अहं विज्ञानाविज्ञाने. मैं विज्ञान और अविज्ञान रूपा हूँ. जानने योग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी में ही हूँ.
अहम् पंचभूतान्यपंचभूतानि. यह सारा दृश्य जगत मैं ही हूँ.
वेद और अवेद मैं हूँ. विद्या और अविद्या भी मैं ,प्रकृति और उससे भिन्न भी मैं. ऊपर -नीचे , अगल -बगल भी मैं ही हूँ . मैं रुद्रों और वसुओं के रूप में संचार करती हूँ
मैं आदित्यों और विश्वेदेवों के रूप में फिरा करती हूँ
त्रैलोक्य को आक्रांत करने के लिए विष्णु , ब्रह्मदेव और प्रजापति को मैं ही धारण करती हूँ. मेरा स्थान आत्मस्वरूप को धारण करने वाली बुद्धि में है. देवी के महामाया स्वरुप को जान देवों ने प्रार्थना की.
नमो दैव्ये महादेव्यै शिवायै सततः नमः
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम
असुरों का नाश करने वाली देवि ,तुम्हें नमस्कार है.
हम महालक्ष्मी को जानते हैं और उस सर्वशक्तिरूपिणी का ही ध्यान करते हैं. वह देवी हमें ज्ञान-ध्यान में प्रवृत करें. हे महाकाली-महालक्ष्मी -महासरस्वती-स्वरूपिणी चण्डिके तुम्हें प्रणाम. अविद्या से मुझे मुक्त करो.
हम मन्त्रों के मुकुट मणि पंचदशी आदि श्रीविद्या मंत्र से आपका स्तवन करते हैं
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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