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उत्तराखण्ड में दलित आन्दोलन के नायक खुशीराम शिल्पकार और भूमित्र आर्य

एक थे चरणजीत शर्मा. मूल रूप से वे हरियाणा के रहने वाले थे लेकिन एक अर्से से वे यहीं के होकर रहे गये थे. यहां आने से पूर्व वे रानीखेत में लीसे का व्यापार किया करते थे. इस व्यापार में लीसे की चोरी में हो रही धरपकड़ के चलते उन्होंने यह काम छोड़ दिया. वे लगभग सभी सामाजिक गतिविधियां, राजनैतिक कार्यक्रमों में बराबर उपस्थित दिखाई देते थे. वैसे वे किसी राजनैतिक विचारधारा के नहीं थे लेकिन हस्तक्षेप हर बात पर करना वे अपना मौलिक अधिकार समझते थे. आपातकाल के दौरान उन्हें जेल भेज दिया गया. वे बड़े निर्भीक थे. कहीं कोई निर्माण हो रहा हो और वे लाठी टेक कर वहां न पहुंचे ऐसा हो ही नही सकता. निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर टीका टिप्पणी करना वे अपना नागरिक कर्तव्य समझते थे और फौरन शिकायती पत्र सम्बन्धित विभाग को भेज देते. उन्हें शिकायती पत्र भेजने के अलावा और किसी प्रकार का व्यसन नहीं था. पुलिस थाना हो या किसी प्रशासनिक अधिकारी का कार्यालय, उनकी शिकायतों की फाइलें बनी हुई थीं और अधिकारी उनकी शिकायतों के अभ्यस्त हो गए थे. कुछ लोग कहा करते थे कि वे शिकायतें कर लोगों को ब्लैकमेल किया करते हैं, लेकिन मैंने उन्हें हमेशा निःस्वार्थ शिकायत करते पाया. पुलिस हो या प्रशासन वे खरी – खोटी सुनाने में पीछे नहीं हटते थे. Forgotten Pages from the History of Haldwani-23

उत्तराखण्ड क्रांति दल का जब गठन हुआ तब वे उसमें शामिल हो गए और दल के कई वर्षों तक उपाध्यक्ष रहे. प्रातः ही कई समाचार पत्र पढ़ डालते और दिन भर उन समाचारों की समीक्षा करते रहते. उन्हें इस शहर से बहुत लगाव था. यह मैं तब जान पाया जब बुढ़ापे में वे अपने पुत्र के साथ रहने सहारनपुर चले गए. तब वे नवभारत टाइम्स में छपी मेरी खबरों से यहां के हालातों की जानकारी का हवाला बराबर पत्र लिख कर भेजते रहते और अपनी सहमति – असहमति को दर्शाते. 11 सितम्बर 2002 को सहारनपुर में उनका निधन हो गया.

एक बार रामपुर रोड स्थित किराये के मकान में जब वे रहा करते थे तो उनका मकान मालिक से झगड़ा हो गया. उन्होंने मकान मालिक के खिलाफ होम मिनिस्ट्री में शिकायत करते हुए लिख दिया कि यह व्यक्ति आतंकवादी है और इसके मकान में अवैध रूप से असलाह रखा हुआ है. मामला संगीन बन गया और एक दिन प्रातः ही पुलिस ने मकान को घेर लिया और शर्माजी को जानकारी के लिए बुलाया. उनकी हाजिर जवाबी कमाल कर गई. वे गुस्सा करते हुए बोले – ‘‘हरामजादो अब आ रहे हो, जब सारा ही असलाह उठ कर चला गया.’’ फिर भी पुलिस वालों ने अपनी ड्यूटी निभाते हुए उस मकान का फर्श तक खोद डाला. Forgotten Pages from the History of Haldwani-23

एक बार उन्होंने हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंशीलाल को पत्र लिखा- ‘‘प्रिय बंशीलाल तुम्हारे सटेट (स्टेट) की यहां जाली लाटरी बिक रही हैं, तुरन्त जांच करो.’’ हरियाणा से पुलिस जांच दल स्थानीय पुलिस को लेकर उनके घर पर पहुंचा. वे हरियाणा से आये पुलिस वाले की ओर घूर कर बोले- ‘‘तो तुम हरियाणा से आये हो? क्या हालचाल हैं बंशीलाल के, अब तो खा-खा के मोटा हो गया होगा.’’ एक साधारण पुलिस वाले के सामने मुख्यमंत्री को इस तरह का सम्बोधन, उसे ऐसा लगा जैसे कि शर्मा जी उसके खास और करीबी हैं. फिर वह मुख्यमंत्री के बारे में विशेष जानता भी नहीं होगा. सम्भव है कि उसने मुख्यमंत्री को देखा भी न हो. उसने जाली लाट्री वाली बात शर्मा जी के सामने डरते – डरते रखी. शर्मा जी बोले ‘‘हां – हां देखो-देखो, बाजार में देखो.’’

खुशीराम शिल्पकार और भूमित्र आर्य को दलितों के उत्थान के लिए सदैव याद किया जाता रहेगा. 1886 में हल्द्वानी के निकटवर्ती गांव में जन्में खुशीराम ने जब 1894 में मिशन स्कूल हल्द्वानी में प्रवेश लिया तो उन्हें सवर्ण छात्रों द्वारा अपमानित किया गया. यहीं से वे कठोर वर्णव्यवस्था के विरोधी के रूप में उभर कर सामने आए. 1906 में दलितों को ‘शिल्पकार’ नाम देने का उन्होंने प्रयास किया और 1921 की जनगणना में उन्हें शिल्पकार लिखा गया. पं. गोविन्द बल्लभ पन्त और बद्रीदत्त पांडे ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति व आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए सहयोगी बनाया. स्वाधीनता संग्राम सेनानी और प्रखर समाज सुधारक खुशीराम 1946 से 1967 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे. बाद में उनके पुत्र इन्द्रलाल हल्द्वानी विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे. 1901 में भवाली में जन्मे भूमित्र आर्य दलितों के उत्थान में जीवन पर्यन्त संघर्षरत रहे.

गुरूकुल कांगड़ी, हरिद्वार के स्नातक और सिद्धांत विशारद भूमित्र आर्य ने कुमाऊॅं में ईसाई बने दलितों को पुनः हिन्दू धर्म ग्रहण करा कर कुरीतियों के उन्मूलन का संकल्प लिया. भवाली में उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की. बाद में वे हल्द्वानी हीरानगर में निवास करने लगे. ब्रिटिश हुकूमत में सरकारी सेवा में रहने के बावजूद आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहने पर उन्हें पुलिस की मार सहनी पड़ी. लोहार परिवार में जन्मे श्री आर्य ने स्व. खुशीराम जी के मार्गदर्शन में अछूतोद्धार के कार्य में अद्वितीय भूमिका निभाई. Forgotten Pages from the History of Haldwani-23

जारी…

पिछली कड़ी का  लिंक

स्व. आनंद बल्लभ उप्रेती की पुस्तक हल्द्वानी- स्मृतियों के झरोखे से के आधार पर

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Girish Lohani

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