कैसे पुलिसवाले हो यार

‘सर’ कांस्टेबल राजेश ने एस ओ साब से धीरे से कान में कहा ‘वो दोनों भी तैयार नहीं हुए, भाग गए’ बड़े अधिकारी मौके पर थे इसलिए उनसे जबरदस्ती भी नहीं की जा सकी.

वो एक किन्नर की लाश थी. उसी के तबलची ने हत्या करके लाश घर के पीछे टीन शेड में गाड़ दी थी. पूरे गहने, पैसे लेकर भाग गया था.

हत्या के कई दिन हो चुके थे. पूरी तरह से गल चुकी थी लाश. एक तेज़ भभका सा उठता था वहां से. आज पता चल रहा था कि सड़ांध क्या होती है. कई पैकेट अगरबत्ती मंगाई गई थी. पूरा एक पैकेट एक बार में जला कर नाक के पास रखकर ही गड्ढे के पास जाया जा सकता था.

कोई तैयार नहीं था. मरने वाले को जानने वालों को, कई मजदूरों को, जमादारों को बुलाया गया. मौके पर आते, गड्ढे में लाश देखते और नाक दबाते वापस चले जाते. गड्ढा खोदने में ज़रूर दो मज़दूरों ने मदद की थी. लेकिन लाश दिखने-दिखने तक वो भी चुपचाप चल दिए.

थानेदार साहब ने अपने साथियों की तरफ देखा. आँखों में आदेश नहीं था. राजेश ने इसरार की तरफ देखा इसरार ने बाबा की तरफ. तीनों सिपाहियों ने एक ठंडी सांस ली और

बहुत सम्भाल कर गड्ढे से बाहर लाना पड़ा था. बुरी तरह गल गयी थी लाश. एस आई मठपाल ने पंचनामा लिखना शुरू किया. दाहिना हाथ पूरा गला हुआ. बाएं पैर की चार उँगलियाँ और घुटने के पास का भाग नहीं है, पेट और छाती के पास का भाग पूरा काला पड़ चुका है, नाक, कान, मुंह के भाग पर कीड़े. बाबा रूमाल से अपना मुंह बांधे लाश को उलट-पलट रहा था. लाश छूने लायक नहीं थी. छूना क्या उसके पास खड़ा होना ही मुश्किल था. कोई बावला ही होगा जो ऐसा गन्दा काम कर पाएगा.

आस-पास के, मुहल्ले वाले, गम्भीर, तमाशबीन बहुत से लोग थे. लोग आते दस कदम दूर से लाश को देखते, सड़ी हुई लाश को उलटने पलटने से भभका सा उठता, उबकाई आ जाती फिर गली में थूकते हुए लौट जाते थे.

सफ़ेद कपड़े में सील कर दी गई लाश. पंचों के साइन हो गए. मोर्चरी ले जाने के लिए लोडर भी बुला लिया गया.

‘बाबा भाई अचानक कहाँ चले गए’ राजेश ने पूछा.

‘पीछे’ इसरार ने मुस्कुराते हुए कहा

टीन शेड के पीछे अहाते से घों घों की अजीब आवाज़ आने लगी थी. राजेश ने वहां से आकर बताया कि बाबा को उल्टी हो रही थी. ‘बहुत कच्चा मन है सर उसका’

‘कैसे पुलिसवाले हो यार…’ कप्तान ने जाकर बाबा की पीठ सहलाते हुए मुस्कुरा कर कहा. उनकी आँखों में आश्वस्ति थी. सैल्यूट हमेशा हाथों से ही नहीं दिया जाता.

‘कुछ नहीं सर वो ज़रा… कल से फीवर… सर मैं लोडर में जाता हूँ’ मुंह धोते हुए बाबा ने जवाब दिया. उसकी आँखों में अभिभूति थी. शुक्रिया हमेशा शब्दों में नहीं कहा जाता.

शुक्रिया? ये जो बावले से लोग हैं… इनका? नहीं बनता ना?

मत कहिये शुक्रिया. इन्हें आते जाते रस्ते में कहीं देखकर सम्मान में खड़े मत होइए, सैल्यूट मत कीजिये. ना !

बेशक़ ये उस क़ाबिल नहीं होंगे. लेकिन बस इतना कि… मुंह पलटकर ‘ये साले पुलिसवाले’ कहकर थूकने से पहले…

मुझे मालूम है तुम पत्थर उछालोगे
मैं शज़र हूँ मुझे फल ही गिराने होंगे

अमित श्रीवास्तवउत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं.  6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता) और पहला दखल (संस्मरण) 

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