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पीहू की कहानियाँ – 6

फ़िल्म की असली डायरेक्टर “पीहू” ही है

पिछले कई दिनों से मैं इंटरव्यू दे रहा हूँ.एक सवाल सबसे ज़्यादा पूछा जा रहा है कि आपने एक दो साल की बच्ची को डायरेक्ट कैसे किया ? आज एकदम सही सही बताऊँ ? सच्चाई ये है कि मैंने पीहू को डायरेक्ट नहीं किया बल्कि पीहू ने हम सबको डायरेक्ट किया है.सही मायनों में इस फ़िल्म की असली डायरेक्टर पीहू ही है.अब आप जानना चाहेंगे कि कैसे ? तो जवाब ये है कि पीहू वो नहीं करती थी या कर ही नहीं सकती थी , जो हम कहते थे.होता ये था कि पीहू जो करती थी , उसे हम फ़ॉलो करते रहते थे.

इस फ़िल्म में हमारी गाइड , फिलॉस्फर , राइटर , डायरेक्टर सबकुछ पीहू ही थी.वो एक क़दम चली नहीं कि हम सब उसके पीछे पीछे. मैंने पहले भी लिखा 64 घंटे की फ़ुटेज रिकॉर्ड की गई – सारे कैमरे मिला कर.एक फ़िल्म के लिए 64 घंटे की फ़ुटेज.कभी हम दो कैमरे से शूट करते थे तो कभी तीन कैमरे से.इसकी वजह ये थी कि पीहू अपना एक्शन दोहराती नहीं थी.मतलब आप उसे रिटेक के लिए तो बिलकुल कह ही नहीं सकते , कहना भी चाहेंगे तो कहेंगे कैसे ? क्या कोई भी दो साल की बच्ची को कह सकता है कि बेटा ये “टेक” ठीक नहीं हुआ है. चलो एक और टेक करते हैं और वो समझ जाती . इसीलिये हमारी कोशिश होती थी कि एक ही एक्शन में हर तरह के शॉट मिल जाएँ. वाइड भी और क्लोज़ भी.सब जानते थे कि पीहू के साथ एक एक्शन एक बी बार मिलेगा.इसलिये सब हमेशा चौकन्ने भी रहते थे और घबराए हुए भी क्योंकि ऐसे विषम हालात में क्रू में से किसी से भी कोई ग़लती हो जाए तो उसकी तो ख़ैर नहीं.ना जाने कितनी बार हुआ कि पीहू ने बहुत शानदार शॉट दे दिया.हम सब बहुत ख़ुश भी हो गए और फिर अचानक पता चलता था कि अरे इसमें तो मेकअप कंटीन्यूटी गड़बड़ है या इसमें तो कॉस्ट्यूम कंटीन्यूटी ठीक नहीं है.मैं तो शूट शुरू होने से पहले रोज़ सुबह पीहू के पैर चूम कर आशीर्वाद लेता था कि कहीं कोई ग़लती मुझ से ना हो जाए.

आज सोचता हूँ तो लगता है कि पीहू सच मेँ हम सब पर मेहरबान थी.तभी तो इतना मुश्किल शूट पूरा हो पाया.कई सीन ऐसे थे , जिसके लिए पूरे क्रू ने कई हफ़्तों से माथापच्ची की थी.प्लान ए से लेकर प्लान बी , प्लान सी तक सोचा था. लेकिन फिर हम क्या देखते हैं कि पीहू सेट पर आई , हमने उसे सीन की सिचुएशन में डाला और पाँच मिनट में पूरा सीन शूट हो गया.आज फ़िल्म में कई सीन तो ऐसे भी हैं , जो मैंने कभी लिखे ही नहीं थे या ये कहें कि मैं वहाँ तक सोच भी नहीं पाया लेकिन पीहू ने खुद ही कुछ ऐसा कर डाला कि वो बेहतरीन सीन मुझे फ़िल्म में रखने पड़े.मैं हैरान हो कर देखता रहता था.सोचता रहता था कि ये सब हो क्या रहा है ? तो किशन बोलता था – ये सब एक्ट ऑफ़ गॉड है.वही है , जो ये असंभव फ़िल्म बनवा रहा है.सच में हमें हमेशा ऐसा लगता था कि पीहू के रूप में हमारे साथ ईश्वर भी चल रहा था.

मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि ईश्वर ने ही हमें पीहू तक पहुँचाया और फिर पीहू के साथ साथ हमारे भी पास आ कर खड़े हो गए.तभी ये फ़िल्म बन पाई.

( जारी है )

अगली क़िस्त में : जब 64 घंटे की बिखरी हुई फ़ुटेज से घबरा गए फिल्म एडिटर.

पिछली क़िस्त का लिंक: पीहू की कहानियाँ – 5

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Girish Lohani

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