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उत्तराखण्ड का एक गाँव मलारी: जहाँ पांडव धनुर्विद्या सीखा करते थे

गढ़वाल मंडल के चमोली जिले की नीति घाटी में एक गाँव है मलारी. 2001 की जनगणना के मुताबिक मलारी की जनसंख्या 649 थी, इसमें 318 पुरुष और 331 महिलाएं शामिल हैं. गाँव के लोग शीतकालीन प्रवास पर 6 महीने के लिए निचले इलाके के गांवों की तरफ आ जाते हैं.

मलारी पौराणिक महत्त्व का गाँव है. मलारी भारत में तिब्बत सीमा से लगे सीमान्त गांवों में से एक है. जोशीमठ से नीति-माणा की तरफ जाने वाला एक खूबसूरत पहाड़ी रास्ता मलारी ले जाता है, जोशीमठ से मलारी की दूरी 60 किमी है.

इस रास्ते पर जोशीमठ से आगे तपोवन के गर्म पानी के कुंड मिलते हैं. और आगे बढ़ने पर सलधार की गरम जलधारा उसके ऊपर भविष्यबदरी. और आगे चलने पर रेणी गाँव में धौलीगंगा व ऋषिगंगा का संगम दिखाई देता है. रेणी गाँव को चिपको आन्दोलन की शुरुआत और गौर देवी के कारण आज दुनिया भर में जाना जाता है. फिर लाता देवी में उत्तराखण्ड की इष्ट नंदा देवी का भव्य मंदिर मिलता है. इसके आगे धौलीगंगा के चट्टानों से टकराने से पैदा हुए भापकणों से बना जलकुंड दिखाई देता है.

मलारी पहुँचते ही देवदार और भोजपत्र के घने जंगलों के बीच हिडिम्बा देवी का मंदिर है, हिडिम्बा को स्थानीय लोग हिरमणी भी कहते हैं. द्रोणागिरी मलारी का एक अन्य आकर्षण है. कहा जाता है कि हनुमान संजीवनी बूटी द्रोणागिरी पर्वत से ही लेकर गए थे.

समतल चौड़ी पहाड़ी पर बसे मलारी में एक 5000 साल पुराना अखरोट का पेड़ है. कहते हैं कि इस पेड़ से चन्दन की सी महक आती है. किवदंती है कि पांडव इसी पेड़ के नीचे धनुर्विद्या का अभ्यास किया करते थे.

यहाँ पर हुई खुदाई में पुरातात्विक महत्त्व के पत्थर से बने शवगृह मिले हैं, इन शवों का पुरातात्विक व ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्त्व है. इसके अलावा यहाँ मिट्टी के बर्तन व एक घोड़े का कंकाल भी मिला हैं. इससे निष्कर्ष निकाला जाता है कि प्राचीन काल में यहाँ पर पशुपालक समाज रहा करता होगा. शायद मरने वाले के साथ उसका घोड़ा भी दफना दिया जाता होगा. इतिहासकार इन अवशेषों को चौथी शताब्दी (ई.पू.) से दूसरी शताब्दी (ई.पू.) तक का बताते हैं. यहाँ समुद्री जीवों के भी अवशेष मिले हैं, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि कभी यहाँ सागर रहा होगा. यहाँ मिले सोने के मुखौटे से यह भी अनुमान लगाया जाता है कि यहाँ मार्छा जनजाति के लोगों का भी आवास रहा होगा.

मलारी की मिट्टी पूरे गढ़वाल में बहुत पवित्र मानी जाती है. सभी धार्मिक अनुष्ठानों व यज्ञ के लिए इसे विशेष तौर पर मंगवाया जाता है. विशेष आयोजनों के लिए मलारी की मिट्टी सहेज कर रखी जाती है.

मलारी गाँव के ठीक ऊपर बने जलकुंड को परी कुंड कहा जाता है. मान्यता है कि कभी इसमें परियां नहाया करती थीं. विशेष मौकों, ख़ास तौर पर रक्षा बंधन के मौके पर यहाँ लोग स्नान किया करते हैं.

इस कुंड में बकरियों के सींग पड़े हुए हैं. मान्यता है कि जब कोई बकरी चुराकर या जंगली जानवर द्वारा मार दी जाती है तब उसके सींग स्वतः ही यहाँ पहुँच जाते हैं. जब तक गायब बकरी के सींग इस कुंड में नहीं आ जाते तन तक उसे जिन्दा ही माना जाता है.

सांस्कृतिक रूप से समृद्ध मलारी का पांडवनृत्य उत्तराखण्ड के लोकनृत्यों में ख़ास दर्जा रखता है.

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Sudhir Kumar

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