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वो स्त्रियोचित हो जाना नहीं था

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day) पर हमारे नियमित सहयोगी अमित श्रीवास्तव की यह मर्मभेदी रचना पढ़िए.

बराबरी

-अमित श्रीवास्तव

किसी दिन

किसी समय

कहीं

एंटी एनक्रोचमेंट ड्राइव थी. उच्च न्यायालय के निर्देश पर. प्रशासन को सुरक्षा देने के लिए खूब सारी पुलिस थी. वरिष्ठ अधिकारी भी थे.

जे सी बी अपना काम कर रही थी. मजदूर अपना. चिन्हित मकानों दुकानों के मालिक खुद भी मजदूर लगा कर दीवारें, दरवाज़े, रैम्प तोड़ रहे थे. कुछ थे जो अभी भी रुक जाओ अभी हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे या ऐसे ही किसी हवाले से मुख़ालिफ़त में थे. समझा बुझाकर काम बन जा रहा था. किसी-किसी को धमकी से भी.

उनमें से ही थे आर के शर्मा. काफी देर से हुज्जत कर रहे थे. उनके मकान और उसी में बनी दूकान पर प्रशासन ने निशान लगाया था. एक कमरा पूरा टूटना था. बार-बार मजदूर का हाथ पकड़ ले रहे थे. शहर के मुअज्जिज शख़्स थे. उन्हें लगभग प्यार से समझाया जा रहा था. घर की महिलाएं भी थीं वहीं. एक महिला सब इंस्पेक्टर उन्हें समझा रही थी. बात बढ़ गई थी शायद. महिला दरोगा ने डांटना शुरू कर दिया था. शर्मा की भी आवाज़ तेज़ हो रही थी. जाने क्या हुआ कि अचानक शर्माजी चीखे

– “साली मुझे आँखे दिखाती है तुझे तो मैं दूंगा लाठी! तू रुक अभी!”

सब रुक गया जैसे. महिला दरोगा अवाक खड़ी रह गई थी. उसे न गाली देते बना न लाठी दिखाते… सब कुछ बेहद शर्मनाक, भद्दा और बेहूदा था. शर्मा की ये बात भी उसका वो गिजगिजा इशारा भी. अपने ही साथियों-सहकर्मियों- कनिष्ठों-वरिष्ठों के सामने… वो बार-बार मुंह फेर कर… वो रो भी नहीं सकती थी. उसे सशक्त दिखना था.

आगे क्या हुआ ये बताना ज़रूरी नहीं. ज़रूरी ये जानना है कि इतने सारे पुलिसवालों और तो और अपने घर की सब महिलाओं के सामने एक महिला दरोगा को इतनी शर्मनाक बात कह जाने की मर्दानगी इन शर्माओं को किसने दी है. उसी समाज ने न जिसने लड़कियों को अपने शरीर की बुनावट टटोलती भूखी आँखों, कानों में पड़ती निमन्त्रण की बजबजाती अश्लील आवाज़ों और अपनी पीठ पर रेंगते लिजलिजे हाथों को अनदेखा कर चुप रह जाने की ‘स्त्रियोचित’ सलाह दी है.

उस महिला दरोगा की कोरों पर भीगी लाल आँखे

उस महिला दरोगा के लाठी पकड़े रह-रह कर कांपते हाथ

उस महिला दरोगा के भिंचे हुए जबड़े

मेरी लिजलिजी बन्द मुट्ठियाँ

मुझे याद है उसने मजबूत आवाज़ में बस एक शब्द कहा था… थाना !

नहीं! वो स्त्रियोचित हो जाना नहीं था. वो स्त्री का शरीर की जद से बाहर आ जाना था. वो ‘जेंडर’ का जैव वैज्ञानिक परिभाषाओं से समाज वैज्ञानिक आशयों में तब्दील हो जाना था.

 

अमित श्रीवास्तव

उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता).

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  • काफल डाली अड्मिनिस्ट्रेटर को मेरा प्रणाम ।

  • कितना भी बराबरी की बात कर ले समाज और सरकार किन्तु पुरुष प्रधान मानसिकता से मुक्ति शीघ्र नही आ सकती। मेरे विचार में महिलाओं के समाज मे आगे बढ़ने से पुरुषों में खीझ और बढ़ गई है जिसका परिचय वो अपनी महिलाओं के प्रति सोच और भाषा मे देते हैं।

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