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काले कव्वा : एक दिन की बादशाहत

मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले ‘घुघते’ आदि पकवान बनाकर दूसरी सुबह बच्चों के द्वारा कव्वों को खिलाये जाते हैं. उसके पीछे अनेक लोक विश्वास हैं. जिन्हें अपने मूल रूप से विकृत करके भुला दिया गया है, यह एक ऐसा दिन है जब प्रकृति के बीच मौजूद एक तिरस्कृत पक्षी कव्वा एक दिन के लिए बादशाह बन जाता है. कव्वों की इस बादशाहत से जुड़ा एक लोक विश्वास अभी भी जीवित कुमाऊँ में है… (Ghughuti Column By Batrohi)

कुमाऊँ में पूर्वी रामगंगा और पिंडर नदी के कुंवारी गाँव की सीमा पर दानपुर इलाका अपनी संस्कृति और नृतत्व से जुड़ी संभावनाओं को लेकर बहुत उल्लेखनीय है.

कहा जाता है कि दानपुर के मूल निवासी ‘दाणू’ किसी ज़माने में खुद को दानव देवता का वंशज मानते थे. इतिहासकार बद्रीदत्त पांडे के अनुसार ‘दानपुर कोट नामक एक किला, जिसकी सिर्फ छत ही बाकी थी हाल तक भी (1930ई.) मौजूद था. दानपुर के लोगों का विश्वास है कि इसमें उनके पूर्वज दानव रहते थे. इसी के सामने शुमगढ़ नामक गाँव है जिसे वहां के लोग शुंभ नामक दैत्य का घर मानते हैं. इसी किले में शुम्भ दैत्य का देवी के साथ युद्ध हुआ जिसमें शुम्भ मारा गया था. बाद में ये लोग खस जाति के रूप में जाने गए.

दानपुर के लोग मानते हैं कि नंदादेवी पर्वत के पश्चिम की तरफ हिमाचल प्रदेश की ओर ऊँची टिबरी में कव्वालेख के नाम से एक प्रसिद्ध स्थान है जिस पर हमेशा कव्वों के हजारों पंख पड़े रहते हैं. स्थानीय लोग इसके पीछे पुराने ज़माने से चला आ रहा यह विश्वास मानते हैं कि यह कव्वों की काशी है. समूचे कुमाऊँ में उत्तरायणी को कव्वों का दिन माना जाता है. इस दिन संसार के सारे कव्वे इसी जगह एकत्र होकर नए वर्ष की अपनी यात्रा आरम्भ करते हैं. दानपुर में यह विश्वास भी है कि मरने से पहले हर कव्वा यहाँ अवश्य आता है. अगर कोई कव्वा दूसरी जगह मरता है तो कोई दूसरा कव्वा, जो उसे प्राण त्यागते हुए देखता है, उसका एक पंख लाकर उस जगह पर डाल आता है.

इस दिन सारे कव्वों को पूरे कुमाऊँ के चक्कर लगाने होते हैं, इसलिए हर घर के पकवान का एक टुकड़ा जूठा करके वह दूसरे घर का चक्कर लगाने लगता है. बच्चे जोर-जोर की आवाज लगाकर उसे अपने घर आमंत्रित करते हैं, जिस घर में जाकर वह पकवान (घुघता) जूठा करता है, वह उसके लिए सौभाग्य की सूचना होती है. इसीलिए बच्चों में उसे अपने घर बुलाने की होड़ मची रहती है. बच्चे कव्वों से वो सारी चीजें मांगते हैं, जिनकी अपेक्षा वे और उनके परिवारजन करते हैं. (Ghughuti Column By Batrohi)

(लेखक की नवीन कृति ‘पहाड़ की जड़ें’ का एक अंश.)

रूस के एक यात्री ने लिखी थी कुमाऊनी लोककथाओं की पहली किताब

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फ़ोटो: मृगेश पाण्डे

लक्ष्मण सिह बिष्ट ‘बटरोही‘ हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकार-कहानीकार हैं. कुमाऊँ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रह चुके बटरोही रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संस्थापक और भूतपूर्व निदेशक हैं. उनकी मुख्य कृतियों में ‘थोकदार किसी की नहीं सुनता’ ‘सड़क का भूगोल, ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल दा’ और ‘महर ठाकुरों का गांव’ शामिल हैं. काफल ट्री के लिए नियमित लेखन. 

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Sudhir Kumar

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