पॉल क्ली की पेंटिंग
ईश्वर और आदमी की बातचीत
-लीलाधर जगूड़ी
जानते हो यह मूर्ति मेरी है
और कुछ लोग इसे पूजने आ रहे हैं
तुम्हें क्या चाहिए? क्या तुम्हारा भी व्रत है?
नहीं नहीं, यह मूर्ति मेरी है और यह बिक चुकी है
ख़ुद को तो मैं तुमसे भी ज़्यादा जानता हूँ
संयोग से जो पाँचवी योजना में नहीं
वह तुम कैसे दे सकते हो?
जबकि मेरा कोई व्रत नहीं; फिर भी मैं भूखा हूँ
प्रश्न केवल मूर्ति का नहीं यह मेरे घर का भी सवाल है
बताओ कि मैं कहाँ निवास करूँ?
तुम किताबों से उठकर बार-बार यहाँ क्यों चले आते हो
हमने तुम्हें कलैंडरों पर दे दिया है
जाओ, जूते और घड़ियों के ऊपर रहो
आदमियों के ऊपर इस वक़्त ख़तरा है.
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
इन दिनों उत्तराखंड के कुमाऊँ में होली की धूम है. जगह-जगह खड़ी होली और बैठकी…
बात उन दिनों की है, जब महात्मा गांधी जब देश भर में घूमकर और लिखकर…
बचपन की दुनिया इस असल दुनिया से कई गुना खूबसूरत होती है. शायद इसलिए क्योंकि…
पिछली कड़ी : तिवारी मॉडल में पहाड़ की उद्योग नीति और पलायन आजादी के दौर…
यूं तो होली पूरे देश में मनाए जाने वाला एक उमंग पर्व है परन्तु अलग…
दुनिया के अनेक लोक कथाओं में ऐसा जिक्र तो आता है कि धरती जीवित है,…