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पिथौरागढ़ जिले का नामकरण

24 फरवरी 1960 को जिले के रूप में अस्तित्व में आये दो देशों से सीमा बनाने वाला क्षेत्र पिथौरागढ़ अपनी प्राचीन सभ्यता को समेटे अग्रसर है. देवभूमि वैसे तो अपनी खूबसूरत वादियों के लिये जगतविख्यात है पर जो बनावट, जो बसावट शहर पिथौरागढ़ की है, वो कहीं घुमने या बसने पर भी शायद ही देखने मिले. मैं आठ साल तक इस शहर रहा हूँ, इसी शहर में पढ़ा-पढ़ाया शहर के हर छोट-बड़े बदलावों को महसूस किया है मैंने. (History of Pithoragarh District )

इस शहर की ऐतिहासिकता तो बहुत लम्बी है पर इसके नामकरण में बहुत मजेदार अभिमत है यथाः-

उत्तराखण्डियों में सबसे प्रसिद्ध और मान्य इतिहासकार रहे एटकिन्सन महोदय ने लिखा है कि चन्द शासकों के शासन काल में पीरी गुसाईं उर्फ पृथ्वी गुसाईं ने इस स्थान पर किला बनाया था जिसके नाम पर क्षेत्र का नाम पिथौरागढ़ पड़ा. हालांकि इस मत में सोचने और मानने जैसी कोई भी बात नहीं है. एटकिंसन ने पिथौरागढ़ के किले के सम्बन्ध में नाम दिया है Loudon Fort किन्तु आधुनिक लेखकों ने इसे London Fort नाम दिया है जिसका कोई आधार नहीं है.

एटकिंसन की पुस्तक हिमालयन गजेटियर का पृष्ठ संख्या-662 जिसमें स्पष्टतः लाउडन फोट लिखा गया है.

दूसरा अभिमत है पिथौरागढ़ से राज्य भर में प्रसिद्ध इतिहासकार डा0 मदन चन्द भट्ट जी का जो वर्तमान में सर्वमान्य है-

इनका मानना है कि कत्यूरी शासक प्रीतमदेव, जिसको पिथौराशाही भी कहा जाता था, ने पिथौरागढ़ में किले की स्थापना की. जिसके नाम पर शहर का नाम पिथौरागढ़ पड़ा. अप्रैल  2019 में डा0 भट्ट जी से मिलने पर उन्होनें बताया कि प्रीतमदेव जिसका नाम पृथ्वीपाल या पिथौराशाही था, का दूसरा विवाह हरिद्वार के शासक चन्द्र पुंडीर (सम्राट पृथ्वीराज चैहान के सामन्त ) की पुत्री मौलादेवी या जियारानी से हुआ था. प्रीतमदेव ने तैमूर के आक्रमण के समय 1398 में हरिद्वार में आकर युद्ध किया था. बकौल डा0 भट्ट जी प्रीतमदेव ने पिथौरागढ़ में किले का निर्माण कराया जिस कारण इस क्षेत्र का नाम पिथौरागढ़ पड़ा. मेरे द्वारा यह प्रश्न किये जाने पर कि किले के निर्माण के पश्चात् क्या प्रीतमदेव यहां आकर बसे अथवा किसी को शासन की जिम्मेदारी सौंपी तो उन्होने बताया कि ऐसा कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं है. अतः जिज्ञासावश चूंकि इतिहास मान्यताओं में नहीं साक्ष्यों में लिखा या पड़ा जाता है अन्य स्त्रोतों की ओर बड़ा.

डा0 मदन चन्द्र भट्ट के साथ उनके आवास में लेखक

कुछ अन्य बिसरा दिये गये इतिहासकारों जो पेशे से शायद इतिहासकार न थे पर उनके शोध एवं साक्ष्यों ने नामकरण पर रोशनी डाली है. इनमें पहला नाम जो मुझे जानने को मिला वो नाम था सोर : मध्य हिमालय का अतीत पुस्तक के लेखक डा0 राम सिंह का इन्होने अपनी उक्त पुस्तक में वर्णन किया है कि गोरखों ने सोर घाटी में स्थित पितरौटा तोक (पूर्व में पितरों को अंजुलिदान देने वाला गधेरा पितरौड़ा) के ऊपर पहाड़ी में एक किले का निर्माण किया जिसे इस पितरौड़ा गधेरे के कारण पितरौटागढ़ नाम से जाना गया. यही गढ़ अंग्रेजों के काल में उच्चारण अशुद्धियों के चलते पिठौरागढ़ कहा गया तथा अंग्रेजी भाषा की वर्तनी (PITHORAGARH) एक जैसी होने के कारण नाम में ये अशुद्धि आई फलतः नाम पिथौरागढ़ हो गया.

पिथौरागढ़ के किलों का निर्माण गोरखा काल में हुआ था. चूंकि गढ़ नामान्त के शब्द गोरखों की ही देन है जबकि कत्यूरी काल में किलों की स्थापत्य शैली यह नहीं थी. इसके अतिरिक्त पीरू गुसाईं चन्द कालीन है चूंकि चन्द कालीन किलों को गढ़ न कहकर बुंगा कहा जाता था. अतः गोरखा काल में बने पिथौरागढ़ के किले का नाम वर्तमान में पितरौटा नामक कस्बे या तोक से बना है चूंकि यह किला पितरौटा की चोटी पर बना है. अतः शुरूआत में इसका नाम पितरौटा गढ़ पड़ा जो कि बाद में पिठौरगढ़ के रूप में अस्तित्व में आया. यहां यह भी जान लेना उचित होगा कि गढ़ नामान्त के सम्बन्ध में यह धारणा कुटौलगढ़, धनगढ़ी एवं गढ़ इसका उदाहरण है.

डा0 राम सिंह के ही मत को आगे बढ़ाते हुए सोर/पिठोरागढ़ के लेखक डा0 पद्मादत्त पंत ने विभिन्न लेखों एवं मेरी यादों का सोर तथा सोर/पिठोरागढ़ नामक पुस्तकों के जरिए पिठौरागढ़ नाम की पुरजोर पैरवी की है. कम्पनी के सरकारी पत्रजातों में इस स्थान का नाम पिटौरा छावनी लिखा हुआ मिलता है.

उक्त मतों के अतिरिक्त निम्न पुराने समाचार पत्रों में भी सरकारी एवं निजी विज्ञापनों में भी पिठौरागढ़ नाम का ही प्रचलन रहा था. अब बड़ा सवाल ये है कि पिथौरागढ़ नाम का प्रचलन कब और कहां से शुरू हुआ.

पुराने समाचार पत्रों वर्ष 1981 से 1986 तक में प्रकाशित नाम पिठौरागढ़
पुराने समाचार पत्रों वर्ष 1981 से 1986 तक में प्रकाशित नाम पिठौरागढ़

1863 की एक हस्तलिखित पुस्तिका में जैमिनीय आश्व मैधिक भी पिठौरागढी सेना वसतो लिखते है. यह कहा जा सकता है कि पिथौरागढ़ नाम में विकृति चाहे जबसे भी आई हो शहर की अपनी चमक-धमक यूंही बरकरार रहेगी जो एक बार इस घाटी में आकर गया वो या तो यहीं रम गया या फिर जम गया.

– भगवान सिंह धामी

मूल रूप से धारचूला तहसील के सीमान्त गांव स्यांकुरी के भगवान सिंह धामी की 12वीं से लेकर स्नातक, मास्टरी बीएड सब पिथौरागढ़ में रहकर सम्पन्न हुई. वर्तमान में सचिवालय में कार्यरत भगवान सिंह इससे पहले पिथौरागढ में सामान्य अध्ययन की कोचिंग कराते थे. भगवान सिंह उत्तराखण्ड ज्ञानकोष नाम से ब्लाग लिखते हैं. यह लेख उनकी भावी पुस्तक उत्तराखण्ड के जिले में से जनपद पिथौरागढ का पुस्तकांश है.

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