को स्वयं जिया होता है.

पुष्पा ने जिस संवेदनशीलता के साथ इस बेहद जटिल और मुश्किल विषय के साथ बर्ताव किया है वह उसे हमारे समय की नायिका बना देती है. इस फिल्म को राष्ट्रीय कई और अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखाया गया और पुष्पा के काम को दुनिया भर की सराहना मिली.

उसकी दूसरी फिल्म ‘मोड़’ का कथानक भी उसके अपने आसपास के परिवेश से प्रेरित था. इस बार नशे की तरफ बढ़ रहा उसका सगा बेरोजगार छोटा भाई और उसके बेरोजगार दोस्त और उनका अड्डा यानी पानी की एक टंकी फिल्म के मुख्य किरदार हैं. फिल्म निर्माण की शैली वही. खुद पुष्पा फिल्म में बार-बार नज़र आती है.

पुष्पा की फिल्मों में कुछ कहने की जल्दीबाजी या आग्रह नहीं होता. उसका कैमरा अपने आप अपनी बात कहता जाता है जिसके पीछे उसकी बारीक हिम्मती नज़र और उसका आत्मालाप लगातार एक दूसरे ही स्तर पर दर्शक से धीमा-धीमा डायलॉग करते रहते हैं.

अभी पुष्पा ने बहुत सारे मुकाम हासिल करने हैं. अभी उसके सामने दौड़ने को एक खूब लंबा-चौड़ा मैदान है. हमें उसके लिए खूब सारी दुआ करनी चाहिए और उसकी फिल्मों को देखना चाहिए. उससे बहुत कुछ सीखा भी जा सकता है. Pushpa Rawat Filmmaker from Uttarakhand

पुष्पा और सार्थक फिल्मों के लिए उसका आग्रह एक मिसाल है. सलाम पुष्पा मेरी बहन!

-अशोक पाण्डे

उत्तराखण्ड मूल की फिल्म निर्देशिका पुष्पा रावत का इंटरव्यू

पुष्पा की फिल्मों के लिंक –

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