अशोक पाण्डे

पहाड़ की बेकरियों में बनने वाला फैन पूरे देश को एक बनाता है

भारत में फैन की मूल डिजाइनिंग इस तरह की गयी है कि कांच के नन्हे गिलास के साथ उसका ज्यामितीय व्याकरण सही बैठ सके. उसे तनिक संकरे पैरेलैलोग्राम की आकृति में बनाया जाता है. प्रैक्टिकल बर्ताव की सुविधा के लिहाज से पैरेलैलोग्राम के केंद्र में उसकी अधिकतम चौड़ाई ढाबे के चाय वाले गिलास के व्यास से थोड़ी कम रखी जाती है. (Puff a National Bakery Product)

अंग्रेजों द्वारा ईजाद किये गए पफ़ का भारतीय ग्रामीण संस्करण है फैन. इसे कुछ लोग फेन कहते हैं और हमारे पहाड़ों के दूरस्थ इलाकों में इसे समोसा तक कहा जाता है. इस भारतीय फैन की महान वैज्ञानिक संरचना को बगैर चाय में डुबो कर खाए समझा ही नहीं जा सकता. (Puff a National Bakery Product)

चाय से भरे गिलास में पहली बार प्रवेश कराने पर उसका तकरीबन पांचवां भाग डूबता है. खमीर चढ़े आटे की अपनी महीन मुलायम परतों के बीच वह इतनी चाय सोखता है कि बाहर निकाले जाने पर एक बूँद भी नहीं टपकती. डुबोने, बाहर निकाले जाने और मुंह में डाले जाने के इस वक्फे में गर्म से गर्म चाय भी उसके भीतर स्थापित हो जाने के बाद आपका मुंह नहीं जला सकती. उसकी बाहरी परत का कर्रापन और भीतर की परतों को चाय द्वारा नवाजा गया क्रमिक लुतलुतापन कुल मिला कर सृष्टि के एक अनुपमेय, अजाने स्वाद का सृजन करते हैं. दूसरी बार उसे डुबाने तक चाय उसकी बची हुई लम्बाई के हिसाब से कम हो गयी होती है. इस बार फैन को खाएंगे तो उसकी कर्री और लुतलुती परतों का अनुपात करीब-करीब बराबर हो चुकता है. यह स्वाद पिछले वाले से अलग होता है. अमूमन चार डूबों में फैन और चाय समाप्त हो चुकने की एक स्टेज पहले तक पहुँच जाते हैं. आपको गिलास के पेंदे में बहुत थोड़ी चाय नजर आती है जिसके भीतर पिछली डूबों के दौरान गिरे हुए फैन की बाहरी परतों के टुकड़े अब लुगदी की सूरत में पड़े होते हैं. आपके हाथ में फैन का आख़िरी टुक्का बचा रहता है. इस टुकड़े को सीधे मुंह में डालकर लुगदीयुक्त चाय के साथ उदरस्थ कर लिया जाना चाहिए. शास्त्रोक्त है. (Puff a National Bakery Product)

चाय में फैन को कितनी देर तक डुबो कर रखा जाय इस बारे में विशेषज्ञों के अलग-अलग मत हैं लेकिन ‘प्रक्टिस मेक्स अ मैं परफेक्ट’ अब भी इस विषय पर प्रशिक्षु फैनभक्षियों के लिए सबसे मुफीद सलाह है. हर कोई अपनी तरह से अपने फैन को खाने का सबसे तसल्लीबख्श तरीका सीखने के लिए स्वतंत्र है.

अपने बाशिंदों जैसा ही सरल और गुणी होता है पहाड़ का भोजन

बाज नादान लोग फैन को सूखा सूतने और उसे चाय में न डुबोने पर अड़े रहते हैं. इस गलती का खामियाजा उन्हें फैन के कुल वजन के दशांश की हानि के रूप में भुगतना पड़ता है. यह नुकसान कमीज, स्वेटर, पतलून, फर्श और आत्मा पर बिखरी फैन की परतों के रूप में दृष्टिगोचर होता है. इस अपरिहार्य हानि को घर में फैलाए जाने की सूरत में महिलाओं की गालियां साथ में खाने का अभिशाप फैन के साथ आदिकाल से जुड़ा हुआ है इसलिए लोकमानस में यह विश्वास प्रतिष्ठित है कि फैन को किसी खोखे या गुमटी में ही खाया जाना चाहिए. उन्हें चलाने वालों का धंधा चलता है उस से. औरतों का क्या है? सद्गृहस्थों को सतत हड़काते रहना उनका धर्म है.

अक्सर धुएं से स्लेटी पड़ चुके कांच-प्लास्टिक के बयामों में शोकेस किये जानी वाली इस जादुई शै की शैल्फ लाइफ को लेकर भी विशेषज्ञ अलग-अलग राय रखते हैं. इनकी वैध उम्र एक दिन से लेकर एक सप्ताह या एक माह तक बताई जाती है. बाज उस्ताद चायमेकर इसे एक शताब्दी तक सुरक्षित रखने का हुनर सीख चुके हैं. फॉसिल बन चुके इन पुरा-फैनों को भी खाया जा सकता है अलबत्ता एक फैन को खाने के लिए आपको तीन चाय-चषकों की आवश्यकता होगी. मानव सभ्यता के इतिहास में कोई भी फैन आज तक बर्बाद नहीं गया.

अमीर, नक्शेबाज और नकचढ़े लोग वेजी-पफ, तंदूरी पफ, मोल्डेड पफ, पैटीज, स्टफ्ड चिकन पफ, एग पैटी जैसे फर्जी मनबहलावों में अपना जी लगाकर अपनी बोरियत कम करते रहते हैं लेकिन भारत के ग्रामीण नानबाइयों द्वारा सबसे अधिक मात्रा में रचा जाने वाला भारतीय बना दिया गया यह अंग्रेज व्यंजन आज भी देश को एक बनाता है.

अशोक पाण्डे

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