शतरंज का पहला हिन्दुस्तानी खलीफ़ा

शतरंज का नाम लेते ही किसी भी भारतीय के मन में स्वाभाविक रूप से विश्व चैम्पियन विश्वनाथन आनन्द की तस्वीर उभरती है. लेकिन 1930 के आसपास एक भारतीय शतरंज खिलाड़ी दुनिया भर के चैम्पियनों को हरा चुका था.

1905 में पंजाब के मिठ्ठी गांव में जन्मे मलिक मीर सुल्तान ख़ान सर उमर हयात ख़ान नामक एक नवाब साहब के नौकर थे. नवाब साहब 1929 में इंग्लैण्ड गये तो अपने साथ सुल्तान ख़ान को भी ले गये. भारतीय शैली की शतरंज में पारंगत इस कारिन्दे ने जल्दी ही यूरोपीय पद्धति की शतरंज की बारीकियां सीख ली और अगले तीन चार सालों तक वहां रहते हुए तमाम अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया. मीर सुल्तान ख़ान ने इस दौरान 1929, 1932 और 1933 की ब्रिटिश चैम्पियनशिप जीतने के साथ साथ प्राग और फ़ोकस्टोन में खेले गए तीन शतरंज ओलम्पियाडों में इंग्लैण्ड का प्रतिनिधित्व किया. विश्व चैम्पियन क्यूबाई खिलाड़ी होसे कापाब्लांका के साथ उनका एक मुकाबला अब एक क्लासिक का दर्ज़ा रखता है. इस में कापाब्लांका को धूल चटा देने वाले सुल्तान ख़ान की रेटिंग 2550 की थी, जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि वे एशिया के पहले ग्रैण्डमास्टर थे.

पढ़ना लिखना नहीं आता था इस चैम्पियन खिलाड़ी को और अंग्रेज़ आलोचक इस बात से हैरान हो जाया करते थे कि बिना शतरंज की कोई भी किताब पढ़े, सूट के साथ पगड़ी पहने, भावहीन चेहरे वाला कोई भी इतना बढ़िया कैसे खेल सकता है. ब्रिटिश शतरंज खिलाड़ी और आलोचक रूबेन फ़ाइन ने एक विडम्बनापूर्ण घटना का ज़िक्र किया है.

सुल्तान ख़ान के चैम्पियन बनने की खु़शी में नवाब साहब ने चुनिन्दा लोगों को एक दावत में बुलाया. सारे मेहमान इस उम्मीद में थे कि खाने की मेज़ का मुख्य स्थान चैम्पियन के लिये आरक्षित होगा, जैसी कि परम्परा होती है. यह देखकर उन्हें सदमा लगा कि मीर सुल्तान एक साधारण चाकर की पोशाक पहने बाकी नौकरों के साथ मेहमानों को खाना परोसने का काम कर रहे थे. फ़ाइन ने लिखा: “हम बहुत अटपटा महसूस कर रहे थे क्योंकि एक ग्रैण्डमास्टर चैम्पियन जिसकी शान में हमें दावत पर बुलाया गया था, अपनी सामाजिक स्थिति के कारण हमें वेटर की तरह खाना परोसने को विवश था.”

नवाब साहब के हिन्दुस्तान लौटने के साथ ही मीर सुल्तान ख़ान का शतरंज कैरियर समाप्त हो गया, 1950 के आसपास यूरोप में अफ़वाहें उड़ीं कि वे दक्षिण अफ़्रीका में ऑपेरा गायक बन गये हैं. यह चण्डूखाने की गप्प भर थी क्योंकि सुल्तान खान वापस लौटने के बाद नवाब साहब द्वारा बांधी हुई पेंशन पर, पंजाब के सरगोधा में, हुक्का गुड़गुड़ाते , जैसे-तैसे ग़रीबी-किसानी में जीवन बिताते हुए 1966 में अल्लाह के प्यारे हो गये. नवाब साहब का काफ़ी पहले 1941 में देहान्त हो चुका था.

मशहूर शतरंज खिलाड़ी और लेखक आर. एन. कोल सुल्तान ख़ान को जीनियस घोषित करते हुए महान पॉल मरफ़ी के समकक्ष आंकते हैं. मरफ़ी ने 1857 से 1859 तक कुल तीन साल शतरंज खेला और इस खेल के इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में गिने जाते हैं.

शतरंज पर किताबें लिखने वाले जर्मन लेखक उलरिक जीलमान ने अपनी तीसरी किताब ‘द इन्डियन चेसमास्टर’ में मलिक मीर सुल्तान खान के दिलचस्प जीवन को बहुत सलीके से दर्ज किया है.

एक और दिलचस्प बात बताया जाना यहाँ जरूरी लगता है. सर उमर हयात के नौकर-चाकरों के दल में फ़ातिमा नाम की एक महिला परिचारिका भी इंग्लैण्ड गई थी. फ़ातिमा ने महिलाओं की ब्रिटिश शतरंज प्रतियोगिता में चैम्पियनशिप हासिल की थी.

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  • सुल्तान मीर शतरंज के नैसर्गिक खिलाड़ी थे । अफसोस प्रतिभा के साथ न्याय नहीं हुआ ।

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