फोटो: इन्टरनेट से
प्रसिद्ध पीरान कलियर शरीफ 13 वीं शताब्दी के चिश्ती आदेश के सूफी संत साबिर कलियर की दरगाह है. यह हरिद्वार जनपद में रुड़की के निकट गंगा के तट पर स्थित मुसलमानों का पवित्र धार्मिक स्थल है. अलाउद्दीन साबिर कलियरी का जन्म 1196 में मुल्तान जिले के एक नगर में हुआ था. वह बाबा फरीद की बड़ी बहन जमीला खातून के पुत्र थे. पिता की मृत्यु के बाद, उनकी मां 1204 में उन्हें लेकर बाबा फरीद तक पहुंची. बाबा फरीद की बहन ने अलाउद्दीन को उनके पास दे दिया और उनसे लड़के की देखभाल करने के लिए कहा, जिसको बाद में उन्हें अपना शिष्य बनाया. उन्होंने 1253 में कलियार शरीफ में बाबा फरीद द्वारा कलियार शरीफ के रक्षक के रूप में अभिषेक होने के बाद उन्होंने पूरा जीवन कलियर में बिताया. (Piran Kaliyar Uttarakhand)
इस दरगाह को अलाउद्दीन अली अहमद सबीर कलियारी, सरकार सबीर पाक और सबीर कालियारी नाम से भी जाना जाता है. इसे दिल्ली के एक अफगान शासक इब्राहिम लोदी द्वारा बनवाया गया है.
यहां पर भारत ही नहीं विदेशों के श्रद्धालु भी आते हैं. लोग बाबा साबिर की दरगाह पर मन्नत मांगते हैं व चादर चढ़ाते हैं. मुस्लिम ही नहीं हिंदू भी यहाँ के प्रति पूर्ण श्रद्धा भाव रखते हैं. हजरत साबिर साहब के बारे में अनेक चमत्कारिक जनश्रुतियां प्रसिद्ध हैं.
उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास के संदर्भ में इस जगह का ऐतिहासिक महत्व भी है. माना जाता है कि 1398 में जब तैमूर लंग दिल्ली को लूटने के बाद मेरठ से हरिद्वार की ओर अपनी विशाल सेना के साथ बढ़ रहा था तो यहां पर कत्यूरी शासक ब्रह्मदेव ने उसका रास्ता रोका दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ था जिसमें साबिर साहब सहित इस्लाम के 70 पीर तथा 72 वली मारे गए थे.
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