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सिनेमा: महिलाओं के दुःख और उससे मुक्ति की छटपटाहट का फिल्मांकन

ईरानी महिला फ़िल्मकार ‘मरजियेह मेश्किनि’ की पहली फ़िल्म ‘द डे व्हेन आई बीकेम वुमन’ तीन छोटी फ़िल्मों में से दूसरी फ़िल्म आहू भी ईरानी समाज की महिलाओं के गहरे दुःख और उससे मुक्त होने की चाह की कहानी है.

फ़िल्म एक ऐसे लैंडडस्केप से शुरू होती है जहां एक बड़े भूदृश्य में तेजी से घोड़ा दौड़ाते हुए एक कबीलाई आदमी आहू-आहू की आवाज लगाते हुए दिखता है. इसके बाद का दूसरा भूदृश्य दर्शकों को थोड़ा दिग्भ्रमित भी करता है जब उसी इलाके में मस्ती से घूमते हुए हिरणों का झुंड भी हमें दिखलाई पड़ता है. यह भ्रम जल्द ही टूटता है जब वह कबीलाई आदमी समुन्दर और पंछियों के झुंड वाले बैंकड्रॉप में तेजी से घोड़ा दौड़ाते हुए एक ऐसे समूह के नजदीक पहुँच जाता है जो सिर तक हिजाब चढ़ाए साइकिल को दौड़ाती हुई ईरानी लड़कियों का विशाल समूह है. कबीलाई अपनी बीबी आहू को इन्हीं साइकिल सवारों के बीच खोजता रहता है और आखिरकार आहू तक पहुँच ही जाता है. वह आहू को दौड़ में न भाग लेने की हिदायत देता है. आहू, चुपचाप अपना संतुलन दौड़ में लगाने की कोशिश करती है. आखिरकार वह आहू को धमकी देने के साथ अपने घोड़े का मुंह मोड़ता है और अपने हिजाबों और समंदर के किनारे चल रही हवा से लोहा लेती ईरानी लड़कियों का अपनी-अपनी साइकिल के जरिये संघर्ष जारी रहता है.

आहू की दौड़ में शामिल रहने और सबसे आगे रहने की चाह उसके पति की धमकी की वजह से ही नहीं रुकती बल्कि फ़िल्म के अगले 20 मिनटों में दौड़ के समानांतर एक दौड़ उसकी ज़िंदगी में चल रही होती है जब एक-एक करके कई लोग उसे धमकाने आते हैं. जल्द इस क्रम में उसका पति उनके इलाके के धर्मगुरु को ले आता है और अब साइकिल के ट्रैक के अगल बगल दो घोड़े दौड़ रहे हैं. यह धर्मगुरु उसे समझाता है कि तुम साइकिल नहीं बल्कि शैतान से जड़ी चीज चला रही हो. वह उसे तलाक के प्रस्ताव का भी अंदेशा देता है जिसपर आहू अपनी मुहर लगा देती है. अब थोड़ा चैन से वह दौड़ में अपने पिछड़ने को बराबर करने के लिए जोर लगाती है तभी कुछ ही देर में चार घुड़सवार साइकिल ट्रैक पर दिखते हैं जिनमें से एक पर उसका पिता सवार है और वह आहू से अपने कबीले के रीतिरिवाज की दुहाई देते हुए तलाक वाली बात को ख़त्म करने की सलाह देता है. आखिरकार बूढ़ा सात तक गिनती करके आहू से रिश्ता ख़त्म करके अपने झुण्ड के साथ वापिस हो जाता है.

आहू साइकिल को जितना साधने की कोशिश करती है उसका कबीला और कबीले के आदमी उसे उतना ही पटरी से उतारने की कोशिश करते हैं. अब वह दौड़ को लगभग ख़त्म करने और जीतने के करीब है. दर्शक भी ईरानी औरत की विजयी दिखती कहानी के रोमांच में डूबने को होते हैं कि एक बड़े झटके के बतौर अब पांच घुड़सवार भूदृश्य में शैतान के चेलों की माफिक नमूदार होते हैं और उसे चेतावनी देते हैं कि तुमने अपने पिता की बात को ठुकराकर कबीले की इज्जत पर सवाल उठाया है. अब तुम्हारे भाई आकर तुम्हे ले जाएंगे.

आहू, अब दौड़ जीतने को ही है कि ट्रैक पर उसे दो घुड़सवार दिखते हैं जो उसको जबरदस्ती ले जाने वाले उसके ही भाई हैं. आखिर में हम उसे न सिर्फ दौड़ हारता हुआ देखते हैं बल्कि वह साइकिल को दौड़ के ट्रैक से उतारकर वापस अपने कबीले की तरफ धकेलकर ले जाती हुई दिखती है.

संजय जोशी पिछले तकरीबन दो दशकों से बेहतर सिनेमा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयत्नरत हैं. उनकी संस्था ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ पारम्परिक सिनेमाई कुलीनता के विरोध में उठने वाली एक अनूठी आवाज़ है जिसने फिल्म समारोहों को महानगरों की चकाचौंध से दूर छोटे-छोटे कस्बों तक पहुंचा दिया है. इसके अलावा संजय साहित्यिक प्रकाशन नवारुण के भी कर्ताधर्ता हैं.

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Sudhir Kumar

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