Featured

‘बंदी छोड़ दिवस’ से जुड़ा है नानकमत्ता का दीवाली मेला

हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी नानकमत्ता दीपावली में लगने वाले भव्य मेले के लिए सजाया जा चुका है. लगभग 8-10 दिन चलने वाले इस मेले की शुरूआत दीपावली के दिन से हो जाती है. देश भर से लाखों श्रद्धालु गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब के दर्शन करने यहां पहुँचने लगे हैं. एक रोचक जानकारी के तहत यह संज्ञान में आया कि नानकमत्ता में दीवाली का मेला ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है जिसका जिक्र कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भी अपने हालिया दीवाली संबोधन में सिक्ख समुदाय को संबोधित करते हुए किया था. (History of Nankamatta Diwali Mela)

इतिहास पर अगर नजर दौड़ाएं तो पायेंगे कि सिक्खों के छठे गुरू हरगोविंद सिंह को मुगल शासक जहांगीर ने बंदी बना लिया था. कहते हैं कुछ दिन बाद जहांगीर  को सपना आया कि एक शेर उसकी छाती पर चढ़ा हुआ है. सुबह सलाहकारों को पूरा वाकया सुनाया तो सलाहकारों ने पूछा कि क्या आपकी क़ैद में कोई दिव्य पुरूष है? जहांगीर  ने गुरु हरगोविंद के अपनी कैद में होने की पुष्टि की. यह सुनकर सलाहकारों ने कहा कि जल्द से जल्द गुरू हरगोविंद को रिहा कर दें. (History of Nankamatta Diwali Mela)

जहांगीर  ने सलाहकारों की बात पर अमल करते हुए गुरू हरगोविंद को रिहा करने का मन बना लिया. गुरू जी तक बात पहुँचाई गई तो उन्होंने अकेले रिहा होने से मना कर दिया. उनकी शर्त यह थी कि उनके साथ ही कैद किये गए अन्य 52 राजाओं को भी रिहा किया जाए. जहांगीर  ने गुरू जी की बात मान ली और उनके साथ ही अन्य 52 राजाओं को भी रिहा कर दिया. रिहाई के बाद गुरू हरगोविंद सिंह के साथ 52 राजा अमृतसर पहुँचे जहॉं दीप मालाओं के साथ उनका भव्य स्वागत किया गया. तभी से दीवाली के इस दिन को ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा.

गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब में इस दिन देर रात तक गुरूवाणी व कीर्तन होता है तथा गुरुद्वारे को भव्य तरीके से सजाया जाता है. 24 घंटे चलने वाले लंगर में श्रद्धालुओं को विशिष्ट पकवान प्रसाद के रूप में खिलाए जाते हैं. गुरूद्वारे में धार्मिक दीवान से कई धार्मिक व राजनीतिक हस्तियां श्रद्धालुओं को संबोधित करती हैं व उन्हें धर्म पालन का महत्व समझाती हैं तथा सामाजिक कुरीतिओं से बचने का आह्वान करती हैं. नानकमत्ता में दीपावली के इस त्यौहार को हिन्दू-सिक्ख एकता का प्रतीक माना जाता है क्योंकि इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम भी 14 वर्ष का वनवास पूर्ण कर अयोध्या वापस आए थे साथ ही गुरू हरगोविंद सिंह भी जहांगीर  की कैद से वापस अमृतसर लौटे थे.

नानकमत्ता में दीवाली मेले का आयोजन दशकों से होता आ रहा है. नानकमत्ता हाल ही में नगरपालिका घोषित हुआ है लेकिन उसके चारों तरफ आज भी ग्रामीण परिवेश ही है जिसका मुख्य बाजार नानकमत्ता है. आज नानकमत्ता का बाजार कमोबेश उन सब चीजों से भर चुका है जिनकी जरूरत रोजमर्रा की जिंदगी में होती है. लेकिन आज से 15-20 साल पहले खेती पर निर्भर रहने वाले ग्रामीण परिवेश के निवासियों के लिए घरेलू सामान खरीदने का एक मात्र जरिया होता था दीवाली का मेला. धान की कटाई के बाद बिकने वाली फसल से अर्जित धन लेकर दूर दराज गॉंवों से लोग बैलगाड़ी व ट्रैक्टरों से नानकमत्ता मेले में आते और अपने साल भर की जरूरत का सामान खरीदकर वापस अपने घरों को चले जाते. मनोरंजन के लिए झूलों से लेकर सर्कस तक सब कुछ मेले में मौजूद होता जिसका लुत्फ बड़े बूढ़े बच्चे सब उठाते थे.

आज मेलों की भव्यता कम होने लगी है क्योंकि बाजार तक मनुष्य की पहुँच आसान हो गई है. आज खरीदारी से कम लोग मेलों में सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से अधिक जाने लगे हैं. पहले की तुलना में दुकानों की संख्या में कमी साफ नजर आती है. लेकिन नानकमत्ता के ग्रामीण निवासियों के लिए दीवाली का मेला आज भी जीवन रेखा की तरह काम करता है. मेले में भीड़ का एक मुख्य कारण पंजाब, उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों से गुरुद्वारा दर्शन हेतु आने वाले श्रृद्धालु होते हैं बकाया आस पड़ोस के जिलों से आने वाले श्रृद्धालुओं का आना जाना 8-10 दिनों तक लगा ही रहता है.

कुल मिलाकर नानकमत्ता का दीवाली मेला अपने प्रबंधन, श्रद्धा, भव्यता, शांति, आपसी सौहार्द और संपन्नता के लिए जाना जाता है. मेले उस समय को समझने के लिए एक केस स्टडी की तरह हो सकते हैं जिस समय लोगों तक बाजार की पहुँच नहीं थी. आज की तारीख में हम सिलबट्टे से होते हुए मिक्सर ग्राइंडर तक पहुँच चुके हैं. हम सभी को अपने आस पड़ोस में लगने वाले मेलों में जरूर जाना चाहिए ताकि हम समाज का आर्थिक व सामाजिक तानाबाना समझ सकें.

2019 में नानकमत्ता दीवाली मेले के तस्वीरें देखिये :

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशीने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

खसों पर हुए वैज्ञानिक अध्ययन

डीएनए, आनुवंशिकी और मानवशास्त्र की दृष्टि से एक वैज्ञानिक समीक्षा भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में यदि…

1 day ago

वह माला के गेट पर सुबह-शाम पहरा देते मिलता

माला नाम था उसका. छरहरी काया, बला की ख़ूबसूरत. लेडीज साइकिल से जब कॉलेज आती,…

3 days ago

पहाड़ो में भूस्खलन

उत्तराखण्ड का अधिकांश भूभाग हिमालय की पर्वतीय श्रृंखलाओं में स्थित है, जहाँ तीव्र ढाल, गहरी नदी घाटियाँ, युवा…

5 days ago

जर्मन की लड़ाई और रुद्रनाथ की चढाई

पनार बुग्याल के ऊपरी छोर वाले रास्ते पर अब हम चल रहे हैं. पनार चोटी…

5 days ago

हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी

पिछली कड़ी : कुमाऊं का सबसे बड़ा सामाजिक समूह “खस” रहा : आर. डी. सनवाल सन 1928 में अल्मोड़ा…

5 days ago

हैप्पी बर्थडे कॉर्बेट साहब

जिम कॉर्बेट उन चुनिंदा विदेशी मूल के भारतीयों में से एक हैं जिन्होंने भारत में…

1 week ago