कला साहित्य

सदियों से कुछ कहना चाहती है लछिमा – बटरोही की कहानी

वो शिखर पर जो गाँव है, वही काफलीधार है. किसने रखा होगा यह नाम? सोचती है लछिमा – कैसा है यह नाम? ‘काफल वाली धार!’ लेकिन सिर्फ काफल तो होता नहीं वहां.  काफल के अलावा बुरुंश होता है, बांज और किलमड़ होता है, हिसालू और घिंघारू होता है.  तब फिर काफल के नाम से ही धार का नाम क्यों?

सोचती है लछिमा, लेकिन कह नहीं पाती.

एक तो कह नहीं पाती. दूसरे, सोचती है कि ऐसी बात कहे भी तो किससे?

हर बरस फागुन के आते-आते बौरा जाता है लछिमा का मन. मन को अपने अन्दर खोजने की कोशिश करती है वह. मगर वह तो पगलाया हुआ-सा बातें करने लगता है, जिसे सिर्फ लछिमा ही सुन सकती है. मन को छू नहीं सकती, मन के ही हाथों से भी, लेकिन मन से बातें जरूर कर सकती है.

एक तो कह नहीं पाती; दूसरे ऐसी बातें कहे भी तो किस से? कौन सुनेगा उसके मन की बातें?

फागुन आता है तो फूलों, पत्तियों और मदमाती सुगंध के शब्दों के रूप में उगलता हुआ वह कैसे तो गीत गाता है और चारों ओर बिखर गए फूलों-कोंपलों के साथ सारी-सारी दुपहरियां धूप-बिछी बर्फ की धीरे-धीरे पसीजने लगती हैं. दिन कंवलाने लगते हैं और रातें किशोर प्रेमियों की आलिंगन-तृष्णा की तरह अपने ही वश में नहीं रह जातीं.

ऐसा ही कुछ महसूस करती हैं लछिमा और ऐसा ही कुछ कहना चाहती है लेकिन कह कहाँ पाती है?

गेहूँ-मसूर की हरियाली और सुनहरी बालियों के ऊपर सूर्योदय के साथ जब मखमली उजाला हाथ से छूटे लोटे के दूध की तरह अनायास लुढ़क पड़ता है, तब उनकी बालें कैसी-कैसी गुदगुदी हो जाती हैं. तब गेहूं भरे खेतों के पीताभ गालों को धीरे-धीरे अपने गालों से सहलाने का मन करता है लछिमा का और चुपके से अपने दांतों से कड़ाक काट देने को जी चाहता है.

जब गाय-भैंसों को हांकते ग्वालों के हांक-स्वरों के साथ नग्न-युवती सी परसी हुई ऊंची-ऊंची वर्तुलाकार पहाड़ियां स्वर में स्वर मिलाती हैं और वृक्ष, पादप तथा ऊंचे उठे हुए शिखर अजीब-से, न समझ में आने वाले सवाल पूछते हैं तप लछिमा का मन करता है कि वह पेड़ों, शिखरों, घास-झुरमुटों से भरी हुई वादियों से अपने सवाल दोहराने को कहे. लेकिन कैसे कहे लछिमा? न अतो वह कह पाती है और सोचती है कि अगर किसी तरह कह भी दे तो उसकी भाषा शिखर वृक्ष समझ भी पाएंगे या नहेने?

हाँ, जब ऊंचे-नीचे शिखरों के मुंह से निकल कर अआती हवा उसे पुकारती है आर दूर हिमालय के किसी अदृश्य लोक से सीख कर लौटी गौरियां, तीतर, मुन्याल आदि पक्षी घुटने-घुटने तक की उछाल मारते हुए लछिमा को अपना नाच दिखा रहे होते हैं तब वह देर तक उनसे बतियाना चाहती है. घंटों अपने-अपने सुख-दुखों का आदान-प्रदान करना चाहती है. हवा से भी और फाख्तों-गौरैयों-तीतर-मुन्यालों से भी. लेकिन कह कहाँ पाती है वह? जो कुछ वह मन में सोचती है उस सबके लिए एक भी तो शब्द खोज नहीं पाती. कैसी घुटन भरी ज़िन्दगी है यह सोचती है लछिमा. … शब्द गले-गले तक आते हैं, बाहर निकलते ही हवा की तरह हवाई हो जाते हैं.

कहाँ से आते हैं ये शब्द, सोचना चाहती है लछिमा, लेकिन इस भावना को शब्द कहाँ दे पाती है? हवा, उजाला, शिखर-शिखर फ़ैली ऊंची-नीची पहाड़ियां और वृक्ष झुरमुट कहाँ से ले आते हैं ये शब्द? वे लोग अपने लिए ठीक-ठीक शब्द खोज लेते हैं. वह अपने लिए क्यों नहीं खोज पाती शब्द? पहाड़ी चोटियों पर से गूंजता हुआ शब्दहीन नाद तो उसकी अपनी भाषा बन जाती है, जबकि उसके मन से निकले हुए शब्द हवा में मिलकर शब्दहीन नाद बन जाते हैं.

कौन है वह जो फागुन आते ही चारों ओर सौन्दर्य, सुगंधी और नशीली हवा बिखेर देता है? कौन है वह जो वासंती बादलों को शरारती बच्चों की तरह थिरकाने लगता है और सारी की सारी धरती को मायके से पहली बार आई दुल्हन-सा सजा देता है. सवालों के बाद सवाल उठते हैं लछिमा के मन में. लेकिन ये सवाल कहाँ होते हैं? सवालों के तो जवाब होते हैं. लछिमा के मन में उठने वाले ये प्रश्न खुद ही प्रश्न होते हैं और खुद ही उत्तर भी.

हवा पत्तियों के साथ गलबहियां डाले झोड़े गा रही होती है और रात चांदनी के कंधे पर सर रखे बेसुध सो रही होती है. हरी-पीली टोपियाँ पहने छोटे-बड़े शिखर जिज्ञासु बच्चों की तरह धरती के इस बदले रूप को फ़ैली-फ़ैली आँखों से भौंचक निहारते रहते हैं और मीलों लम्बी ढलानों से युक्त वादियाँ सर पर भरे पोखर के बराबर तेल डाले खूब लम्बी मांग निकाले हुए मेले में जाने की प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं. शहद की तरह फ़ैली ओस के बीच सारे खेत, दूब-घास भरी घाटियाँ और अभी अभी अंकुरित हुई वनस्पतियों से भरे पठार नौसिखिये तैराक की तरह चारों ओर तैर रहे होते हैं.

ऐसे ही क्षणों में लगता है लछिमा को कि फागुन आते ही दिन कंवला गए हैं और रातें बावली हो गयी हैं.

किससे कहे लछिमा? एक तो वह कह नहीं पाती. दूसरे किसी तरह कह भी दे तो कौन सुनेगा उसकी ऐसी बातें?

काटते-काटते ही अंकुरित हो आता है चातुर्मास का वन,,
बहता पानी भी रोका जा सकता है. नहीं थमता तो मन.

सोचती नहीं, गाती है लछिमा. अपने गाँव की खतडुवा-धार से कितनी बार तो गाया है उसने यह न्यौली-गीत. खतडुवा-धार की ठीक सीध में है काफली-धार. जैसे एक कदम बढ़ाया और सीधे कदम पहुंचा काफली-धार में.

आकाश की नीली गहराइयों तक उड़ता चला गया लछिमा का मन क्यों नहीं थमता? वह क्यों नहीं बता पाती वन-शिखरों, वृक्षों-झुरमुटों, वायु और चोटियों पर से उगते हांक स्वरों को अपनी बात? उसका सारा जीवन क्या इसी तरह शेष हो जाएगा? बिना बोले, बिना किसी को अपने मन की बात बताये और बिना किसी के द्वारा सुने हुए? बरसात में काटी गयी वनस्पतियाँ कैसे उसी क्षण अंकुरित होने लगती हैं? कैसे लगातार अविरल बहती नदियाँ तक क्षण भर ठहरकर शिलाओं और उनके नीचे बसी मछलियों से अपनी भावनाएं कहती चली जाती हैं? लछिमा ही उस ब्रह्माण्ड में अकेली अभागिन क्यों है? वही क्यों नदी-वृक्षों की भाँति अपना सहयात्री नहीं खोज पाती?

सोचती है लछिमा लेकिन कह नहीं पाती. कहाँ चाहती है लछिमा लेकिन सोचती है उसकी ऐसी बातें सुनेगा कौन?

उसी का मन क्यों होता है ऐसा? लोहार जब आग की भट्टी में तपाये गए लोहे को पीटता है तो जिधर घन की चोट पड़ती है, लोहा उसी ओर मुड़ जाता है. उसी तरह लाल चिंगारियों-भरे लोहे की तरह यह मन भी क्यों जहाँ-तहां चला जाता है?

शिखर पर स्थित देवस्थान पर खड़े खुबानी के पेड़ पर की सबसे ऊंची डाली पर बैठा लाल चोंच वाला हरा तोता जब खुबानी के दाने पर चोंच मार रहा होता है, तब न चाहते हुए भी मन की आँखें क्यों बरबस उसी ओर चली जाती हैं? देर तक क्यों तोते को ही देखती रहती हैं? क्यों मन को इतना भाता है वह तोता?

जब सारा आकाश चांदनी से ढंका रहता है और किसी सजग प्रहरी की तरह चन्द्रमा चरों ओर सरे संसार को एक ही नज़र से निहार रहा होता है, तब कौन है वह जो कहता है कि कल रात ही तुम्हारे पति से राते में मेरी भेंट हुई थी. यह जानकार कि मैं उसी के गाँव की खतडुवा-धार से होते हुए गुजरूँगा, उसकी आँखों में आंसू डबडबा आये थे. रोने तो लगा था वह, लेकिन दिखा ऐसा रहा था मानो उसे शहर में कोई दुःख-तकलीफ नहीं है. बाँए हाथ की उँगलियों में चमड़े की पट्टियां डाले वह दाएँ हाथ में पकडे हथौड़े से पत्थर के गोल टुकड़ों को ऐसे तोड़ रहा था जैसे कि अपने मन में बसी लछिमा की मूरत बिसरा रहा हो.

पत्थर के बेडौल टुकड़ों की तरह वह लछिमा की मूरत को इस तरह क्यों ओने-कोने में छिटका रहा होता है? कितने-कितने तो टुकड़े हो गए हैं लछिमा के मन के, अब तो वे खोजने पर भी नहीं मिल सकते. पत्थर ही होता अगर मन तो दिखाई तो देता, मगर बारीक रेट की तरह ये टुकड़े तो अब दिखाई भी नहीं देते. मान लो किसी तरह समेट भी ले वह उन टुकड़ों को तो क्या करेगी उनका? टुकड़े-टुकड़े मन की उस पोटली को वह कहाँ ले जाएगी? कैसे ले जाएगी? किसके लिए संजोएगी?

सोचती है लछिमा, लेकिन कह नहीं पात्र्र. एक तो कह नहीं पाती, दूसरे अगर किसी तरह कह भी दे तो ऐसी बातें सुनेगा कौन?

इस खतडुवा-धार की जड़ पर से कितनी तेज तो बहती है रामगंगा और ऊपर आकाश में बादल मदमस्त गिद्ध समूहों की भाँति ऊपर और ऊपर उड़ते चले जाते हैं. नहीं उड़ पाती तो लछिमा. मन तो नदी बादलों से भी तेज भागता है – ऊपर-नीचे … नीचे-ऊपर … लेकिन वह खुद जैसे खतडुवा-धार में ही जमी रह गयी है. सारी जिन्दगी जैसे इसी खतडुवा-धार में खड़े-खड़े बीत जाएगी उसकी. रामगंगा के किनारे बिखरी रेट में पड़ी मछली जैसी हालत हो गयी है लछिमा की, जो बालू निगलकर सांस लेना चाहती है और भरी दोपहरी में महल के ठूंठ वृक्ष से उगती उदासी को एकटक देखती रहती है. न जाने किस क्षण रेट भरे इन उदास बगूलों को निहारती-निहारते वह भी महल वृक्ष के ठूंठ जैसी पसरी की पसरी रह जाएगी.

तब कहाँ होगी लछिमा?

छत की धुरी पर जब अपनी हिंसक नज़रों से साथ धौली-बिल्ली, घुघूती-बासूती गाते घुघते (फाख्ते) पर झपटती है तो घुघता अपनी आँखें बंद कर लेता है और सोचता है धौली बिल्ली तो वहां है ही नहीं इस लिए उस पर झपटेगी कैसे? लेकिन घुघते के द्वारा आँखें बंद कर लेने से क्या होता है? धौली बिल्ली के नुकीले दांत तो घुघते के गले में पड़ने ही हैं.

सोचती है लछिमा. उसकी हालत भी ठीक घुघते जैसी है. जब चारों ओर से हिंसक आँखें उसे घेरे रहती हैं तो कोई ऐसा रास्ता भी नहीं बच पाटा जहां से वह भाग सके भीड़ के बीचोबीच से उड़कर आकाश में नहीं जा सकती वह. घुघते के पास तो पंख हैं, उसके पास तो वे भी नहीं हैं. आँखें बंद कर लेने के सिवा उसके पास और कोई रास्ता भी तो नहीं है, क्या करे वह? सोचती है लछिमा. लेकिन कह नहीं पाती.

एक तो कह नहीं पाती; दूसरे सोचती है कि ऐसी बातें कहे भी तो किस से? कौन सुनेगा उसके मन की ऐसी बातें?

फ़ोटो:  मृगेश पाण्डे

लक्ष्मण सिह बिष्ट ‘बटरोही‘ हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकार-कहानीकार हैं. कुमाऊँ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रह चुके बटरोही रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संस्थापक और भूतपूर्व निदेशक हैं. उनकी मुख्य कृतियों में ‘थोकदार किसी की नहीं सुनता’ ‘सड़क का भूगोल, ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल दा’ और ‘महर ठाकुरों का गांव’ शामिल हैं. काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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