दिन भर रुक रुक कर बारिश और उसके साथ बर्फ पड़ती रही.माँ और दादी नंगे पैर पनदेरे से गागर में पानी सारते रहे.पूरे घर के लिए और गाय बाछी के लिए. दोनों के पैर ठंडी से नीले हो गए. दादा जी ने ओबरे में एक कोने पर अंगीठी जला कर पानी से भरी तौली रख दी. ठण्ड से गाय बाछी के सारे बाल खड़े हो कर फूल रहे थे. मैंने अपनी बाछी नंदी को सहलाया. वो मेरा हाथ चाटने लगी. हम बच्चे पिछले कई दिनों से घर में बैठे ऊब रहे थे.
दादी ने मेरी पीठ में जोर से धौल जमाई य छोरी सबसे छेतर च. हट अपनी माँ को अर मुझे पैर सेकने दे. आँखों में झूठ मूठ के आंसू भर कर मैंने भी दादी को दो चार गाली मार दी. दादा जी बात बिगड़ती देख बोले ज बाबा अपने भाई बहनो के साथ रजाई में बैठ जा. आज रात भौत बड़ी कथा लगाउँगा.
अब ये तो हम जैसे पहाड़ी बच्चों के लिए उस ज़माने का लॉलीपॉप हुआ. बड़ा लालच था सो मै अच्छी बच्ची बन कर उठ गयी. अपने काम निबटाने के बाद जैसे ही दादी कमरे में आई हम तीनो ने उसे घेर लिया. आज तू लगाएगी कथा. बर्फीले मौसम से ऊबे हम बच्चे पिछले चार दिनों से घर में रहने की सजा काट रहे थे. थोड़े नखरे दिखने के बाद दादी बोली आज मै तुम्हे बर्फ की कहानी सुनाती हूँ.
जमानों पहले की बात है तब ऊँचे ऊँचे पहाड़ों में छोटी हरी घास होती थी. सब जगह सिंवाला (काई) जमा रहता. पर ठंडी बहुत होती थी. शिव पार्वती इन्ही पहाड़ों के उडियारों (गुफाओं) में रहते थे. अब शिवजी तो थे जोगी औघड़. दिन भर अपने गणों के साथ यहाँ वहां भटकते फिरते. नन्दी बैल भी जोगी के साथ ही घूमता. तब तक बाल बच्चे भी कुछ नहीं हुए थे उनके. कोई अड़ोस-पड़ोस संगी साथी नहीं थे. बर्मा बिसनू की घरवालियां भी बहुत दूर रहती थी. और रोज-रोज भी किसके गुठ्यार में जाना था. फिर वो तो हुए देवता जो हम जन मानुसों से अलग ही रहते हैं.
गौरा बिचारी अकेली कहाँ जाती. वहीँ अपने डेरे के आस पास कभी साग भुज्जी लगाती, कभी फूल लगाती. उतनी ठंडी में कुछ भी कहाँ लगता बाबा.सब गल जाता.पर अपना ज्यु तो लगाना ही था न.
उसे अपने बाबा, माँ और भाई बहनो की बहुत खुद लगती. गौरा राणी रोज जोगी से शिकायत करती, तुम तो चले जाते हो घूमने अर इस नंदी को भी ले जाते हो. मै अकेली घर में उदास हो जाती हूँ. दिन मे सारे पशु चखुले नमान तक दूर चले जाते हैं. एक दिन हुआ ये कि गौरा ने जिद लगा दी अपने मैत जाने की.
रो रो के बोली मेरे मैत में आजकल खूब फल काखड़ी, मुंगरी हो रहे होंगे. हमारी मिडोल में घुघुती, काफू घूरते होंगे. बहुत खुद लगी है, मुझे मैत भेज दो. शिवजी हुए सब मोह माया से दूर. बोले तू कहाँ जायेगी अगर उन्हें तेरी याद आती तो किसी को भाटियाने (बुलाने) भेजते.
द सच्ची मानती गौरा जो रट लगाई तो मैत जा के ही मानी. जोगी ने नंदी को गौरा को मैत पाठयाने भेज दिया. शिव ने मन में सोचा भेज तो मैंने इसे दिया पर वहां से इसे बुलावा तो आया ही नहीं. वो मुझ जैसे जोगी औघड़ से ब्याह करने के लिए गौरा को कभी माफ़ नहीं करेंगे. कहीं ऐसा न हो कुछ बुरा कह दें, अच्छा व्यवहार न करें.
द बाबा जोगी ने बनाया माखी का रूप अर चल दिए ससुराल. गौरा के मैत जाकर घर के धुरपली (छत) में बैठ कर एक छेद से देखने लगे. देखते क्या हैं, पार्वती को उसके मैत वालों ने कंडाली का साग खाने को दिया. अब शिवजी हुए महा घोरी. कैलाश आ कर गौरा की जग्वाल करने लगे.
कुछ दिनों बाद पार्वती खुश हो कर मैत से वापिस आ गयी. जोगी कैसे बोलता कि मै तेरे पीछे पीछे गया था. गौरा के गुस्से से डरता भी था जोगी. मैत की खुश खबर पूछने के बाद बातोँ बातों में शिवजी ने पुछा तो क्या क्या दावत खाई मैत में.
दुनिया की कोई भी औरत अपने मैत की बुराई ससुराल में कैसे कर सकती है. गौरा ने तरह तरह के पकवानो के नाम ले लिए. ये भी खाया, वो भी खाया. जोगी मन ही मन हँसता रहा बोला सौंण के महीने तो खीर भी बनती है. ऐसा कहते है जो सौंण के महीने खीर नहीं खाता वो गनेल बनता है बल अगले जन्म में.
पार्वती बोली हाँ हाँ रोज खाई लसपसी खीर. अहा मेरी माँ के हाथ में क्या स्वाद है. अब जोगी का सबर खत्म हो गया बोला अगर तूने खीर खाई तो कर उल्टी. गौरा को ये अपना और अपने मायके का अपमान लगा. उसने गुस्से से जोगी को घूरा और जो उल्टी करनी शुरू की. दे सफेद झाग जैसा.
करती गयी, करती गयी उल्टी. सारा आगास पाताल सफ़ेद हो गया. पेड़,पहाड़ गाड़, गदेरे सब सफेदी से ढक गए. जीव, जंतु, पशु, पक्षी, कीड़े, मकोड़ों में त्राहि त्राहि मच गयी. पूरी सृष्टि जोगी के सामने हाथ जोड़ कर खाडी हो गयी रोक दो गौरा माता को वरना पुरी दुनिया ढक जायेगी.
अब डरने की बारी जोगी की थी. शिवजी गौरा की ताक़त के सामने नतमस्तक हो गए. गौरा से माफी मांगने लगे.
कहते हैं तभी से जाडा आते ही पहाड़ों में बर्फ पड़ने लगी. जब बहुत बर्फ पड़ जाती है तब हर बार जोगी गौरा को मनाते हैं तब बर्फ पढ़नी बंद होती है. ऐसा होता है मैत का सत जो शिव जैसे जोगी को भी झुका गया.
देहरादून में रहनेवाली गीता गैरोला नामचीन्ह लेखिका और सामाजिक कार्यकर्त्री हैं. उनकी पुस्तक ‘मल्यों की डार’ बहुत चर्चित रही है. महिलाओं के अधिकारों और उनसे सम्बंधित अन्य मुद्दों पर उनकी कलम बेबाकी से चलती रही है. वे काफल ट्री के लिए नियमित लिखेंगी.
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स्कूल के बच्चों को सुनायी ये कथा. बहुत ही पसंद आई उन्हे ?
सुंदर , बच्चों की कल्पना को भरपूर अवसर ।
मायका तो जड़मूल होता है जैसा हो?
अपना बचपन और नानी की कहानियां याद आ गई... खुद लग गई जैसे।
तकनीकि विद्या अर्जन करते करते कब लोककथायो से दूर हो गया सुदूर गाँव का छौड़ा ।आपको शत शत नमन।