अशोक पाण्डे

मोहब्बत का जो रस्ता है बहुत दुश्वार होता है

शांतिप्रिय तिब्बतियों के मुल्क पर चीन के क्रूर कब्ज़े को चालीस साल बीत चुके थे. एक समय पूर्वी दर्शन के सबसे बड़े केंद्र रहे ल्हासा की सड़कें चीनी सिपाहियों के बूटों तले रौंदी जा रही थीं. तमाम मठ और विद्यालय तोड़े जा चुके थे. दलाई लामा अपने करीब एक लाख अनुयायियों के भारत के धर्मशाला में निर्वासित जीवन बिताने को मजबूर थे. यह सन 1992 की बात है जब तिब्बत के खाम नंगचेन में रहने वाले उन्नीस साल के कुंचोक चोम्फेल ने अपना परिवार छोड़ कर भारत जाने का फैसला किया.
(Kunchok Chomphel & Dechen Choedon)

उन दिनों तिब्बत से भारत आने का तरीका यह था कि आप किसी तरह नेपाल पहुंचें, जहाँ के भारतीय दूतावास में आवेदन करने पर भारत सरकार आपको धर्मशाला भेजने की व्यवस्था करती थी. किसी भी और रास्ते से भारत में घुसने की कोशिश करने वालों को अवैध घोषित कर उन्हें वापस तिब्बत भेज दिया जाता था.

कुंचोक चोम्फेल ने वैध तरीका अपनाया, थोड़े समय का वीज़ा हासिल किया और धर्मशाला पहुँच गए. धर्मशाला में कुछ दिन बाद रहने के बाद वे देहरादून भेजे गए. वीज़ा की अवधि बीतने पर उन्हें नेपाल के रास्ते से वापस अपने देश जाना था लेकिन वे तिब्बती सीमा से वापस लौटा दिए गए. इस बार उन्हें काठमांडू से स्थाई वीज़ा हासिल हुआ और वे देहरादून पहुँच गए. युवा कुंचोक को अपना पेट तो किसी तरह भरना ही था. उन्हें अल्मोड़ा के कसारदेवी स्थित तिब्बती मठ में रसोइये की नौकरी पर रख लिया गया. इस तरह बीस साल के इस युवक को ठौर हासिल हुई.

कसारदेवी पिछले सत्तर-अस्सी सालों से दुनिया भर के अध्येताओं, लेखकों, कलाकारों, दार्शनिकों, चित्रकारों और संगीतकारों का प्रिय अड्डा रहा है. यहां आकर रहने वाले नामचीन्ह लोगों की लिस्ट बहुत लम्बी है जिसमें बॉब डिलन, डी. एच. लॉरेंस, उमा थर्मन, एलन गिन्सबर्ग, गैरी स्नाइडर, डैनी के, अर्ल ब्रूस्टर और तिजियानो तेरजानी जैसे कुछ नाम लिए जा सकते हैं. ऐसे ही एक लेखक-मानवशास्त्री हुआ करते थे वाल्टर इवांस वेन्ज़. जर्मन मूल के वाल्टर को तिब्बती दर्शन के शुरुआती अध्येताओं में गिना जाता है. उन्होंने सन 1927 में ‘द तिबेतन बुक ऑफ़ डेड’ का अनुवाद मूल से अंगरेजी में अनुवाद कर प्रकाशित कराया था. वाल्टर इवांस वेन्ज़ ने कसारदेवी में जमीन का एक बड़ा टुकड़ा खरीदकर घर बनाया और वहां रहकर अध्ययन करना शुरू किया. दूसरा विश्वयुद्ध शुरू होने पर 1940 के दशक की शुरुआत में ऐसी स्थितियां आईं कि उन्हें कसारदेवी छोड़कर अमेरिका जाना पड़ा जहाँ 23 साल बाद 1965 में उनकी मृत्यु हुई.

कसारदेवी के उनके घर में संसार भर से बौद्ध धर्म और तिब्बती परम्पराओं के विद्वान आया करते थे. अपनी एक तिब्बत यात्रा के दौरान वे घरेलू कामकाज में मदद करने के उद्देश्य से वहां से अपने साथ कुन्सांग रिंगजिन और उनकी पत्नी सोनम छोटोन को साथ ले आए थे. निर्धन परिवार से ताल्लुक रखने वाले कुन्सांग एक लामा भी थे अर्थात उन्हें कुछ विशिष्ट आध्यात्मिक शक्तियां प्राप्त थीं.
(Kunchok Chomphel & Dechen Choedon)

अमेरिका जाते समय वे अपना घर अर्न्स्ट लोथार हॉफ़मैन नाम के एक और जर्मन विद्वान को सौंप गए. घर के साथ-साथ होफमैन को कुन्सांग रिगजिन और सोनम भी हासिल हुए. हॉफ़मैन की संगत में रहते हुए कुन्सांग रिंगजिन ने कसारदेवी में एक बौद्ध गोम्पा भी स्थापित किया. पचास के दशक में तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद बहुत से तिब्बती शरणार्थी अल्मोड़ा और कसारदेवी के इलाके में भी बसाए गए. उन सबकी जैसी सहायता कुन्सांग रिंगजिन और सोनम ने की उसकी कहानियां यहां रह रहे लोग आज तक सुनाते हैं.

कुन्सांग रिंगजिन और सोनम की ग्यारह संतानें हुईं जिनमें से केवल दो ही जीवित रह सकीं. उनमें से एक का नाम रखा गया डिकी छोटोन. डिकी उन्नीस साल की थी जब तिब्बत से आए कुंचोक चोम्फेल को कसारदेवी में डिकी के पिता द्वारा बनाए गए बौद्ध मंदिर में रसोइये की नौकरी मिली.

चाहे अपने देश में रहे चाहे निर्वासन में, मनुष्य आखिरकार मनुष्य होता है. उसका भलापन, उसकी मूलभूत भावनाएं हर जगह एक जैसी रहती हैं. उम्र और नज़दीकी का तकाज़ा था कि कसारदेवी से दिखाई देने वाला हिमालय डिकी और कुंचोक चोम्फेल की मोहब्बत का गवाह बनता. प्रेम पनपा और उन्होंने शादी कर ली. तिब्बती अध्यात्म में पुनर्जन्म का बड़ा महत्त्व है. लामाओं ने घोषणा की कि उनका बेटा कुन्चोक तेनजिन के रूप में उसके नाना कुन्सांग रिंगजिन का पुनर्जन्म हुआ है. कुन्चोक तेनजिन आज देहरादून के एक मठ में लामा है.

डिकी  और कुंचोक चोम्फेल आज वे उसी घर में रहते हैं जहाँ कभी वाल्टर इवांस वेन्ज़ और अर्न्स्ट लोथार हॉफ़मैन रहते थे. जर्मन पिता और लैटिन माता की संतान अर्न्स्ट लोथार हॉफ़मैन को ज़माना आज अन्गरिका गोविंदा या लामा गोविंदा के नाम से जानता है. बौद्ध और तिब्बती दर्शन के प्रकांड पंडित इन जनाब ने बंबई के एक रईस पारसी परिवार से ताल्लुक रखने वाली रैटी पेटिट नाम की पेंटर-फोटोग्राफर से शादी की थी. रैटी से उनका प्रेम तब शुरू हुआ था जब वे शान्तिनिकेतन में उनके गुरु थे.
(Kunchok Chomphel & Dechen Choedon)

पति के निर्देशन में खूबसूरत रैटी ने बौद्ध दर्शन का इतना अध्ययन किया कि उन्हें ली गौतमी के नाम से जाना जाने लगा. गौतमी के गम्भीर बीमार पड़ जाने के बाद लामा गोविंदा उन्हें लेकर अमेरिका चले गए. जाने से पहले वे अपनी संपत्ति डिकी की माँ यानी सोनम छोटोन के हवाले कर गए. सोनम तब तक तिब्बती समुदाय के लिए इतना काम कर चुकी थीं कि उन्हें गुरुमाता कहा जाने लगा था. 2008 में उनकी मृत्यु के बाद उनकी स्मृति में उनकी मूर्ति स्थापित की गयी. 1986 में स्वर्गवासी हो गए उनके पति यानी लामा कुन्सांग रिगजिन की स्मृति में एक स्तूप भी बनाया गया है.

अपने घरों से हजारों दूर अलग-अलग छिटका दिए जाने के बाद एक दूसरे से मिले डिकी छोटोन और कुंचोक चोम्फेल की मोहब्बत की यह दास्तान मुझे रोक रही है कि मैं आपको लामा गोविंदा और ली गौतमी की बेमिसाल प्रेमकथा सुनाऊँ.

फिलहाल तो इतना ही कि किसी पहाड़ी नगर में पर्यटक बन कर जाएं और जमीन पर दुकान लगाए माला जपती, छोटी-अधमुंदी आँखों वाली कोई शरणार्थी तिब्बती महिला जैकेट-स्वेटरें बेचती दिखाई दे तो उसके साथ सलीके से पेश आएं. हो सकता है धूल और जूतों के बीच बैठी वह औरत अपने भीतर दर्द और मोहब्बत की इतनी कहानियां समेटे हो जिन्हें सहेजने-समेटने में आपकी पूरी ज़िंदगी खर्च हो जाए.

समूची दुनिया की मोहब्बत उनकी मुस्कान में पोशीदा है. इसे हासिल करने के लिए उन्होंने सात जिन्दगानियों के बराबर के दुःख सहे हैं.
(Kunchok Chomphel & Dechen Choedon)

अशोक पाण्डे

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