उत्तराखण्ड के गढ़वाल मंडल की एक लोककथा (A folklore of Garhwal Mandal of Uttarakhand) एक गांव में एक दूसरे से अगाध स्नेह रखने वाले भाई और एक बहन रहा करते थे. भाई-बहन के प्यार की चर्चा पूरे इलाके में हुआ करती थी, लोग उनके आपसी प्रेम और लगाव की मिसाल दिया करते थे. वे हमेशा एक साथ रहते थे, साथ खाते-पीते और खेलते थे. जो भी उन्हें देखता एक साथ ही पाता.
दिन गुजरते गए. वक़्त के साथ दोनों छोटे बच्चे बड़े हो चले. वे बहुत सयाने और वयस्क हो गये. एक दिन वह समय आना ही था जब बहन की शादी कर उसे ससुराल के लिए विदा किया जाता. एक दिन वह घड़ी भी आ गयी. बहन का धूम-धाम से विवाह कर उसे ससुराल के लिए विदा कर दिया गया. बचपन की यह जोड़ी एक पल में ही टूट गयी. अब दोनों को एक दूसरे से अलग रहना था. विधि का विधान भला कौन टाल सकता था.
बहन के विवाह के बाद भाई अकेला रह गया. हमेशा अपनी बहन के ही साथ रहने वाला भाई अब अकेलेपन में उदास रहने लगा. जैसे बहन के साथ ही उसके जीवन की सारी खुशियां भी चली गयी.
अपने बेटे को इस हाल में देखकर एक दिन उसकी माँ ने उससे कहा, बेटा!, जब से तेरी बहन ससुराल के लिए विदा हुई है तू इस कदर उदास क्यों रहने लगा है.’ तेरी बहन हर त्यौहार-उत्सव में तो घर आयेगी ही. उत्तरायणी, बसंत पंचमी, फूलदेई, होली, दीवाली, रक्षा बंधन और भी बहुत से त्यौहार हैं. सभी मौकों पर वह आएगी ही. तब तू उसके साथ हंसी-ख़ुशी समय बिता सकेगी. और देखना, नाक में नथ, पांव पर झांवर, कानों पर कर्णफूल और गले में चरेऊ (मंगलसूत्र) पहने विवाहिता के जोड़े में वह कितनी सुंदर दिखती है. उसे देखकर सारा गाँव ही मुग्ध हो जायेगा.
त्यौहार-उत्सवों पर अपनी बहन से मिलने के आस लगाये भाई इन्तजार में बैठा रहा. आखिर तीज-त्यौहार के दिन नजदीक आते गये. गांव की बेटियों का आने-जाने का सिलसिला भी शुरू होने लगा. गांव की रंगत बढ़ने लगी. हवाओं में लोकगीतों की खुशबू घुलने लगी. गीत और झोड़े लगने शुरू हो गए. बेटियां ससुराल के अपने अनुभव मायके में बांटा करतीं. उनकी बातें जैसे ख़त्म होने का नाम ही न लेती थीं.
दुर्भाग्यवश उसकी बहन नहीं आयी. वह और ज्यादा उदास व बैचैन हो गया. लम्बे समय से अपनी बहन के त्यौहार के मौके पर आने के इन्तजार में बैठे भाई की सारी खुशियों पर जैसे श्राप सा लग गया. रो-रोकर उसके आंसू सूख गए. त्यौहार का मौसम उसे उदासी में और गहरे धकेल गया. उसकी उदासी में सारा घर शामिल हो गया. आखिर वह इस हालत में सदमे में चला गया. इस सदमे से वह बेहोशी की हालत में चला गया.
उसकी यह हालत देखकर घर में हाहाकार मच गया. पूरे गाँव में चर्चा होने लगी. आखिर उसे इतना प्यार करने वाली बहन त्यौहार के मौके पर भी क्यों नहीं आयी.उसके न आने के कारणों के बारे में सोचकर सारा गाँव आशंकित हो गया. सारे गाँव के लोग उसकी हालत देखकर उससे मिलने आने लगे. वे आते और उसे मूर्छित देखकर दुःख और पीड़ा से भर जाते. गाँव आयी ब्याहताएं भी उससे अपने सहानुभूति जताने आयीं.
आखिर कई वैद्यों बहुत कोशिशें करने के बाद उसे पुनः चैतन्य करने में कामयाब रहे. जब वह होश में आया तो उसने खुद को गाँव के लोगों से घिरा हुआ पाया. इनमें सुहाग के जोड़े में सजीं नवब्याहताएं भी थीं. नथ, मांगटिक्का, गलोबंद पहने, पिछौड़े में सजी-धजीं. उसे लगा जरूर इनमें उसकी अपनी बहन भी शामिल होगी. उसकी आंखें इस भीड़ में अपनी बहन को ढूंढने लगीं. वह अभी तक भी नहीं आयी थी सो उस कैसे दिखती.
यह देखकर वह उन नवब्याहताओं से पूछने. ‘तुम कौन-कौन हो’ ऐसा कहकर वह दोबारा नीम बेहोशी में चला गया. जिसके बाद वह कभी होश में नहीं आया.
कहते हैं कि तभी से पहाड़ों में एक पक्षी ‘तुम कौन-कौन हो’ की रट लगाते हुए घूमता रहता है. यह पक्षी भाई-बहन के उस अमित प्रेम की स्मृतियाँ लोगों के बीच ताजा रखने का काम करता है.
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