फोटो: बेला नेगी
खेल के मैदान में आजकल भारत के कई खिलाड़ी कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं. पढाई के साथ खेलकूद को भी प्रोत्साहन मिल रहा है और हमारे समय की कहावत- पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब, पूरी तरह गलत साबित हो चुकी है. हम जिस परिवेश से आये वहां पर मां बाप सोचते थे- बेटा पढ लिखकर अच्छे नम्बरों से पास हो जाय. सो हमें खेल के प्रति हतोत्साहित ही किया जाता था.
(Pahadi Games of Uttarakhand)
आज की तरह के साधन भी नही थे और ये साधनविहीन होना मुझे लगता है कि तब के बच्चों के लिए एक वरदान ही था. हम खुद कई बार अपने खेल ईजाद कर लेते थे. खेलने के चक्कर में डांट भी खाते थे पर फिर भी खेल ही लेते थे. जब हम पांच से सात-आठ साल के रहे होंगे तब हमें घर से दूर खेलने तो जाने ही नहीं दिया जाता था. हम ठेठ गांव के बच्चे थे आपस के अनुभवों के आधार पर और कुछ सुनी हुई बातों से खेल अपने लिए इजाद करते थे.
हमारा खेल का मैदान गोठमाव, गोठ, मकान की कर्यैडी (मकान का पिछला हिस्सा) होते थे ताकि घर वालों की रोकटोक कम हो और दो चार बच्चे इकठ्ठे होकर तय करते कि आज क्या खेल करेंगे. लगभग बदल-बदल कर खेल होते जिनमें घर बनाने का खेल, गाड़ी चलाने का खेल दुकान दुकान खेल प्रमुख थे. घर के खेल में एक ईजा बनती थी, एक पापा, कोई बच्चा बना कोई पति पत्नी ये उस दिन आये खेलने वाले बच्चों की सख्या पर निर्भर था. कभी हलिया बनकर हल जोतते कभी ओड़ बनकर चिनाई करते. मतलब आसपास जो देखा वही बन गये. कभी आपस में किन्हीं दो को बर ब्योली बनाकर शादी का खेल करते कभी गांव के बड़ों को देखकर भूत पूजा या गोलज्यू की पूजा का खेल खेला जाता.
आसपास की जो घटना देखी वो अगले दिन हमारे खेल बन जाते. किसी के यहां पौण आया तो हमारे खेल में भी पौंण आता. किसी के बच्चा हुआ तो हम भी नामकरण का खेल करते. कभी मेले-ठेले देखकर आये तो दूसरे दिन कौतिक का खेल करने लगते. दुकान लगाते तरह-तरह के पत्थरों आदि से चीजे बनाकर बेचते. कच्चे सफेद पत्थरों को पीसकर आटा या नमक बनाते, छोटे डासी पत्थरों से मिसरी बनाते, मिट्टी गूथकर गुड की भेली बन जाती और रुपये पैसे होते आसपास के पेड़ों के पत्ते या कागज के टुकड़े. पत्तों का छोटा-बड़ा साईज विभिन्न मूल्यवर्ग के नोट बनते थे. हरे पत्थरों को तरासकर उसके सिक्के बनाते थे. जिस दिन घर-घर खेलते उस दिन टूटे-फूटे टीन के डब्बों से बर्तन बनाकर उन पर खाना पकाने का खेल होता था.
आसपास के कस्बों या रोड पर जाकर गाड़ी देखी तो गाड़ी का खेल करने लगे. जमीन पर रोड बनाते, पत्थर या पुराने ज्यामिति बक्से की गाड़ी दौड़ाते. भगाव के सीटों से पुल बनाते और सड़क के किनारो के टेलीफोन के तार बनाते गर्जिगान की बेल से. गाड़ी हमारी लिए कौतूहल थी. उनसे हमारा परिचय धीरे-धीरे हुआ, पहले दूर से देखी फिर नजदीक से फिर कभी बैठे तो जितनी जानकारी जुटती जाती गाड़ी के खेल का विकास हम अपने स्तर पर करते गये. या यूं कहिये उम्र धीरे-धीरे बढती रही तो हमारे गाड़ी के खेल बदलते रहे या विकसित होते रहे.
पहला स्तर तो मैं बता चुका. उसके बाद हम गोठ में कनस्तर पुराने दरवाजे तखत आदि जमा कर गाड़ी बनाते उसकी सीटें बनाते. ये गाड़ी अपनी जगह ही रहती ड्राइवर मुंह से खुर खुर खुर खुर्र खुर्र कर गाड़ी चलाता. एक दो मिनट बाद कन्डक्टर बना बच्चा आवाज लगाता. आओ बिजयपुर वाले उतरो फिर दिल्ली वाले उतरो कहां जाना है. लखनऊ… ये जगहें हमने सिर्फ सुनी थी कौन कहां है पता नहीं. लेकिन हमारी गाड़ी हर जगह पहुंचती थी. बच्चों की कल्पना ठहरी.
(Pahadi Games of Uttarakhand)
फिर कुछ बड़े हुए तो डाल के कुनव (डलिया के उपर का गोल लकडी का छल्ला) या कुंज की बेल से गाड़ी का स्टेयरिंग बनाते जिसे हम गाड़ी का हेन्डिल कहते. उस पर ईजा की पुरानी धोती का किनारा लपेटकर सजाते उसे हाथ में घुमाते हुए गांव की पगडंडियों पर दौड़ाते हुए मुह से ही हौरन बजाते और मुंह से ही गाड़ी की आवाज करते. एक जगह स्टेशन बनाते, वहां एक बच्चा आलू चने की दुकान लगाता, एक बच्चा केमू का टिकट क्लर्क बनकर टिकट काटता. कभी आपस में टकराकर एक्सीडेन्ट भी करते इसके लिए सहमति बनती- तू तैलि बटी आये, मी मलि बटी उल एक्सीडैन्ट करनू… जोरैकि नै करिये हां.
इसके अलावा हमने जब स्कूल जाना शुरू किया तो चोर-पुलिस ( आईस पाईस ), ऊंच-नीच, रन ( पत्थर लगाकर कपड़े की गेंद से मारने वाला) गुल्ली-डन्डा खेलना क्रिकेट खेलना शुरू किया. क्रिकेट के लिए बांज का बैट और कपड़े की गेंद होती. स्टम्प तो ढूंग पाथर के ही होते. नियम तो पहाड़ी क्रिकेट के आपको पता ही होंगे. जो जोर की शौट मारेगा उसे नहीं खिलाएंगे, जो बौल भ्योउन घुर्याऐगा वही लाऐगा, झुताणी बौल मारने पर रन नहीं भाग सकते, जिसका बैट उसकी बैटिंग पहले, अम्पायर को आउट देने के बाद विद्या कसम खानी जरूरी, विद्या कसम भी गले की नस पकड़कर खानी जरूरी थी. जिस टीम में एक खिलाड़ी कम हो तो उस टीम को पिड्डू देने का नियम था.
(Pahadi Games of Uttarakhand)
इन्डोर अन्य खेल में पलदाणि, अड्डू कुंणी (लूडो टाइप आडू की गुठली फोड़कर), बाग बकरी, हरा समंदर गोपी चन्दर आदि खेल थे. इन सभी खेलों को लड़के-लड़कियां लगभग मिलकर खेलते थे. क्रिकेट छोडकर. हमारे जैसे कुछ बच्चे अन्ठी, घोट (रीठे की गोलियां) भी खेलते. इनको खेलते पकड़े जाने पर बहुत मार भी पड़ती क्योंकि ये घुच्ची खेल की प्राइमरी पआठशाला थे.
घुच्ची के बाद जोड़ पत्ती से शुरुआत होकर दहला पकड़ सीखा जाता जो आगे जाकर ताश के खेलों को सिखाने में सहायता करते इसलिए अन्ठी और घोट खेलने नहीं देते लेकिन कुछ प्रतिभावान बच्चे इस रास्ते पर चल ही पड़ते. कुछ क्यों लगभग सभी. दहल पकड़ तो पहाड़ के कुछ बेले लोगों का राष्ट्रीय खेल था जैसे हम बच्चों का गाड़ी का खेल.
(Pahadi Games of Uttarakhand)
वर्तमान में हरिद्वार में रहने वाले विनोद पन्त ,मूल रूप से खंतोली गांव के रहने वाले हैं. विनोद पन्त उन चुनिन्दा लेखकों में हैं जो आज भी कुमाऊनी भाषा में निरंतर लिख रहे हैं. उनकी कवितायें और व्यंग्य पाठकों द्वारा खूब पसंद किये जाते हैं. हमें आशा है की उनकी रचनाएं हम नियमित छाप सकेंगे.
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