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पहाड़ियों के लिए माल्टा कोई देश नहीं है

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देश और दुनिया के लोग जब माल्टा शब्द सुनते हैं तो उनके दिलो-दिमाग में समुद्र की लहरे और उससे घिरे एक देश का चित्र बनाता है. हरियाणा में सस्ता नशा करने वालों के दिमाग में ‘माल्टा’ शब्द सुनकर देशी दारू की महक कौंध जाती है पर जब एक पहाड़ी ‘माल्टा’ शब्द सुनता है तो उसके मुंह के भीतर अलग-अलग कोनों से पानी निकलने लगता है. उसे और छेड़ते हुए इस शब्द पर चर्चा जारी रखी जाये तो उसके चेहरे पर गुनगुनी धुप का सुकून खूब नज़र आयेगा है. गुनगुनी धुप और माल्टे के संबंध का यह खट्टा-मीठा रहस्य एक पहाड़ी खूब जानता है पर इस रहस्य को बता पाना या उस पर लिख पाना शायद किसी के लिए ही संभव हो.
(Malta and Pahari)

पहाड़ियों के लिए माल्टा कोई देश नहीं है उनके लिए तो इस शब्द का एक मात्र अर्थ है नारंगी रंग का रसदार फल. हिमालय ने पहाड़ियों को खूब उपहार दिए, माल्टा उन्हीं उपहारों में एक उपहार है. खुशबूदार एंटी ऑक्सीडेंट और शक्तिवर्धक माल्टा नींबू प्रजाति का फल है. सिट्रस सिनानसिस वैज्ञानिक नाम वाले इस फल में 53.2 मि.ग्रा. विटामिन सी, 11.75 ग्राम कार्बोहाइडेट, 0.12 ग्राम वसा, 47.05 किलो कैलोरी ऊर्जा, 0.94 ग्राम प्रोटीन, 0.12 ग्राम फाइबर, 0.1 मिलीग्राम आयरन, 14 मिलीग्राम फास्फोरस, 10 मिलीग्राम मैग्नीशियम, 181 मिलीग्राम पोटेशियम प्रति 100 ग्राम तक पाये जाते है.
(Malta and Pahari)

माल्टे और संतरे का सीजन एक साथ होने के कारण लम्बे समय तक बाज़ार में संतरा, माल्टे को हमेशा चुनौती देता रहा. हालांकि बख़त बदला और बाज़ार में कीनू नामक फल आया जिसने माल्टे को चुनौती देने वाले संतरे के सामने कड़ी चुनौती रख दी. बाज़ार के इस दख़ल के बावजूद यह आम राय है कि पहाड़ में फलों का राजा माल्टा ही है.

पहाड़ियों के इस सबसे पसंदीदा फल को हाल ही में जीआई टैग भी मिल चुका है. बाजार में 80 से 90 रूपये प्रति किलो बिकने वाले इस फल के लिए सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य 10 रूपये है. अपने नायाब स्वाद और पौष्टिकता के बावजूद माल्टे का उत्पादन करने वाले काश्तकारों का हाल किसी से छिपा नहीं है.
(Malta and Pahari)

–-काफल ट्री डेस्क

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  • माल्टा एक पहाड़ी फल है जो गांव-गांव में पाया जाता है। किनू के बाजार में आने से माल्टा के साख बहुत कम हुई है दूसरी ओर बंदरों तथा लंगूरों की बहु संख्या मै माल्टा पेड़ो पर हमला करने से काश्तकारों को बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है कई किशान तो अब माल्टा के पेड़ की।देख रेख भी नहीं करते हैं इसलिए माल्टा जकी।पैदावार और उसके खट्टे पन पर विपरीत असर पड़ा है।
    टिप्पणीकार खीम सिंह रावत हल्द्वानी से

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