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बंदूक की गोली मानी बंदूक की गोली हो – जोहार के मानी कम्पासी का लोकगीत

तिब्बत का पहला ऐतिहासिक सर्वेक्षण करने वाले विख्यात अन्वेषक पंडित नैनसिंह रावत (देखें: पंडित नैनसिंह रावत : घुमन्तू चरवाहे से महापंडित तक) के चचेरे बड़े भाई पंडित मान सिंह रावत मुनस्यारी की जोहार घाटी के मिलम गाँव के मूल निवासी थे.

1855 में जर्मनी के विश्वविख्यात भूगोलशास्त्री बैरन हम्बोल्ट ने अडोल्फ़ और रॉबर्ट श्लागिनवाईट नामक दो प्रतिभाशाली भाइयों को भारत भेजा था ताकि वे सर्वे ऑफ़ इण्डिया की सहायता से तिब्बत का भौगोलिक सर्वेक्षण कर सकने का कोई रास्ता निकाल सकें. उस समय तक तिब्बत सारे संसार के लिए अदेखी-अनजानी पहेली जैसा था.अनेक संयोगों के चलते श्लागिनवाईट भाइयों ने अपने शुरुआती शोधकार्य के लिए नैनसिंह रावत और उनके दो चचेरे भाइयों की सेवाएं लीं. दुर्गम हिमालय की वैज्ञानिक मैपिंग करने का यह अपनी तरह का पहला प्रोजेक्ट था. मान सिंह रावत इन दो भाइयों में से एक थे. दोल्पा पांगती दूसरे थे.

श्लागिनवाईट भाइयों के अभियान से जुड़ने से पहले मान सिंह रावत ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सरकारी मुलाजिम थे और 1850 के दशक में कुमाऊं के कुल 67 गाँवों के पटवारी थे. अडोल्फ़ और रॉबर्ट श्लागिनवाईट को मान सिंह रावत के नाम की सिफारिश उनके एक चाचा देव सिंह रावत ने की थी. वर्ष 1855 से 1857 तक मान सिंह इस अति-साहसिक अभियान के हिस्सेदार रहे थे.

मध्य एशिया और तिब्बत के मानचित्रीकरण में इन तीन जोहारी बंधुओं की उपलब्धियां अद्वितीय हैं. हालांकि मान सिंह रावत को अपने भाई नैन सिंह रावत जितनी ख्याति नहीं मिली, भौगोलिक अन्वेषण व सर्वेक्षण के क्षेत्र में उनकी भूमिका को किसी भी तरह कम करके नहीं आंका जा सकता.

माना जाता है की मान सिंह रावत ने जोहार घाटी का पहला इतिहास लिपिबद्ध किया था अलबत्ता उसकी मूल पांडुलिपि अब भी अप्राप्य है.

द ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे में उनके योगदान के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पेशकार का पद प्रस्तुत किया. जर्मन वैज्ञानिकों के साथ अपने अभियान के दौरान मान सिंह रावत ने चुम्बकीय कुतुबनुमा (मैग्नेटिक कम्पास) के प्रयोग में ऐसी जबरदस्त महारत हासिल कर ली थी कि उन्हें मानी कम्पासी के नाम से जाना जाने लगा. मानी कम्पासी का नाम पूरे जोहार में ऐसा फैला कि वे वहां के लोकगीतों तक का हिस्सा बन गए.

पंडित मान सिंह रावत उर्फ़ मानी कम्पासी के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण यात्रा पर बना, जोहार के रोजमर्रा के जीवन, दुर्गम यात्राओं में आने वाली परेशानियों और अनंत नोस्टाल्जिया के सूक्ष्म विवरणों से भरपूर एक लोकगीत बहुत प्रचलित है. गीत के बोल इस प्रकार हैं:

चूक की चुकम मानी, चूक की चुकम हो
तली बटी येगे मानी ठुल सैप हुकम हो
ओ मानी कम्पासी मानी, ठुल सैप हुकम हो.

बाजी जालो, सांक मानी, बाजी जालो सांक हो
म्हैण-म्हैण जोलिया औंछ, दिन-दिन को डांक हो

जतिया की कानी मानी, जतिया की कानी हो
मरण-वचन भुली, मैल लद्दाख जानी हो

काट छ तोस्यार मानी, काट छ तोस्यार हो
सवारा छन शतुर भुली, भल ह्वये होस्यार हो

दुदी मां क गाज दाज्यू, दुदी मां क गाज हो
तुमि जांछा लदाख दाज्यू, को चलाल राज हो

घोड़ी क बखरिया भुला, घोड़ी क बखरिया हो
तू करे पटवारी चार, नैनसिंग ढकरिया हो
ओ भुला गुलाब सिंग नैनसिंग ढकरिया हो

घिनोरी क बीट मानी, घिनोरी क बीट हो
नैनसिंग ढाकर बोकलो, किशन पंडित हो

भरी हाली गीमा मानी, भरी हाली गीमा गीमा हो
भल घर ब्यवै दिए मेरी चेली हीमा हो

ब्याला भरी घिया मानी, ब्याला भरी घिया हो
धौला घोड़ा, ढोकला जुबू, भुली कैं सेंती दिया हो
सम्फू रे नित्वाल भुला, भुली कैं सेंती दिया हो

सांटी माँ की सोलि मानी, सांटी माँ की सोलि हो
तू जान्छे लदाख मानी मैं कसी कै रोंली हो

बंदूक की गोली मानी बंदूक की गोली हो
यो बुड़ी बुर्फाली बुड़ी, ढुल-ढुल रोली हो

गिरगो क ल्यांगुड़ खालै, तीजम को ग्वाया हो
जतुक बाटुली लागलो, उत्तुक झन रोया हो
मेरी बुड़ी बुर्फाली धाना उत्तुक झन रोया हो

कुटेली को बीन मानी कुटेली को बीन हो
जोशी ज्यू मैं लदाख जांछूं करी दिया दीन हो

सिकुवा ढागन मानी सिकुवा ढागन हो
लदाख जाना को दीं चार पैटा फागुन हो

फांची को कामल मानी फांची को कामल हो
मैं जांछूं लदाख मानी, पांजी दे सामल हो

मार छ मल्याऊ मानी मार छ मल्याऊ हो
भोल में लदाख जांछूं पकै दे कल्याऊ हो
मेरी बुड़ी बुर्फाली धाना पकै दे कल्याऊ हो

फिंची क जुलुक मानी फिंची क जुलुक हो
कसी कै तू जाले मानी, मुन कटो मुलुक हो

भुटी हालो बड़ मानी भुटी हालो बड़ हो
तू जांछै लदाख मानी कब औलै घर हो

बाड़ा बोयो मेथी मानी बाड़ा बोयो मेथी हो
राम ज्यू की दया होलो लौटी ओंलो यती हो

बाटी हालो कुची मानी बाटी हालो कुची हो
सात ज्वाड़ा पौल फाटी लदाख नी पूजी हो
ओ मानी कम्पासी मानी लदाख नी पूजी हो

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Kafal Tree

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  • काफल ट्री का धन्यवाद एक सुझाव है कि यह उद्धरण कहां से लिया गया है कृपया इसको भी लिखा जाता तो ये अपने आप में पूर्ण हो जाता और उस लेखक की मेहनत को भी सम्मान मिलेगा। जैसे यह उद्धरण डॉ शेर सिंह पांगती जी की पुस्तक जोहार के स्वर से लिया गया लगता है।

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