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जिम कॉर्बेट और उनका जांबाज साथी ‘रॉबिन’

मशहूर शिकारी और पर्यावरणविद् जिम कॉर्बेट का नाम आते ही हमारे जेहन में कुमाऊं के घने जंगल और आदमखोर बाघों की कहानियां ख़ुद-ब-ख़ुद तैरने लगती हैं. कॉर्बेट के इन रोमांचक किस्सों का एक ऐसा अहम किरदार भी था, जिसके बिना उनके कई मिशन शायद कभी पूरे नहीं हो पाते. ख़ास बात ये है कि ये कोई इंसान नहीं, बल्कि उनका बेहद समझदार और वफादार कुत्ता था — रॉबिन.

रॉबिन सिर्फ एक पालतू जानवर नहीं था, बल्कि कॉर्बेट का सबसे भरोसेमंद साथी, उनका ‘बॉडीगार्ड’ और जंगलों का एक बेहतरीन ट्रैकर था. जानते हैं कार्बेट के इस जांबाज रॉबिन की दिलचस्प कहानी.

रॉबिन कॉर्बेट को कहाँ और कैसे मिला?

रॉबिन की कॉर्बेट की जिंदगी में एंट्री बड़ी दिलचस्प रही. कॉर्बेट को एक ऐसे शिकारी कुत्ते की तलाश थी जो जंगलों में उसका साथ दे सके. तब उन्हें एक व्यक्ति के पास स्पैनियल ब्रीड का एक छोटा सा पिल्ला मिला. वह दिखने में बहुत कमजोर और बीमार सा था. उसे पालने वाले व्यक्ति को लगा था कि यह कुत्ता किसी काम का नहीं रहेगा, इसलिए उसने बेहद कम कीमत पर—मात्र 15 रुपये में—उसे कॉर्बेट को बेच दिया.

कॉर्बेट ने उसका नाम रखा ‘रॉबिन’. कॉर्बेट ने न सिर्फ उसका इलाज किया, बल्कि उसे बड़े लाड़-प्यार से पाला. धीरे-धीरे रॉबिन एक मजबूत, फुर्तीले और बेहद समझदार शिकारी कुत्ते के रूप में विकसित हो गया. कॉर्बेट ने उसे जंगल के कायदे-कानून और शिकार की बारीकियां सिखाईं.

रॉबिन के पास सूंघने की गजब की शक्ति थी और वह इंसानी भाषा को इशारों में समझ जाता था. कॉर्बेट जब भी आदमखोर बाघों या तेंदुओं के मिशन पर निकलते, रॉबिन साए की तरह उनके साथ होता. अपनी किताबों में कार्बेट ने रॉबिन की समझदारी और जांबाजी का बार जिक्र किया है. एक जगह कार्बेट उसकी समझदारी का किस्सा कुछ यूं लिखते हैं.

हम जंगल में एक घायल तेंदुए का पीछा कर रहे थे. जाहिर है घायल तेंदुआ बेहद खतरनाक होता है. मैं आगे बढ़ता जा रहा था कि अचानक रॉबिन ने मेरे कोट का कोना अपने दांतों से पकड़कर पीछे खींच लिया. रॉबिन बिल्कुल शांत था, उसने भौंककर तेंदुए को सचेत नहीं किया, बल्कि मुझे रुकने का इशारा किया. जब मैंने ध्यान से देखा, तो ठीक सामने कुछ ही दूरी पर झाड़ियों में तेंदुआ घात लगाए बैठा था. अगर उस दिन रॉबिन ने मुझको न रोका होता, तो मैं तेंदुए के हमले का शिकार हो चुका होता. रॉबिन ने दो बार कॉर्बेट की जान बचाई थी.

कॉर्बेट की किताबें पढ़कर लगता है कि रॉबिन को शिकार की बेहद गंभीर समझ थी. जैसे, आदमखोर बाघ अक्सर पीछे से हमला करते थे. ऐसे में रॉबिन, कॉर्बेट के पीछे-पीछे चलता था. उसकी पूंछ का हिलना या अचानक उसका रुक जाना कॉर्बेट के लिए एक सिग्नल होता था कि आसपास कोई खतरा है. रॉबिन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह ‘साइलेंट हंटिंग’ जानता था. वह तब तक नहीं भौंकता था जब तक कॉर्बेट उसे आदेश न दें. वह हवा में तैरती गंध से ही बता देता था कि बाघ कितनी दूरी पर है.

शिकार के दौरान कई बार कॉर्बेट को घंटों एक ही जगह बिना हिले-डुले बैठना पड़ता था. रॉबिन में गजब का धैर्य था. वह कॉर्बेट के बगल में बिल्कुल पत्थरों की तरह शांत बैठ जाता था. सांस लेने की आवाज तक नहीं करता था ताकि शिकार को भनक न लगे.

रॉबिन ने अपनी जिंदगी के कई साल जिम कॉर्बेट के साथ कुमाऊं और गढ़वाल के जंगलों में खतरनाक मिशनों में बिताए. बुढ़ापे के कारण जब रॉबिन की आंखों की रोशनी कमजोर होने लगी और उसके शरीर ने साथ देना छोड़ दिया, तब भी कॉर्बेट के प्रति उसकी वफादारी कम नहीं हुई.

जब रॉबिन ने इस दुनिया को अलविदा कहा, तो जिम कॉर्बेट बेहद भावुक हो गए थे. उन्होंने अपनी किताबों में रॉबिन का जिक्र बड़े ही सम्मान और प्यार के साथ किया है. कॉर्बेट ने लिखा था कि रॉबिन जैसा वफादार और बहादुर साथी मिलना किसी भी शिकारी के लिए गर्व की बात है.

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